गेम्स मेडल

खेल परिणाम खेल इवेंट
लंदन 2012
खेल परिणाम खेल इवेंट
लंदन 2012
#2
Wrestling Welterweight, Freestyle (≤66 kilograms)
बीजिंग 2008
खेल परिणाम खेल इवेंट
बीजिंग 2008
#=3
Wrestling Welterweight, Freestyle (≤66 kilograms)
एथेंस 2004
खेल परिणाम खेल इवेंट
एथेंस 2004
#14 Wrestling Lightweight, Freestyle (≤60 kilograms)

सुशील कुमार

भारत
लम्बाई
166 सीएम / 5'5''
वज़न
66 किग्रो / 145 पाउंड्स
जन्म तिथि
26 मई 1983 Baprola, India
लिंग
पुरुष

मेडल संख्या

2 ओलंपिक मेडल

ओलंपिक गेम्स

3 ओलंपिक गेम्स

सुशील कुमार जीवनी

भारत में पहलवान और पहलवानी दोनों को ही ऊंचा दर्जा दिया जाता है। ऐसे ही एक पहलवान हैं जिन्होंने हर भारतीय के दिल में ख़ास जगह बनाई है। जी हां, हम बात कर रहे हैं दिग्गज रेसलर सुशील कुमार की। सुशील कुमार इकलौते ऐसे भारतीय हैं जिन्होंने व्यक्तिगत इवेंट में दो बार ओलंपिक मेडल जीता है। इतना ही नहीं वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतने वाले वे पहले भारतीय रेसलर भी बने।

बीजिंग 2008 गेम्स में सुशील ने 66 किग्रा में लड़ते हुए ब्रॉन्ज़ मेडल पर अपने नाम की मुहर लगाई। तब से लेकर अब तक भारतीय कुश्ती में साल दर साल बढ़ोतरी ही आई है। ग़ौरतलब है कि यह मेडल 1952 में खाशाबा दादासाहेब जाधव के ब्रॉन्ज़ मेडल के बाद पहलवानी में पहला पदक था।

4 साल बाद यानि लंदन गेम्स के दौरान सुशील ने ज़ोरदार दहाड़ लगाते हुए सिल्वर मेडल अपने नाम किया और देश के गौरव में चार चांद लगा दिए।

तीन बार ओलंपिक गेम्स में भाग ले चुके इस खिलाड़ी ने कहा “रेसलिंग के अलावा मुझे कुछ और नहीं आता।”

साउथ वेस्ट दिल्ली के बापरोला गांव में जन्मे इस पहलवान ने न सिर्फ अपने राज्य को बल्कि पूरे भारत को प्रेरित किया और कुश्ती के नाम को ऊंचा कर दिया। अपने भाई और पिता को देखकर ही उन्होने पहलवानी में कदम रखे और देखते ही देखते वे मिसाल बनते चले गए। अगर इस खिलाड़ी ने भारत को बहुत कुछ दिया है तो भारत ने भी इन्हें अर्जुन अवार्ड, राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड और पद्मश्री अवार्ड से नवाज़ा है।

सुशील ने 14 साल की उम्र में छत्रसाल स्टेडियम में ट्रेनिंग करनी शुरू कर दी थी। पहली बार इस पहलवान ने जीत का स्वाद 1998 वर्ल्ड कैडेट गेम्स में गोल्ड मेडल जीत कर चखा। फिर क्या था, इस खिलाड़ी का मनोबल बढ़ता गया और खिताबों और जीत का सिलसिला शुरू हो गया। इसके बाद उन्होने एशियन जूनियर रेसलिंग चैंपियनशिप में भो गोल्ड जीत कर अपने करियर के शुरूआती दौर को ही नाम कमा लिया था।

सीनियर स्तर पर शुरूआती दौर में सुशील को एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ और गोल्ड मेडल मिला तो वही कॉमनवेल्थ रेसलिंग चैंपियनशिप 2003 में इन्होने पोडियम के सबसे ऊपरी स्थान पर हक जमाया। 2004 एथेंस में पहली बार ओलंपिक गेम्स में शिरकत कर रहे सुशील ने 60 किग्रा भारवर्ग में खेलते हुए 14वें स्थान पर अपने कारवां का अंत किया।

इस दौरान यह युवा पहलवान जीत तो न सका लेकिन उन्होंने अनुभव को सीख कर अपनी झोली में डाला और आगे चल पड़े। इसके बाद सुशील ने 2006 एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता और इसके बाद कॉमनवेल्थ रेसलिंग चैंपियनशिप 2005 और 2006 में अव्वल रहकर सोने के पदक को हासिल किया।

बीजिंग गेम्स में जाने से पहले इन जीतों ने इस खिलाड़ी के अनुभव और मनोबल दोनों को ही बढ़ाए रखा। हालांकि ओपनिंग राउंड में ही इन्हें यूक्रैने के एंड्री स्टैडनिक के सामने हार का सामना करना पड़ा लेकिन रेपेचाज राउंड की बदौलत इन्हें उसी प्रतियोगिता में एक और मौका मिला।

इसके बाद यूएसए के डग श्वाब को धूल चटाने के बाद सुशील ने बेलारूस के अल्बर्ट बैटिरोव पर फतह हासिल की। अब बारी थी ब्रॉन्ज़ मेडल मैच की और इस भारतीय रेसलर ने कज़ाख के लियोनिद स्पिरिडोनोव को 3-2 पटकनी देकर जीत दर्ज की और ओलंपिक गेम्स में पहली बार पोडियम का होस्सा बन गए।

सुशील ने हर बीते साल के मुताबिक खुद को बेहतर किया और अपने करियर को बुलंदियों तक ले गए। इसके बाद यह फ्रीस्टाइल रेसलर 2010 में वर्ल्ड रेसलिंग जीतने वाला पहला भारतीय बना। गर्व और सपनों से भरी इस कहानी में सुशील ने कई स्वर्णमिल पलों को देखा है। इसी साल इस खिलाड़ी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में लगातार तीन गोल्ड मेडल हासिल कर दुनिया भर में एक बार फिर अपने नाम का डंका बजा दिया।

आज भी सुशील कुमार के करियर का सबसे अहम पल लंदन गेम्स में रमज़ान सहिन के खिलाफ माना जाता है। डिफ़ेंडिंग चैंपियन के खिलाफ खेलना आसान नहीं था लेकिन इस भारतीय खिलाड़ी ने उस दिन ऐसा खेल दिखाया कि मैट से लेकर दर्शकों तक बस एक ही नाम गूंज रहा था और वे थे सुशील कुमार।

ओलंपिक में शिरकत कर रहे सुशील ने इख्तियार करीमोविच और अकझुरेक तनातरोव को मात दी और अपने कारवां को आगे बढ़ाया। फाइनल मुकाबले में भारतीय मिटटी के इस शेर का सामना जापानी तात्सुहीरो योनेमित्सु से हुआ। हालांकि सुशील इस मुकाबले को जीत तो न सके लेकिन भारत में एक भी दिल ऐसा नहीं रहा जिस पर उन्होने राज न किया हो।

रियो ओलंपिक में भाग न लेने की वजह से भारतीय रेसलर सुशील कुमार अपने चौथे ओलंपिक यानि टोक्यो 2020 की ओर बढ़ रहे हैं। अगर जापानी ज़मीन पर खेलना है तो इस पहलवान को ओलंपिक क्वालिफ़ायर्स के ज़रिए अपना रास्ता बनाना होगा।

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