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कभी बास्केटबॉल में भी बॉस था भारत: मिलिए उन खिलाड़ियों ने जिन्होंने भारतीय बास्केटबॉल को दिलाई पहचान

1960 के दशक में खुशी राम से लेकर वर्तमान में अमज्योत सिंह गिल तक, भारतीय बास्केटबॉल को लगातार आगे बढ़ते हुए देखा गया है। NBA ने भी इसके विकास में मदद की है।

लेखक विवेक कुमार सिंह ·

पिछले एक दशक में बास्केटबॉल ने भारत में अपने पंख फैलाए हैं, लेकिन इसका श्रेय मुख्य रूप से NBA की योजनाओं को जाता है, जिसमें लोगों को इस खेल में दिलचस्पी बनाने में मदद की है।

भारतीय बास्केटबॉल टीम (Indian Basketball Team) का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव उतना अच्छा नहीं है और खिलाड़ियों को लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है। खिलाड़ियों के पास एक्सपोज़र और लाइमलाइट भी सीमित हो गई है। लेकिन जैसे ही कोई अवसर दिखाई देता है, भारतीय प्रतिभाशाली हूपस्टर्स बास्केटबॉल के उत्थान में लग जाते हैं।

ऐसे ही कुछ सर्वश्रेष्ठ भारतीय बास्केटबॉल खिलाड़ियों पर एक नज़र डालते हैं।

ख़ुशी राम

एशिया के स्कोरिंग मशीन के नाम से जाने जाने वाले खुशी राम (Khushi Ram) अपने जमाने के सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक थे।

हरियाणा के गांव जमहरी में जन्मे खुशी राम ने 1952 में घरेलू स्तर पर प्रतिस्पर्धा शुरू की, धीरे धीरे वो इंडियन आर्म्ड फोर्स के लिए विभिन्न राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में खेलने लगे। 

अपने लगातार स्कोर करने की काबिलियत की वजह से ख़ुशी राम ने इंडियन आर्म्ड फोर्स को लगातार 10 राष्ट्रीय खिताबों दिलाई और कई ‘बेस्ट प्लेयर’ का खिताब अपने नाम किया। 

उन्होंने जल्द ही भारतीय बास्केटबॉल टीम में अपनी जगह बनाई और 1964-72 तक टीम के अभिन्न अंग बन गए थे, ये वो दौर था जब वो अपनी सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में थे।  

ख़ुशी राम 1965 के एशियन बास्केटबॉल चैंपियनशिप (जिसे अब FIBA एशिया कप के नाम से जाना जाता है) में डेब्यू करने वाली भारतीय टीम के कप्तान थे। 

भारत ने वो प्रतियोगिता जीत ली और खुशी राम सबसे अधिक स्कोर करने वाले खिलाड़ी बने। ऐसे करने वाले वो अभी तक एकमात्र भारतीय खिलाड़ी हैं। यही नहीं भारत ने महाद्वीपीय शोपीस इवेंट में सातवाँ स्थान प्राप्त किया।

बाद के दो संस्करणों 1965 और 1969 के एशियन चैंपियनशिप में खुशी राम प्रतियोगिता में क्रमशः दूसरे और तीसरे सबसे बड़े स्कोरर रहे। 

फिलीपिंस में 1970 में एक आमंत्रण टूर्नामेंट में ख़ुशी राम एक बार फिर शीर्ष स्कोरर रहे और उन्हें सबसे वैल्यूवल प्लेयर घोषित किया गया।

खुशी राम को 1967 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और उनकी मृत्यु के बाद हरियाणा में उनके गांव में एक प्रतिमा बनाई गई। 

अजमेर सिंह

ख़ुशी राम की विरासत को अजमेर सिंह (Ajmer Singh) ने आगे बढ़ाया। जिसे भारतीय बास्केटबॉल का स्वर्णिम काल कहा जा सकता है।

हरियाणा में जन्मे अजमेर सिंह अपने शुरुआती दिनों में बास्केटबॉल स्किल्स को सुधारने के लिए कोटा चले गए। अजमेर सिंह राजस्थान विश्वविद्यालय के लिए खेले और जल्द ही इंडियन रेलवे ने उन्हें अपनी टीम में चुन लिया।

अजमेर सिंह ने हरियाणा, इंडियन रेलवे और राजस्थान के लिए 22 राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लिया और आठ स्वर्ण पदक जीते। बाद में वो खेल से संन्यास लेने के बाद रेलवे में शामिल हो गए। 

6'5 के ऊंचे-लंबे कद के अजमेर सिंह भी राष्ट्रीय टीम के हिस्सा थे, जिन्होंने 1980 के मॉस्को ओलंपिक में भाग लिया था।

हालांकि टीम वहां अपने सभी सातों ग्रुप मैच हार गई, लेकिन अजमेर सिंह ने हनुमान सिंह और राधेश्याम के साथ मिलकर शानदार प्रदर्शन किया। 

अजमेर सिंह ने 21.3 अंकों के टीम-औसत के साथ स्कोर बनाया और प्रति गेम औसतन 5.4 रिबाउंड बनाया। 

1982 के एशियन गेम्स में भारतीय हूपस्टर एक बार फिर अपनी लय को तलाशते नजर आए और प्रतियोगिता में आठवें स्थान पर रहे।

भारत सरकार ने 1982 में अजमेर सिंह को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया।

