बलबीर सिंह दोसांज: एक ऐसे हॉकी दिग्गज जिनके नाम अब तक है ओलंपिक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड

जानिए कैसे तीन बार के ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता और भारतीय पुरुष हॉकी टीम के पूर्व कप्तान बलबीर सिंह दोसांज ने मैदान पर अपना दबदबा कायम रखते हुए भारत को गौरवान्वित किया। 

भारतीय पुरुष हॉकी की बात करें तो ज़हन में पहला नाम मेजर ध्यान चंद (Dhyan Chand) का आता है। उसके बाद इसी टीम द्वारा ओलंपिक में जीते उन लगातार 6 खिताबों का ज़िक्र होता है जिसने इस खेल से देश को गौरवान्वित किया है। असल मायनों में भारत ने हॉकी को और हॉकी ने भारत को बहुत ही पसंद किया है। 

हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले ध्यान चंद की बात की जाए तो लोगो ने यहां तक कह दिया था कि कहीं उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक तो नहीं लगा है और इसी वजह से वो गेंद को अपनी ओर खींच लेते हैं। उनकी काबिलियत और कौशल को देखकर आलोचक भी प्रशंसक बन जाते थे और हर कोई उनका दीवाना हो गया था।

भारतीय मेंस हॉकी टीम में ऐसा ही एक खिलाड़ी और भी था, जिसने अपने देश की मिट्टी को खून और पसीना दिया और हॉकी में मिली जीत का बराबरी का हिस्सेदार भी रहा। उनका नाम है बलबीर सिंह दोसांज (Balbir Singh Dosanjh)। अनोखा खेल, अनूठी तकनीक और बेहतरीन फिनिशिंग स्किल के हुनरमंद बलबीर सिंह दोसांज को बहुत सरल स्वभाव का माना जाता है, वे अब इस दुनिया में नहीं रहे। बीते दो सप्ताह से अस्पताल में भर्ती इस हॉकी खिलाड़ी ने आज अंतिम सांस ली और हमे उनके करियर और ज़िंदगी पर गर्व है।

द हिंदू से बात करते हुए इस दिग्गज खिलाड़ी ने कभी कहा था, “नियति ने मुझे अपने करियर के दौरान उपलब्धियों को हासिल करने में मदद की है।”

बंटवारे के बाद देश के लिए हासिल किया गोल्ड

12 साल के नन्हे बलबीर सिंह ने बर्लिन 1936 में भारतीय मेंस हॉकी टीम को गोल्ड मेडल जीतते हुए देखा और तभी उनके सिर पर हॉकी खेलने की धुन सवार हो गई थी। 6 साल बाद वे अमृतसर चले गए जहां भारतीय टीम के कोच हर्बैल सिंह (Harbail Singh) ने इन्हें परखा और वहां से इनकी हॉकी की कहानी शुरू हुई।

बलबीर सिंह का ताल्लुक फ्रीडम फाइटर परिवार से था और इसके चलते उन्होंने अपने पिता को बहुत कम ही घर पर देख। उनके पिता कभी लड़ाई में शामिल होते तो कभी जेल में दिन गुज़ार रहे होते थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि बलबीर सिंह के खून में ही देश की सेवा करना था।

20 साल के बलबीर आंखों में भूख और बाजुओं में कला लेकर आगे बढ़ रहे थे कि पंजाब पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें गिरफ्तार किसी गलत वजह के लिए नहीं किया गया था, वे चाहते थे की बलबीर उनकी टीम से खेलें। टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए इंटरव्यू में बलबीर ने कहा, “मेरे पिता और अंकल क्रांतिकारी थे और पुलिस ब्रिटिश की वफ़ादार थी। ऐसे में मैं कैसे उनकी ओर से खेल सकता था।

स्वतंत्रता के बाद पंजाब को बांट दिया गया और एक ही रात में बलबीर के साथी खिलाड़ी पाकिस्तान चले गए। ऐसे माहौल में जब पंजाब की ज़मीन पर गरीबी और भुखमरी छाई हुई थी, बलबीर सिंह दोसांज के मन में गोल्ड जीतने का जुनून जन्म ले रहा था।

