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ऐतिहासिक 2011 AFC एशियन कप अभियान के 10 साल: जब ब्लू टाइगर्स ने एशिया के मंच पर दिखाया पराक्रम  

अपने ग्रुप के तीनों मैच हारने के बाद भी एशियन कप कई मायने में भारत के लिए गर्व का क्षण 

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

10 जनवरी, भारतीय फुटबॉल प्रेमियों के लिए यादगार एक विशेष तारीख है। इसी दिन 10 साल पहले भारतीय फुटबॉल टीम ने आखिरकार 27 साल बाद AFC एशियन कप में अपनी बहुप्रतीक्षित वापसी की थी।

भारत पर 1950 और 1960 के दशक के बाद इस महाद्वीप पर दोबारा वर्चस्व कायम करने का दबाव था, जब टीम में पीके बनर्जी, चुन्नी गोस्वामी, जरनैल सिंह, पीटर थंगराज और कई ऐसे खिलाड़ी थे।

लेकिन 80 और 90 के दशक में भारतीय फुटबॉल में गिरावट देखी गई। 2011 से पहले भारत ने एशियाई कप 1984 में क्वालिफाई किया था।

कई कारणों के अलावा 2011 का एशियन कप भारत के फुटबॉल प्रेमियों के लिए इसलिए भी हमेशा ख़ास रहेगा क्योंकि इसमें ब्लू टाइगर्स अपने ग्रुप के तीनों मैच हार गए और बिना अंक हासिल किए बाहर हो।

ऐसे में यह माना गया कि भारत को एक बहुत मजबूत ग्रुप में शामिल किया गया था। इसमें ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और बहरीन शामिल थे। अनुभवी भारतीय प्रशंसकों के लिए देश को महाद्वीप के सबसे बड़े मंच पर एशियाई फुटबॉल के दिग्गजों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करते देखना रोमांचक अहसास था।

इन मैचों में भारत के खिलाफ कई बड़े नामचीन खिलाड़ियों ने भी इस मौके को खास बनाया।

आइए एक नजर डालते हैं 2011 के एशियाई कप में भारत के प्रदर्शन पर-

भारत ने 2008 AFC चैलेंज कप जीतकर 2011 के एशियाई कप के लिए क्वालिफाई किया

AFC चैलेंज कप फुटबॉल में उभरते भारत जैसे देशों में इस खेल के स्तर को बढ़ाने के लिए AFC द्वारा आयोजित किया जाने वाला एक टूर्नामेंट था। टूर्नामेंट के विजेताओं को एशियाई कप में खेलने का मौका मिल जाता था।

भारत टीम ने उनकी मेजबानी में आयोजित 2008 के संस्करण का एशियाई कप के लिए 27 साल बाद फिर से क्वालिफाई करने के लिए पूरा इस्तेमाल किया।

ब्लू टाइगर्स ने अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और म्यांमार जैसी टीमों को हराकर ताजिकिस्तान के साथ फाइनल में प्रवेश किया। कड़े मुकाबले में सुनील छेत्री की हैट्रिक और बाईचुंग भूटिया के गोल की बदौलत भारत ने दिल्ली के अंबेडकर स्टेडियम में एक यादगार जीत दर्ज की।

टीम

2011 एशियाई कप खेलने वाले भारतीय टीम को 1979 के यूरोपीय कप में स्वीडिश क्लब माल्मो एफएफ को फाइनल में पहुंचाने वाले बॉब हॉगटन ने प्रशिक्षित किया।

टीम का नेतृत्व स्टार स्ट्राइकर बाईचुंग भूटिया ने किया। यह उनके करियर के खत्म होने का समय था और एशियाई कप भारत के लिए उनका आखिरी प्रतिस्पर्धी टूर्नामेंट था। टीम में महेश गवली, अभिषेक यादव (जो अब अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ के महासचिव हैं) और क्लाइमेक्स लॉरेंस जैसे अनुभवी खिलाड़ी भी शामिल थे।

जो खिलाड़ी एशियाई कप में एक स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा में थे, उन्हअखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) के तहत लिया गया था। साथ ही उन्हें टूर्नामेंट के खत्म होने तक अपने संबंधित क्लबों का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं थी।

भारतीय टीम ने पुर्तगाल, थाईलैंड, यूएई और कुछ और गंतव्यों की यात्रा कर लम्बे प्रशिक्षण शिविरों में सहयोगियों के साथ मिलकर कतर में आयोजित टूर्नामेंट में खुद को सर्वश्रेष्ठ रूप से तैयार करने के लिए हर संभव प्रयास किया।

पूरी टीम:

GK: सुब्रत पाल (पुणे एफसी), सुभाशीष रॉय चौधरी (डेम्पो एससी), गुरप्रीत सिंह संधू (AIFF XI)।

DEF: अनवर अली (डेम्पो एससी), महेश गवली (डेम्पो एससी), दीपक मोंडल (मोहन बागान एसी), एनएस मंजू (मोहन बागान एसी), राकेश मसीह (मोहन बागान एसी), सैयद रहीम नबी (ईस्ट बंगाल क्लब), गौरमंगी सिंह (चर्चिल ब्रदर्स एससी), गोविन सिंह (ईस्ट बंगाल क्लब), सुरकुमार सिंह (मोहन बागान एसी)।

MID: स्टीवन डायस (चर्चिल ब्रदर्स एससी), क्लाइमेक्स लॉरेंस (डेम्पो एससी), क्लिफर्ड मिरांडा (डेम्पो एससी), एनपी प्रदीप (महिंद्रा यूनाइटेड), बलदीप सिंह जूनियर (JCT), रिमी सिंह (ईस्ट बंगाल क्लब), महराजुद्दीन वाडू (ईस्ट बंगाल क्लब)

