गेम्स मेडल

खेल परिणाम खेल इवेंट
टोक्यो 1964
खेल परिणाम खेल इवेंट
टोक्यो 1964
#4 h1 r1/2 Athletics 4 x 400 metres Relay
रोम 1960
खेल परिणाम खेल इवेंट
रोम 1960
#4 Athletics 400 metres
मेलबोर्न 1956
खेल परिणाम खेल इवेंट
मेलबोर्न 1956
#4 h2 r1/4 Athletics 200 metres
#4 h5 r1/4 Athletics 400 metres

द फ्लाइंग सिख

मिल्खा सिंह

भारत
एथलेटिक्स
लम्बाई
172 सीएम / 5'8''
वज़न
66 किग्रो / 145 पाउंड्स
जन्म तिथि
17 अक्तूबर 1935 Punjab, British India
लिंग
पुरुष

मेडल संख्या

0 ओलंपिक मेडल

ओलंपिक गेम्स

3 ओलंपिक गेम्स

मिल्खा सिंह जीवनी

स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्तिगत खेलों स्टार मिल्खा सिंह ने अपनी गति और खेल के लिए जुनून की भावना के साथ एक दशक से अधिक समय तक ट्रैक एंड फील्ड इवेंट में राज किया, कई रिकॉर्ड बनाएं और अपने करियर में कई पदक जीते। मेलबर्न में 1956 ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया, रोम में 1960 के ओलंपिक और टोक्यो में 1964 के ओलंपिक में मिल्खा सिंह अपने शानदार प्रदर्शन के साथ दशकों तक भारत के सबसे महान ओलंपियन बने रहे। 

20 नवंबर 1929 को गोविंदपुरा (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा हैं) में एक सिख परिवार में जन्मे मिल्खा सिंह को खेल से बहुत लगाव था, वह विभाजन के बाद भारत भाग आ गए और भारतीय सेना में शामिल हो गए थे। सेना में रहते हुए ही उन्होंने अपने कौशल को और निखारा। एक क्रॉस-कंट्री दौड़ में 400 से अधिक सैनिकों के साथ दौड़ने के बाद छठे स्थान पर आने वाले मिल्खा सिंह को आगे की ट्रेनिंग के लिए चुना गया। जिसने प्रभावशाली करियर की नींव रखी।

1956 में मेलबर्न आयोजित हुए ओलंपिक खेलों में उन्होंने पहली बार प्रयास किया। भले ही उनका अनुभव अच्छा न रहा हो लेकिन ये टूर उनके लिए आगे चलकर फलदायक साबित हुआ। 200 मीटर और 400 मीटर की स्पर्धाओं में भाग लेने वाले अनुभवहीन मिल्खा सिंह गर्मी के स्टेज से बाहर नहीं निकल सके, लेकिन चैंपियन चार्ल्स जेनकिंस के साथ एक मुलाकात ने उन्हें अपने भविष्य के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा और ज्ञान दे दिया।

मिल्खा सिंह ने जल्द ही अपने ओलंपिक में निराशाजनक प्रदर्शन को पीछे छोड़ दिया और 1958 में उन्होंने जबरदस्त एथलेटिक्स कौशल प्रदर्शित किया, जब उन्होंने कटक में नेशनल गेम्स ऑफ इंडिया में अपने 200 मीटर और 400 मीटर स्पर्धा में रिकॉर्ड बनाए। मिल्खा सिंह ने राष्ट्रीय खेलों के अलावा, टोक्यो में आयोजित 1958 एशियाई खेलों में 200 मीटर और 400मीटर की स्पर्धाओं में और 1958 के ब्रिटिश साम्राज्य और राष्ट्रमंडल खेलों में 400 मी (440 गज की दूरी पर) में स्वर्ण पदक जीते। उनकी अभूतपूर्व सफलता ही थी जिसकी वजह से उन्हें उसी वर्ष पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