सपनों को पूरा करना कभी भी किसी के लिए आसान नहीं होता है। बलबीर सिंह के साथ भी ऐसा ही हो रहा था। जब लंदन ओलंपिक 1948 में उनका नाम टॉप 39 मैन स्क्वॉड में नहीं आया। डिकी कैर (Dickie Carr) जो कि 1932 ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता टीम का हिस्सा थे, तब उनकी सिफारिश से ही बलबीर को टॉप 20 में जगह दी गई।

हालांकि राह अभी भी आसान नहीं थी और इस दिग्गज खिलाड़ी को पहले मुकाबले में बाहर रखा गया और खेलने का मौका नही दिया। अर्जेंटीना के खिलाफ रॉनी रोड्रिग्ज़ (Reonnie Rodrigues) को चोट लगने के कारण फिर बलबीर को मौका दिया गया और वह मुकाबला भारत ने 9-1 से जीता। गौरतलब है कि उन 9 गोल में से 6 गोल बलबीर की हॉकी स्टिक से आए थे।

इसके बाद एक बार फिर बलबीर सिंह को टीम से निकाल दिया गया और आगे खेलने का मौका नहीं दिया गया। इस निर्णय से कुछ नाराज़ मेडिकल छात्रों ने इंडियन हाई कमिश्नर, लंदन में आवाज़ उठाई और तब जाकर बलबीर को ओलंपिक फाइनल में मौका दिया गया।

वेम्बली स्टेडियम में ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ खेलते हुए बलबीर सिंह ने दो और गोल दागे और अपने हुनर को फिर से साबित किया। वह मुकाबला भारत ने 4-0 से अपने नाम किया और ओलंपिक गेम्स में वह भारतीय मेंस हॉकी टीम की लगातार चौथी खिताबी जीत थी।

ESPN से बातचीत के दौरान बलबीर सिंह ने कहा था, “1948 में पहली बार भारत का तिरंगा सबसे ऊंचा लहराया था। मुझे लग रहा था कि उस तिरंगे के साथ मैं भी बढ़ रहा हूं। फिर मुझे लगा कि नहीं मैं ज़मीन पर ही हूं। मुझे आज भी वह भावना याद है, मुझे लगा था कि मैं ऊपर बढ़ रहा हूं, हवा में उड़ रहा हूं।

दबदबा बनाते हुए बलबीर सिंह

अगले ओलंपिक यानी 1952 तक बलबीर सिंह दोसांज भारतीय पुरुष हॉकी टीम का एक अहम हिस्सा बन गए थे। इस दौरान केडी बाबू (KD Babu) को हेलसिंकी ओलंपिक (Helsinki Olympics) के लिए उप-कप्तान बनाया गया था। उस साल बाबू भारत के लिए फ्लैग भी होस्ट कर रहे थे।

आगे चलकर उन्होंने अपनी संस्मरण ‘द गोल्डन हैट्रिक’ में लिखा, “फिनलैंड को लैंड ऑफ़ मिडसमर नाईट्स कहा जाता है। पहली रात हमारे लिए बहुत खराब थी। खुली खिड़की की वजह से हम लोग सो नहीं पाए थे। अपने कमरों में दिन में हम सूरज की किरणों के विपरीत सोया करते थे और पर्दों को गिराकर कमरे में अंधेरा कर लिया करते थे।”

1952 ओलंपिक गेम्स में बलबीर ने साबित कर दिया कि वह इस टीम की जान हैं और उन्होंने पूरी प्रतियोगिता में कुल 9 गोल दागे जिसमें सेमीफाइनल और फाइनल में उन्होंने हैट्रिक भी लगा दी। उस समय बलबीर सिंह ने फाइनल में नीदरलैंड के खिलाफ 5 गोल किए थे और भारत वह मुकाबला 6-1 से जीता था। बलबीर की हॉकी स्टिक से निकले 5 गोल आज भी रिकॉर्ड की तरह स्थापित हैं और कोई भी खिलाड़ी ओलंपिक गेम्स के एक मुकाबले में इससे ज़्यादा गोल दागने में असमर्थ रहा है। आज इस रिकॉर्ड को लगभग 70 साल हो गए हैं और आज भी यह रिकॉर्ड स्वर्गवासी बलबीर सिंह दोसांज के नाम है।

