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भारत की भावी महिला मुक्केबाजी स्टार मनीषा मौन के बारे में जानिए पांच रोचक तथ्य  

मौन ने अब रखा है ओलंपिक में जगह पक्की करने का लक्ष्य    

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

हाल ही में सम्पन्न हुआ कोलोन बॉक्सिंग विश्व कप भारतीय मुक्केबाजों लिए लाभदायक सिद्ध हुआ। यहां उन्होंने कुल नौ पदक जीते जिनमें तीन स्वर्ण पदक शामिल थे।

स्वर्ण पदक के साथ घर लौटने वाले तीन भारतीय मुक्केबाजों में युवा मुक्केबाज मनीषा मौन के साथ अमित पंघाल (52 किग्रा) और सिमरनजीत कौर (महिला 60 किग्रा) शामिल थीं।

मौन ने फेदरवेट (57 किग्रा) वर्ग में दो बार की AIBA महिला युवा विश्व चैंपियन और हमवतन साक्षी चौधरी को निकटतम मुकाबले में 3-2 से हराकर स्वर्ण पदक जीता। 22 वर्षीय मौन ने जीत दर्ज करने के लिए साक्षी पर प्रमुखता से वार किए। आइए नजर डालते हैं राष्ट्रीय स्तर पर उनकी शोहरत की यात्रा पर—

शुरुआत में था वॉलीबॉल से लगाव

मौन गरीब परिवार से आती हैं। उसके पिता ट्रैक्टर मैकेनिक थे। वह हरियाणा के कैथल जिले में जन्मीं और तीन भाई—बहनों में सबसे छोटी हैं। उत्साही मौन की कम उम्र में ही खेल में गहरी रुचि पैदा हो गई।

हालांकि उनके माता-पिता किसी भी खेल में उसकी भागीदारी के खिलाफ थे। उनके भाई के प्रभाव में उनका पहली बार वॉलीबॉल से परिचय हुआ। वह अक्सर भाई के साथ वॉलीबॉल खेलने घर से बाहर चली जाती थी।

कोलोन बॉक्सिंग वर्ल्ड कप में वुमेंस इवेंट में 57 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में हमवतन साक्षी चौधरी के खिलाफ मनीषा मौन। फोटो: BFI

बॉक्सिंग में आने की उनके पिता को नहीं थी जानकारी

मौन के जीवन में अहम मोड़ तब आया, जब एक बॉक्सिंग कोच ने उसे भाई के साथ वॉलीबॉल खेलते हुआ देखा। 12 साल की उम्र में कोच ने उसे गुप्त रूप प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया हालांकि इसके बारे में उनके पिता को कोई जानकारी नहीं थी।

मौन ने जल्द ही रैंक को उपर पहुंचाया और अपने पिता को बिना बताये स्थानीय प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू कर दिया।

कैथल के एक स्थानीय अखबार में मौन की फोटो देखकर उनके पिता को तगडा झटका लगा। अखबार में मौन के राज्य स्तरीय मुक्केबाजी चैम्पियनशिप में पदक जीतने वाली फोटो प्रकाशित हुई थी। इसके बाद उनके पिता ने मौन के द्वारा करियर के लिए चुने गए क्षेत्र को स्वीकार कर लिया।

मौन- जाइंट किलर

मौन की प्रतिभा 2018 AIBA महिला विश्व चैंपियनशिप के दौरान सामने आई। यहां उन्हें 'जाइंट किलर' उपनाम मिला। उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका की क्रिस्टीना क्रूज़ में एक और विश्व चैम्पियनशिप पदक विजेता को हराकर 54 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए कजाकिस्तान की विश्व चैंपियन दीना झालमन को हराया। वह क्वार्टर फाइनल में पहुंची लेकिन पदक नहीं जीत सकीं लेकिन बडे मुक्केबाजों के खिलाफ उनके प्रदर्शन की हर तरफ प्रशंसा हुई।

इतालवी मुख्य कोच राफेल बर्गेमास्को उनके कभी हार ना मानने वाले रवैये की प्रशंसा की थी।

राफेल ने ईएसपीएन को बताया था कि, ''दूसरों के साथ आप जानते हैं कि वे विश्व चैंपियनशिप से पहले कुछ दबाव ले सकते हैं लेकिन मनीषा के साथ ऐसा नहीं है।''

एशियाई चैम्पियनशिप पदक

नेशनल चैंपियनशिप में उनका अच्छा प्रदर्शन जारी रहा। उन्होंने 2019 नेशनल चैंपियनशिप में रजत पदक जीता और इसी साल में एशियाई एमेच्योर मुक्केबाजी चैंपियनशिप में बैंटमवेट श्रेणी (54 किग्रा) में कांस्य पदक के साथ साल को यादगार बना दिया।

चोट और फेदरवेट श्रेणी में परिवर्तन

2019 के बाद एक मुकाबले के दौरान कोहनी में चोट के कारण मौन की प्रगति में ठहराव आ गया।

ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने के लिए उन्होंने फेदरवेट श्रेणी (57 किग्रा) में जाने का फैसला किया। नतीजतन वह 2019 AIBA महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप में भारतीय टीम से बाहर हो गई।

नए भार-वर्ग के लिए अभ्यस्त होने के बाद उन्होंने 2020 में कर्नाटक के इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट (IIS) में कोच रॉन सिम्स जूनियर से प्रशिक्षण लिया।

अब एक आत्मविश्वास बढ़ाने वाली जीत के बाद वह अगले साल टोक्यो ओलंपिक में जगह पक्की करने की उम्मीद लगा रही है।