गेम्स मेडल

खेल परिणाम खेल इवेंट
सिडनी 2000
खेल परिणाम खेल इवेंट
सिडनी 2000
#Round 3 Badminton Men's Singles

पुलेला गोपीचंद

भारत
बैडमिंटन
पीछे मुड़कर देखें, तो मैंने जो कुछ भी हासिल किया है, उससे खुश हूं। परिस्थितियों को देखते हुए, मुझे नहीं लगता कि मैंने कुछ भी नहीं छोड़ा है।
जन्म तिथि
16 नवम्बर 1973 Nagandla, India
लिंग
पुरुष

मेडल संख्या

0 ओलंपिक मेडल

ओलंपिक गेम्स

1 ओलंपिक गेम्स

पुलेला गोपीचंद जीवनी

ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप जीतने वाले दूसरे भारतीय और पूर्व ओलंपियन पुलेला गोपीचंद एक कोच भी हैं, जिन्होंने साइना नेहवाल और पीवी सिंधु को उनके ओलंपिक पदक जीतने में मदद की है।

साल 2001 में प्रतिष्ठित ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप में गोपीचंद की जीत एक महत्वपूर्ण पल था। यही वह पल था जिसके बाद घुटने की समस्या की वजह से चोटों से भरपूर उनका करियर डगमगाने लगा।

पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी ने कहा, “बीते वक्त को देखें तो मैंने जो कुछ भी हासिल किया है, उससे मैं खुश हूं। परिस्थितियों को देखते हुए मुझे नहीं लगता है कि कोई कमी छोड़ी है।”

अपने घुटने के हुए कई ऑपरेशन के बावजूद पुलेला गोपीचंद वर्षों तक भारतीय बैडमिंटन की उज्ज्वल उम्मीद बने रहे। 1996 से वह लगातार पांच साल तक भारतीय नेशनल बैडमिंटन चैंपियन रहे और पुरुष टीम और पुरुष एकल में 1998 के राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए रजत और कांस्य पदक जीता। इसके बाद उन्हें अगले साल अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

अपने आक्रामक खेल के लिए प्रसिद्ध पुलेला गोपीचंद ने सिडनी 2000 में अपनी एकमात्र ओलंपिक उपस्थिति दर्ज कराई।

पहले दौर में बाई मिलने के बाद भारतीय शटलर ने अपनी पहली चुनौती में यूक्रेन के व्लादिस्लाव ड्रुज़ेन्को का सामना किया। इस मैच में काफी लंबी रैलियां चलीं। इसके बाद यह भारतीय टेनिस खिलाड़ी प्री-क्वार्टर फ़ाइनल में दूसरी वरीयता प्राप्त और ओलंपिक रजत पदक विजेता हेंड्रावन के खिलाफ एक सूजे हुए घुटने और तेज़ बुखार के साथ कोर्ट पर उतरा और 9-15, 4-15 से उसे हार का सामना करना पड़ा।

इसी के साथ उनके ओलंपिक सपने का अंत हो गया। इसके बाद वह पूरा दिन खुद को कमरे में बंद रहते थे। हालांकि उन्होंने छह महीने बाद शानदार प्रदर्शन किया और बर्मिंघम में अपनी जीत का जश्न मनाया। उन्होंने ऑल इंग्लैंड ओपन के दूसरे दौर में चीन के 2000 ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता ने जी झिनपेंग को हराकर अपनी आगे की राह बना ली।

आंध्र प्रदेश के इस शटलर ने इसके बाद डेनमार्क के खिलाड़ियों एंडर्स बोएसेन और वर्ल्ड नं-1 पीटर गेड को क्रमशः क्वार्टर-फाइनल और सेमीफाइनल में हराया और फाइनल मुक़ाबले में चीन के चेन होंग को हराकर खिताब अपने नाम कर लिया।

पुलेला गोपीचंद के मेंटरों में से एक प्रकाश पादुकोण ने उनसे पहले इस प्रतिष्ठित ट्रॉफी को 1980 में अपने नाम किया था। उनके बाद इस खिताब को जीतने वाले गोपीचंद दूसरे भारतीय रहे।

भले ही उनके खेल करियर के दौरान वह ओलंपक में सफलता हासिल नहीं कर पाए, लेकिन अब पुलेला गोपीचंद एक बेहतरीन कोच बनकर अपने ओलंपिक सपने को जी रहे हैं।

खेल से संन्यास लेने के बाद पुलेला गोपीचंद को भारतीय राष्ट्रीय बैडमिंटन टीम के कोच के तौर पर चुना गया, जिससे उनके करियर की दूसरी पारी की शुरुआत हुई। उन्होंने 2008 में अपने घर को गिरवी रखकर गोपीचंद बैडमिंटन अकादमी की शुरुआत की और उन्हें इसके बाद एक बड़े उद्योगपति का समर्थन भी मिला।

उनकी यह पहल सफल भी रही, जिसके परिणाम आप सभी जानते हैं। पुलेला गोपीचंद ने अपनी अकादमी में चार सालों की मेहनत के बाद ही साइना नेहवाल जैसी खिलाड़ी को तैयार किया। उन्होंने लंदन 2012 खेलों में कांस्य पदक जीतकर उनकी कोचिंग की सफलता को प्रमाणित किया।

रियो 2016 में बैडमिंटन में भारत ने एक और पदक जीता। इस बार पीवी सिंधु ने रजत पदक जीतकर सभी को गौरवान्वित किया। वह भी गोपीचंद की अकादमी के माध्यम से ही एक विलक्षण प्रतिभा के तौर पर सामने आई हैं।

वास्तव में गोपीचंद बैडमिंटन अकादमी भारतीय बैडमिंटन की प्रतिभाओं को तैयार करने का एक ज़रिया सा बन गया है। जिससे श्रीकांत किदांबी, पारुपल्ली कश्यप, एच.एस. प्रणॉय, साई प्रणीत, समीर वर्मा और ज्वाला गुट्टा के अलावा दो ओलंपिक पदक विजेता भी निकली हैं।

अपने खेल के दिनों के जैसे ही उनके उसूल बहुत ही कड़े हैं। पुलेला गोपीचंद वर्तमान में भारत के मुख्य राष्ट्रीय कोच हैं और वह भारतीय बैडमिंटन के भविष्य को बेहतर करने में लगे हुए हैं।

एथलीट