मेलबर्न 1956 (Melbourne 1956) में बलबीर सिंह को टीम का कप्तान चुना गया। हालांकि इस बार उन्होंने वह करिश्मा तो नहीं किया जिसकी वजह से वह जाने थे और उधम सिंह (Udham Singh) ने 15 गोल दागकर हॉकी के मैदान पर अपने नाम की छाप छोड़नी शुरू कर दी थी। इस दौरान बलबीर सिंह के दाएं हाथ में फ्रैक्चर हो गया था लेकिन उन्होंने अपना पूरा ज़ोर भारतीय टीम को फाइनल तक पहुंचाने में लगा दिया। हमेशा की तरह भारतीय वीर जब हॉकी फील्ड पर उतरा तो जीत उनके साथ उतरी और भारत ने अपनी झोली में छठा ओलंपिक गोल्ड डाल लिया था।

हॉकी के साथ अलग ही लगाव

इसके बाद उपलब्धियां नहीं रुकी और बलबीर सिंह दोसांज पद्मा श्री अवार्ड जीतने वाले पहले खिलाड़ी बने। यह खिताब उन्हें सन 1957 में दिया गया था और इसके बाद भी उनकी हॉकी ने कमाल करना नहीं छोड़ा। 1958 एशियन गेम्स (1958 Asian Games) में भारत ने सिल्वर मेडल अपने नाम किया था।

इसके बाद बलबीर सिंह ने कभी ही ओलंपिक गेम्स में बतौर खिलाड़ी हिस्सा नहीं लिया लेकिन खेल से लगाव के कारण उन्होंने कोचिंग देने का फैसला किया। देखते ही देखते वह भारतीय पुरुष हॉकी टीम के एल सफल भी कोच बन गए थे।

इसके बाद बलबीर सिंह ने अपने कोचिंग के कौशल से भारतीय टीम को 1971 वर्ल्ड कप (1971 World Cup) में ब्रॉन्ज़ मेडल हासिल करने में मदद की। कहते है न कि खिलाड़ी को मेडल नहीं गोल्ड मेडल ही संतुष्ट कर सकता है और बलबीर के साथ भी ऐसा ही हुआ। 1975 वर्ल्ड कप आ चुका था और इस दिग्गज ने इसमें भी टीम को गोल्ड मेडल दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसी बीच उनका नाम बलबीर सिंह दोसांज से बलबीर सिंह सीनियर हो गया था क्योंकि 1968 ओलंपिक गेम्स में तीन और बलबीर सिंह नाम के खिलाड़ी भारतीय टीम का हिस्सा बन गए थे और इस टीम ने ब्रॉन्ज़ मेडल भी जीता था।

देश और खेल से इतनी मोहब्बत थी कि इस दिग्गज ने 1962 में चीन के खिलाफ जंग के दौरान अपने गोल्ड मेडल की नीलामी कर अपने देश की मदद की। बलबीर सिंह सीनियर एक पारिवारिक जीवन व्यतीत कर रहे थे जिसमें उनकी सुपुत्री सुश्बीर (Sushbir) और पुत्र कबीर (Kabir) शामिल हैं।

जब भी उनकी सेहत उन्हें अनुमति देती थी तब वो हॉकी के मुकाबले देखने जाते थे और इस बार टीम से एक ख़ास ख्वाहिश भी ज़ाहिर की। बलबीर सिंह दोसांज ने अपनी इच्छा जताते हुए कहा, “मैं चाहता हूं भारतीय हॉकी एक बार फिर ऊपर जाए और 2024 पेरिस गेम्स में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर रहे। तब तक में 100 साल का भी हो जाऊंगा।”

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