FWD: बाइचुंग भूटिया (कप्तान- ईस्ट बंगाल क्लब), सुनील छेत्री (कंसास सिटी विजार्ड्स), सुशील कुमार सिंह (ईस्ट बंगाल क्लब), अभिषेक यादव (मुंबई एफसी)।

पहला मैच: भारत 0-4 ऑस्ट्रेलिया- 10 जनवरी 2011

प्रतियोगिता में ब्लू टाइगर्स के सबसे कम रैंक वाले खिलाड़ी थे। उनके सामने ग्रुप सी के अपने पहले ही मैच में स्टार खिलाड़ियों से भरी ऑस्ट्रेलिया टीम को मात देने का चुनौतीपूर्ण लक्ष्य था। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि भारत अल सद्द स्टेडियम में हुए पहले ही मैच में 4-0 से हार गया। स्टेडियम में मौजूद 13000 दर्शकों ने भारतीय टीम का खूब उत्साहवर्धन किया, लेकिन टीम,लुकास नील और गोलकीपर मार्क श्वार्जर के नेतृत्व में अनुभवी ऑस्ट्रेलियाई डिफेंस को नहीं तोड़ सकीऑस्ट्रेलिया की ओर से स्टार खिलाड़ी पूर्व एवर्टन फार्वर्ड टिम काहिल, पूर्व लिवरपूल विंगर हैरी केवेल और पूर्व ब्लैकबर्न रोवर्स मिडफील्डर ब्रेट एमर्टन ने गोल किए। काहिल खेल में एक ब्रेस भी मिला।

भारतीय रक्षक सुब्रत पॉल ने हवा में उछलते हुए कुछेक बचाव करके ख्याति जरूर कमाई और इसके लिए उन्हें 'स्पाइडरमैन' उपनाम दिया गया।

मैच 2: भारत 2-5 बहरीन- 14 जनवरी 2011

चार दिन बाद भारत ने बहरीन के खिलाफ ग्रुप का दूसरा मैच खेला। 2011 के संस्करण में यह शायद भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था, हालांकि उन्हें पांच गोल खाने पड़े।

पैनल्टी मिलने के बाद बहरीन ने फौजी आशिष के माध्यम से शुरुआती बढ़त बनाई। हालांकि, अगले ही मिनट में गौरमंगी सिंह के गोल के जरिये भारत ने वापसी की। अभिषेक यादव द्वारा रेंडी सिंह के फ्लैग-किक से मारी गई गेंद को गौरामंगी की ओर भेजा इसके बाद मध्य में खड़े गौरामंगी ने गोल करने में कोई चूक नहीं की।

सुनील छेत्री 

इसके बाद बहरीन के इस्माएल अब्दुलातिफ ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 19 मिनट के भीतर तीन गोल दागे, लेकिन भारत ने 52वें मिनट में वापसी करते हुए एक गोल और किया। यादव द्वारा एक बार फिर से गोल की तरफ मारने से पहले रैंडी का शॉट क्रॉसबार से बाहर आ गया। गेंद छेत्री के सिर के करीब से गुजरते हुए गोल में जा गिरी और स्कोर 4-2 पर पहुंच गया। अब्दुलातिफ ने अपना चौथा गोल किया, लेकिन भारत के पास भी अभी मौके थे।

लॉरेंस, छेत्री और यादव स्कोरलाइन के करीब भी पहुंच, लेकिन मैच 5-2 के स्कोर के साथ समाप्त हो गया। भारत ने पूरे मैच में 12 शॉट लगाये जिनमें से पांच लक्ष्य पर पहुंचे।

मैच 3: भारत 1-4 दक्षिण कोरिया - 18 जनवरी 2011

दक्षिण कोरिया के खिलाफ अंतिम मैच एक भूलने जाने वाली घटना थी। मैच शुरू होने के 10 मिनट के भीतर ही भारत 2-0 से पिछड़ गया। हालांकि, छेत्री ने एक पैनल्टी के साथ इस अंतर को कम करने का प्रयास किया, लेकिन यह वन वे ट्रेफिक बनकर रह गया।

दक्षिण कोरियाई के ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ी आक्रमण करने लगे और दूसरे हाफ में दो और गोल करके स्कोर 4-1 कर पहुंचा दिया।

हालांकि, मैच दो महत्वपूर्ण क्षणों के लिए जरूर याद किया जाएगा। इसमें से एक है जब भारत के सबसे महान फुटबॉलरों में से एक बाइचुंग को अंतिम अंतर्राष्ट्रीय मैच के 78वें मिनट में सब्स्टिटूट के रूप में उपस्थिति मिली।

इससे अधिक दिलचस्प बात यह है कि खेल टोटेनहम हॉट्सपुर के स्टार फॉरवर्ड सोन ह्युंग-मिन के लिए भी यादगार होगा, जिन्होंने 81वें मिनट में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय गोल करके टीम का स्कोर 4-1 पहुंचाया।

यदि आप इसे स्कोर के हिसाब से देखते हैं तो यह भारत के लिए एक महान प्रतियोगिता नहीं थी। लेकिन एक मिसाल के रूप में देखें तो इस प्रतियोगिता के जरिये भारत टीम ने दिखाया कि वह हर स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती है। यह निश्चित रूप से भारत के लिए गर्व का क्षण था कि 30 साल बाद फिर से भारतीय टीम एशिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करने के लिए उतरी।