फ़ीचर

भूखे पेट बचपन गुजारने वाली दीपिका कुमारी ने एक सपने को पूरा करने के लिए छोड़ दिया था घर, जानिए उनके बारे में सबकुछ     

इस तीरंदाज ने अपने सपनों को पूरा करने की यात्रा के दौरान जीवन में आने वाली हर कठिनाई का साहस के साथ मुकाबला किया  

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

भूख और उसका मानों चोली-दामन का साथ था। दीपिका कुमारी (Deepika Kumari) का जन्म ऑटो-रिक्शा चालक शिवनारायण महतो और रांची मेडिकल कॉलेज में नर्स गीता महतो के घर हुआ। दोनों मुश्किल से खुद का पेट भर पा रहे थे।

बहुत छोटी उम्र में ही उसके निशाना लगाने के हुनर को गांव वालों ने देख लिया था। जब वह भूखे होने पर पत्थर से आम पर निशाना लगाकर तोड़ती थी। बाद में वह गुलेल से आम को निशाना बनाती थी।

तंगहाली में जीवन गुजारने के बावजूद उसने अपने सपनों को जिंदा रखा। वह जानती थी कि उसे सपनों को पूरा करने के लिए अपने गांव रत्तू चट्टी से बाहर निकलना होगा। उसका गांव झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 15 किलोमीटर दूर था।

हाल ही में TEDx XLRI 2021 में उन्होंने पुरानी बातों को याद करते हुए कहा,"गरीबी एक ऐसी स्थिति है जो या तो आपको साहसी बना देती है या दु:खी कर सकती है।"  

"एक वक्त में हम बहुत गरीब थे, खाने तक के लिए पर्याप्त भोजन नहीं था। फिर भी मैं सपने देखती थी, क्योंकि सपने केवल अमीर ही नहीं देख सकते। कोई भी व्यक्ति सपने देख सकता है। मैं अभी भी सपने देखती हूं। उन सपनों को पूरा करने के लिए मैंने घर छोड़ दिया।"

वह अकादमी में इसलिए भी गई, ताकि उसे वहां मुफ्त में खाना मिलेगा। इससे उसके माता-पिता पर एक व्यक्ति के खाने का बोझ कम हो जाएगा।

"उस समय मैं 13 साल की थी, इसलिए अपने परिवार के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सकती थी। मैंने उनसे बात की और वे इसके लिए राजी थे। उन्होंने मुझे अकादमी में भेज दिया। मुझे नहीं पता था कि जो लक्ष्य मैंने तय किया है, उसने खुद मुझे चुना है।"

बांस के धनुष और तीर का उपयोग करने वाली दीपिका ने तीरंदाजी के लिए उचित उपकरणों को अपने हाथ में पहली बार जमशेदपुर में टाटा तीरंदाजी अकादमी में लिया। इसमें उनकी चचेरी बहन विद्या कुमारी (Vidya Kumari) ने मदद की, जो खुद इस अकादमी की सुविधाओं का उपयोग कर रही थी। हालांकि, उसे पेशवेर सेटअप में शुरुआत अर्जुन तीरंदाजी अकादमी में मिली। खरसावां में संचालित इस अकादमी की स्थापना राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा मुंडा द्वारा की गई थी।  

"मुझे इस बात पर यकीन नहीं था कि मैंने जो रास्ता चुना है वह सही है या गलत। क्योंकि, एक तो मैं बहुत छोटी थी और दूसरा मुझे इसके बारे में कुछ पता भी नहीं था। मैंने यह अपने लिए नहीं किया, बल्कि परिवार के लिए किया था। जब मैं अकादमी पहुंची, तो मेरे लिए यहां सब कुछ नया था। मुझे यहां कि भाषा नहीं आती थी, मुझे ये भी पता नहीं था कि क्या करना है।

"हालांकि यह सबसे अच्छी परिस्थिति नहीं थी, लेकिन जो कुछ भी वहां था, उसके साथ मैं खुश थी। धीरे-धीरे मेरे सपने बड़े होते रहे। मेरा प्रदर्शन बेहतर होता गया। कभी-कभी जीवन आपको जितना संभाल सकते हैं उससे ज्यादा देता है, लेकिन अगर आप इसका सामना करते हैं, तो असंभव कुछ भी नहीं होता है।"