अमज्योत सिंह गिल 

वर्तमान पीढ़ी के लिए, वह भारत में बास्केटबॉल का सबसे पहचानने योग्य चेहरा है। 

2011 में 18 साल की उम्र अपनी अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत करने के बाद अमज्योत सिंह गिल (Amjyot Singh Gil) ने भारतीय बास्केटबॉल में अपनी अलग ही जगह बनाई। 

2014 में चंडीगढ़ में जन्मे अमज्योत ने FIBA एशिया कप में टीम इंडिया के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहां भारत ने अपने इतिहास में पहली बार मेजबान चीन को हराया और तब से विभिन्न महाद्वीपीय और विश्व प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ी लगातार अच्छा प्रदर्शन करते रहे। 

राष्ट्रीय टीम के अलावा अमज्योत सिंह गिल को खेल में पेशेवर-ग्रेड बनाने के भारतीय खिलाड़ियों की मदद करने का श्रेय दिया जाता है। 

अमज्योत सिंह गिल, अपनी राष्ट्रीय टीम के साथी अमृतपाल सिंह के साथ पेशेवर लीग में खेलने के लिए देश से बाहर जाने वाले पहले खिलाड़ी हैं।

2015 की गर्मियों में, अमज्योत सिंह गिल जापान की बीजे समर लीग में अपनी ट्रेनिंग में व्यस्त थे, उन्हें टोक्यो एक्सीलेंस ने जापानी डी-लीग के लिए साइन किया। 

कुछ साल बाद भारतीय हूपस्टर संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए, जहां उन्हें 2017 में एनबीए डी-लीग में शामिल किया गया। 

अमज्योत सिंह गिल जापान की हमामात्सू के साथ 3x3 बास्केटबॉल में भी खेलते नज़र आए। 

सतनाम सिंह 

हाल के वर्षों में भारतीय बास्केटबॉल के लिए सबसे बड़ा नाम सतनाम सिंह (Satnam Singh) है। उनकी प्रसिद्धि ने उन्हें राष्ट्रीय स्टार बना दिया। यहां तक ​​कि उनके नाम पर नेटफ्लिक्स की डॉक्यूमेंट्री, वन इन ए बिलियन भी है। सतनाम पंजाब के एक छोटे से गाँव - बालो के – से लिकलकर एनबीए तक पहुंचने वाले स्टार हैं। 

2010 में फ्लोरिडा में IMG अकादमी से छात्रवृत्ति हासिल करने के बाद सतनाम सिंह एक खिलाड़ी के रूप में वहां के कोचों की देख-रेख में खुद को अच्छे से तैयार किया।

सतनाम देश और विदेश दोनों स्तरों पर खेलने वाले युवा खिलाड़ियों में से एक हैं और उन्होंने 2015 के एनबीए ड्राफ्ट के लिए खुद को नामांकित किया।

सतनाम सिंह को डलास मावेरिक्स ने चुना था, जिससे वो पहले और आज तक एनबीए में शामिल होने वाले एकमात्र भारतीय खिलाड़ी बन गए।

हालांकि भारतीय सेंटर कभी डलास के रोस्टर में जगह नहीं बना सके, उन्होंने टीम के एनबीए जी लीग के सहयोगी, टेक्सास लीजेंड्स के साथ दो सत्र बिताए। हालाँकि, सीमित समय के खेल के कारण वो कनाडा में जी-लीग से सेंट जॉन्स एज ऑफ नेशनल बास्केटबॉल लीग (एनबीएल) में चले गए।

अनीता पॉलदुरई 

पिछले एक दशक से भारतीय महिला बास्केटबॉल टीम में लगातार रहने वाली अनीता पॉलदुराई (Anitha Pauldurai) दूसरे खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही हैं। 

2001 में सीनियर टीम में पदार्पण करने के बाद से तमिलनाडु की खिलाड़ी भारतीय महिलाओं की टीम का एक अभिन्न हिस्सा रही हैं जिनके खेल में लगातार सुधार दिखा है। 

हालांकि अभी भी अनीता को एक लंबा रास्ता तय करना है, लेकिन सिंह बहनें - प्रशांति, दिव्या, आकांक्षा और प्रियंका के साथ-साथ अनीता पॉलदुरई, गेथू अन्ना जोस और पीएस जेना ने टीम के लिए अच्छा प्रदर्शन किया है। 

अनीता पॉलदुराई को 19 साल की उम्र में भारतीय महिला बास्केटबॉल टीम की कप्तानी सौंपी गई थी, जो सबसे कम उम्र की कप्तान बनने वाली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं। उन्होंने 19 साल की उम्र में चीन में हुए FIBA ​​एशिया चैंपियनशिप में भारतीय टीम का नेतृत्व किया था

अनीता पॉलदुराई ने आठ साल तक भारत की कप्तानी की। ये वो दौर था जब टीम को उन्होंने एफआईबीए एशिया कप में लगातार एक जैसा प्रदर्शन किया जाए, इसके अलावा एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों जैसे बड़े इवेंट्स में भी प्रतिस्पर्धा किया। 

हालांकि 2015 में चेन्नई के हूपस्टर ने मातृत्व अवकाश लिया। अनीता पॉलदुरई ने 2017 में फिर से वापसी की।

भारतीय खिलाड़ी ने एक कोच के रूप में खेल के साथ अपने रिश्ते को जारी रखा और 2016 FIBA अंडर -16 महिला एशियाई चैंपियनशिप में भारतीय टीम के सहायक कोच के रूप कार्यभार संभाला।