मिल्खा सिंह की 46.6 सेकंड की टाइमिंग ने उन्हें स्वतंत्र भारत की ओर से कॉमनवेल्थ गेम्स में पहला स्वर्ण पदक दिलाया, और वह एकमात्र भारतीय पुरुष हैं जिन्होंने व्यक्तिगत एथलेटिक्स कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने का रिकॉर्ड 56 सालों तक बरकरार रखा। इससे पहले कि विकास गौड़ द्वारा 2014 के कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीता जाता, ये रिकॉर्ड मिल्खा सिंह के नाम ही दर्ज था। कृष्णा पूनिया द्वारा 2010 में डिस्कस थ्रो में स्वर्ण पदक जीतने से पहले मिल्खा सिंह ने 52 साल तक “व्यक्तिगत एथलेटिक्स कॉमनवेल्थ गेम्स स्वर्ण पदक जीतने वाले एकमात्र भारतीय” होने का टैग भी अपने पास ही रखा था।

अपने चरम पर पहुंच चुके मिल्खा सिंह ने विभाजन के बाद एक दौड़ के लिए पाकिस्तान जाने का फैसला किया, और उन्होंने अन्य प्रतियोगियों से आगे को पीछे छोड़कर सबसे आगे निकलते हुए शानदार प्रदर्शन किया। इस भारतीय के प्रदर्शन को देखकर पाकिस्तान के जनरल अयूब खान ने उन्हें "द फ्लाइंग सिख" का नाम दिया।

हालाँकि, मिल्खा सिंह के करियर में सबसे नाटकीय पल आना बाकी था। रोम में 1960 के समर ओलंपिक खेलों में वो भारत के सबसे बड़े पदक उम्मीदों में से एक थे, और उनके शानदार प्रदर्शन को देखकर देश उनसे उम्मीदों पर खरे उतरने की उम्मीद कर रहा था।

400 मीटर में दौड़ते हुए मिल्खा सिंह 200 मीटर के निशान तक आगे बढ़ रहे थे, उसके बाद उन्होंने आराम से दौड़ने का फैसला किया, यहीं एक गलती हुई जिसने दूसरों को उनसे आगे निकलने का मौका दिया। दौड़ में कई रिकॉर्ड टूटते हुए देखे गए और अंततः विजेताओं की घोषणा करने के लिए फोटो फिनिश की आवश्यकता पड़ी। जहां संयुक्त राज्य अमेरिका के ओटिस डेविस ने जर्मनी के कार्ल कॉफमैन को कुछ पलों के अंतर से पीछे छोड़कर दौड़ जीती थी, वहीं उस रेस में मिल्खा सिंह 45.73 के समय के साथ चौथे स्थान पर रहे थे – ये एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड था जो 40 वर्षों तक नहीं टूटा था।

धीरे-धीरे अपने करियर में आगे बढ़ते हुए मिल्खा सिंह के करियर का मुख्य आकर्षण 1964 का एशियाई खेल था जहाँ उन्होंने 400 मीटर और 4x400 मीटर रिले स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीते।

टोक्यो में आयोजित हुए 1964 ओलंपिक में मिल्खा सिंह का प्रदर्शन यादगार नहीं था, जहां वो केवल एक ही इवेंट में भाग ले रहे थे, वो था - 4x400 मीटर रिले दौड़- मिल्खा सिंह के नेतृत्व वाली भारतीय टीम गर्मी के कारण आगे बढ़ने में असमर्थ थी।

लंबे समय तक मिल्खा सिंह ने अपने दौड़ने वाले जूते लटका दिए थे। उन्होंने और उनकी बेटी सोनिया सानवालका ने अपनी आत्मकथा "द रेस ऑफ माय लाइफ" लिखी थी, जो जुलाई 2013 में प्रकाशित हुई थी।

बाद में इस पुस्तक को एक बायोपिक में बदल दिया गया, जिसका नाम था भाग मिल्खा भाग, जिसे राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने निर्देशित किया था और अभिनेता फरहान अख्तर ने मिल्खा सिंह की भूमिका निभाई थी। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 2.1 बिलियन की कमाई की थी।

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