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अपूर्वी चंदेला का जयपुर से टोक्यो 2020 तक का प्रेरणादायक सफर 

अभिनव बिंद्रा से प्रेरित प्रेरित होकर अपूर्वी चंदेला ने शूटिंग की दुनिया में बढ़ाएं कदम 

लेखक जतिन ऋषि राज ·

11 अगस्त, 2008, भारतीय खेल के लिए एक ऐसा सुनहरा दिन जिसे आज तक हर भारतीय खेल प्रेमी गर्व से याद करता है। इस दिन भारत का तिरंगा ओलंपिक गेम्स के मंच पर सबसे ऊंचा लहराया था। यह कारनामा करने वाले और कोई नहीं बल्कि शूटिंग के मास्टर कहे जाने वाले अभिनव बिंद्रा थे। न जाने कितने ऐसे युवा खिलाड़ी हैं जिन्होंने बिंद्रा से प्रेरणा लेकर निशानेबाज़ी को शौक से ऊपर रख अपना पेशा बनाया। बिंद्रा को अपना हीरो मानने वाली अपूर्वी चंदेला ने भी निशानेबाज़ी को अपने जीवन में अहम जगह दी।

सफलता की सीढ़ी

अपने ही घर के गार्डन में अभ्यास करती चंदेला ने जयपुर में होने वाले स्टेट लेवल शूटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और अपना पहला ब्रॉन्ज़ मेडल भी जीता। पढ़ाई और खेल को साथ लेकर चल रही इस युवा ने दिल्ली जाकर सोशियोलॉजी में दाखिला लिया। दिल्ली में ही चंदेला को साल 2012 में नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में मौका मिला और वहां उन्होंने गोल्ड मेडल जीत कर अपनी नींव को और मज़बूत किया। साल 2013 में चंदेला ने शूटिंग को पूरी तरह से अपना लिया और राकेश मानपत से ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया।

अपने 2014 कॉमनवेल्थ गोल्ड मेडल के साथ अपूर्वी चंदेला (दाएं)

तेज़ रफ़्तार से चलती इस दुनिया में चंदेला ने अपने हौंसलों को नई उड़ान दी और बता दिया कि कठिन परिश्रम ही सफलता की कूंजी है। साल 2014 में नीदरलैंड में हुए इंटरशूट चैंपियनशिप में अपना दबदबा बनाए रखते हुए इस निशानेबाज़ ने चार मेडल हासिल किए और विदेशी सरज़मीं पर भारत का नाम रोशन किया। इसके बाद वह पल आया जिसका उन्हें बेसब्री से इंतज़ार था। साल 2014 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर वह सभी का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब रहीं। उनकी यह जीत इसलिए भी ख़ास रही क्योंकि इस टूर्नामेंट से पहले वह लिगामेंट की चोट से जूझ रही थीं।

फर्श से अर्श तक का सफऱ

चंदेला का सफ़र तो जयपुर के उस घर से ही शुरू हो गया था जहां उनका परिवार उन्हें हर तरह से सफल बनाने में लगा हुआ था। कॉमनवेल्थ गेम्स में उम्दा प्रदर्शन करने के एक साल बाद इस निशानेबाज़ ने सा 2015 में चांगवन वर्ल्ड कप में ब्रॉन्ज़ मेडल जीत कर रियो ओलंपिक 2016 का अपना टिकट हासिल किया। हालांकि रियो ओलंपिक चंदेला के लिए कुछ ख़ास साबित न हो सका और उन्होंने 34वें स्थान पर प्रतियोगिता समाप्त की। इस 23 वर्षीय युवा निशानेबाज़ की फॉर्म पर सवाल उठने लगे,लेकिन कहते हैं ना कि असली खिलाड़ी वही है जो गिर कर खड़ा हो 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स बना चंदेला के लिए सुनहरा मौका जहां उन्होंने ब्रॉन्ज़ मेडल जीतकर आलोचकों को जवाब दिया और कुछ महीने बाद होने वाले एशियन गेम्स के लिए अपना आत्मविश्वास बढ़ाया। एशियन गेम्स में 10 मीटर एयर राईफल में भाग ले रही चंदेला ने फिर एक बार ब्रॉन्ज़ मेडल पर निशाना साधा और अपनी सफलता की कहानी में चार-चांद लगा दिए। मिक्स्ड टीम में खेलते हुए यह मेडल रवि कुमार और अपूर्वी चंदेला के नाम एक साथ लगा।

रास्ता अभी बाकी था और मंज़िल अभी दूर। चंदेला का अगला लक्ष्य बना आई.एस.एस.एफ वर्ल्ड चैंपियनशिप 2018, और हमेशा की तरह इस काबिल निशानेबाज़ ने निराश न करते हुए प्रतियोगिता चौथे स्थान पर अंत करते हुए ओलंपिक गेम्स 2020 के लिए क्वालीफाई किया। यह कहना गलत नहीं होगा कि ओलंपिक 2020 के लिए भारत की ओर से एक से बढ़कर एक खिलाड़ी तैयार हो रहे हैं जो अपने देश के गौरव को जापान की ज़मीन पर बढ़ाएंगे।

यह जयपुर की रहने वाली निशानेबाज़ मानो रुकने का नाम ही नहीं ले रही और एक के बाद एक सफलता की सीढ़ी चढ़ती जा रही है। नई दिल्ली में हुए आई.एस.एस.एफ वर्ल्ड कप में चंदेला ने एक और गोल्ड मेडल अपने नाम किया और बाकी युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनीं। छोटी उम्र से ही निशानेबाज़ी में दिलचस्पी रखने वाली अपूर्वी चंदेला की कहानी में एक नया और सुनहरा मोड़ अगले साल आ सकता है जब वह भारत की ओर से टोक्यो ओलंपिक 2020 में कदम रखेंगी।