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खेल परिणाम खेल इवेंट
लंदन 2012
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लंदन 2012
#Quarter finals Badminton Men's singles

पारुपल्ली कश्यप

भारत
बैडमिंटन
जन्म तिथि
8 सितम्बर 1986 Hyderabad, India
लिंग
पुरुष

मेडल संख्या

0 ओलंपिक मेडल

ओलंपिक गेम्स

1 ओलंपिक गेम्स

पारुपल्ली कश्यप जीवनी

पारुपल्ली कश्यप का बैडमिंटन करियर उनकी ज़िद और तप की कहानी है, जिसमें उन्होंने तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए हर संभव अधिक से अधिक ख़िताब जीतने की कोशिश की है।

14 साल की उम्र में इस शटलर को अस्थमा का पता चला। फिर कोर्ट पर चक्कर आने की परेशानी होने के कारण उनके मैच प्रभावित होने लगे।

हालांकि, सालों तक यह कोई ऐसी स्थिति नहीं थी जो उन्हें जीवन को जीने से रोक सकती थी। उन्होंने न केवल राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता बल्कि ओलंपिक में मेंस क्वार्टर-फाइनल तक पहुंचे। यह दोनों ही भारतीय बैडमिंटन इतिहास के महत्वपूर्ण पल हैं।

वह हैदराबाद में पले-बढ़े। यह वो शहर है जहां से शीर्ष स्तर के बैडमिंटन खिलाड़ी निकले हैं। पारुपल्ली कश्यप ने दोनों ही पूर्व ऑल इंग्लैंड चैंपियन प्रकाश पादुकोण और पुलेला गोपीचंद के सानिध्य में ट्रेनिंग हासिल की। बाद में वह उनके फुल-टाइम कोच बन गए।

2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्हें पहली बड़ी सफलता मिली, जहां संयोग से एक तकनीकी नियम के कारण उन्हें अपनी नियमित दवा नहीं लेने दी गई थी। हालांकि, भारतीय बैडमिंटन का यह स्टार सेमीफाइनल में इंग्लैंड के राजीव औसेफ से हार गया, लेकिन उन्होंने पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन चेतन आनंद को हराकर अपना पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक (ब्रॉन्ज़ मेडल) जीता। अगले कुछ वर्षों में उन्होंने अपने शानदार प्रदर्शन से कई अन्य पदक जीते।

लंदन 2012 के क्वार्टर-फाइनल में जगह बनाना भी उनके करियर की बड़ी उपलब्धियों में से एक है। यह भारतीय शटलर ने बेल्जियम के युहान टैन और वियतनाम के गुयेन टीएन मिन्ह को हराकर अपने ग्रुप स्टेज में शीर्ष पर रहा और राउंड ऑफ-16 में जगह बनाई। इस राउंड में वह श्रीलंका के निलुका करुणारत्ने को हराने में कामयाब रहे।

जिसके चलते पारुपल्ली कश्यप ने क्वार्टर-फाइनल में जगह बनाई और वह ऐसा करने वाले पहले पुरुष भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बन गए।

हालांकि, वह उस राउंड में अंतिम रजत पदक विजेता ली चोंग वेई से हार गए, लेकिन यह मुक़ाबला काफी कांटे की टक्कर का रहा। वास्तव में कश्यप पहले गेम में 11-8 से आगे थे, लेकिन जल्द ही मलेशियाई ने 18-19 के स्कोर से पीछा करते हुए गेम को अपने पक्ष में कर लिया। कश्यप दूसरे गेम में भी पीछे रह गए, लेकिन उनका प्रदर्शन तारीफ के काबिल रहा।

उन्होंने कहा, "मैंने ओलंपिक से बहुत कुछ सीखा है। पहले मुझे ओलंपिक से बहुत उम्मीदें नहीं थीं। मैं एक ऐसा खिलाड़ी था जिससे किसी को भी बहुत उम्मीद नहीं थी। लेकिन पहले राउंड के बाद मुझे लगा कि मैं यहां पदक जीत सकता हूं। मैं अपने मुक़ाबलों के दिन किसी को भी हरा सकता हूं।”

2013 में पारुपल्ली कश्यप अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ विश्व रैंकिंग में छठे स्थान पर पहुंच गए। हालांकि, चोटों की वजह से उनकी फॉर्म धीरे-धीरे खराब होने लगी। इसके बावजूद वह राष्ट्रमंडल खेलों में एक बार फिर इतिहास रचने में क़ामयाब रहे।

राजीव ओसेफ के हाथों हारने के चार साल बाद उन्होंने सेमीफाइनल में इंग्लैंड के इस खिलाड़ी को शानदार शिकस्त दी। इसके बाद फाइनल में डेरेक वोंग के खिलाफ शानदार जीत दर्ज उन्होंने गोल्ड मेडल जीता। 32 वर्षों में यह पहली बार था जब किसी भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी ने राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण जीता था।

हाल के वर्षों में पारुपल्ली कश्यप को अन्य भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों के आगे बढ़ने का मौका मिला है, हालांकि कई चोटों के कारण कभी वह रुके तो कभी आगे बढ़े। लेकिन यह घुटने की ही चोट थी जिसने उन्हें 2016 ओलंपिक खेलों की दौड़ से बाहर कर दिया था।

2018 में पारुपल्ली कश्यप ने साथी शटलर साइना नेहवाल से शादी की और पति-पत्नी की यह जोड़ी अब टोक्यो ओलंपिक 2021 में जगह बनाने की सोच रही है। सानिया नेहवाल के मैचों के दौरान अक्सर कश्यप न केवल एक सहायक और जीवनसाथी के रूप में मौजूद रहे हैं, बल्कि एक कोच के रूप में भी मदद करते हैं। जिससे कि वह अधिक से अधिक ऊंचाइयों को छू सकें।

भारतीय बैडमिंटन ने बीते कुछ वर्षों में कई विश्व स्तरीय खिलाड़ी निकाले हैं। इस खेल में यह विकास एक क्रांति के जैसा है और पारुपल्ली कश्यप भी इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।

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