अगले तीन सालों में वह धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती रही और नवंबर 2009 में कैडेट विश्व चैम्पियनशिप का खिताब जीतने से पहले घर नहीं लौटी। पंद्रह साल की उम्र में उसने अमेरिका के ओग्डेन, यूटा में आयोजित 11वीं यूथ वर्ल्ड तीरंदाजी चैम्पियनशिप जीती। इसी प्रतियोगिता में महिलाओं की टीम रिकर्व इवेंट में भी स्वर्ण पदक जीता, साथ ही डोला बनर्जी (Dola Banerjee) और बॉम्बेला देवी (Bombayala Devi) जैसी प्रतिष्ठित तीरंदाजों ने भी जीत हासिल की।

दीपिका कुमारी ने सफलता हासिल करने के लिए किया था बड़ी कठिनाइयों का सामना

घरेलू मैदान पर उसे और बड़े अवसर मिले। 2010 में भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी की और इसमें उसने निराश नहीं किया।

कुमारी ने दो स्वर्ण पदक के साथ टूर्नामेंट का समापन किया। इसमें से एक व्यक्तिगत स्पर्धा में और दूसरा महिला टीम रिकर्व स्पर्धा में जीता।

चीन के ग्वांगझू में आयोजित 2010 के एशियाई खेलों में उसने फॉर्म को जारी रखा और रिमिल बुरुली और डोला बनर्जी के साथ टीम रिकर्व इवेंट में कांस्य पदक जीता।

"इसके बाद जब मैंने वापसी की तो विश्व चैंपियन बनी। वास्तव में हर कोई खुश था। मेरे कोच ने कहा कि मुझे यह भूल जाना चाहिए कि मैं विश्व चैंपियन हूं और अगले आयोजन ओलंपिक पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। मैं चाहती थी कि वो मुझे बस उस पल का आनंद लेने दें। लेकिन, फिर मुझे एहसास हुआ कि वह सही थे। अतीत के गौरव का कोई मतलब नहीं था।"

लंदन गेम्स पर निगाहें जमाते हुए इसकी तैयारी के लिए उसने तुर्की के अंताल्या में आयोजित तीरंदाजी विश्व कप में भाग लिया। कुमारी ने व्यक्तिगत स्पर्धा में कोरिया की ली सुंग-जिन को फाइनल में छह सेट अंकों के अंतर से हराकर स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद 2012 में उसने महिला रिकर्व तीरंदाजी में विश्व में पहला स्थान पक्का कर लिया और लंदन ओलंपिक में पोडियम फिनिश देने के लिए कमर कस ली।

लेकिन, उसके भाग्य में कुछ और ही लिखा था। पहले ही दौर में ग्रेट ब्रिटेन की एमी ओलिवर के खिलाफ उसे चौंका देने वाली हार मिली।

"किशोर उम्र के कारण ओलंपिक मेरे लिए एक कल्पना थी। मेरे चारों तरफ सब कुछ काल्पनिक था। लेकिन, मैं खुद को यह समझा रही थी कि मुझे केवल इस बात पर ध्यान केन्द्रित करना है, कि मैं यहां क्या करने आई हूं। मुझे लग रहा था कि मैंने बहुत मेहनत की है, लेकिन जब मैं हार गई, तब मुझे एहसास हुआ कि मैं और क्या बेहतर कर सकती थी।

उन्होंने समझाया, "हम अक्सर अपने लिए आरामदायक क्षेत्र बनाते हैं और वहां रहना पसंद करते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि इसके बाहर परेशानी होगी। हम केवल यह सोचते हैं कि क्या गलत हो सकता है। इसमें आत्मविश्वास बहुत महत्वपूर्ण है।"  

एक सैनिक की तरह उसने खुद को तैयार किया और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए वापस आ गई।

जुलाई 2013 में उसने मेडेलिन, कोलंबिया में आयोजित तीरंदाजी विश्व कप चरण 3 में स्वर्ण पदक और इसके बाद 2013 के FITA तीरंदाजी विश्व कप में रजत पदक जीता। विश्व कप फाइनल में जितने भी प्रदर्शन हुए उनमें यह तीसरा रजत पदक था।

2014 में दीपिका को फोर्ब्स (भारत) की '30 अंडर 30' की सूची में शामिल किया गया था और 2016 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

कभी-कभी जीवन में पिछली विफलताओं को सुधारने का मौका मिलता है और कुमारी को भी एक बार फिर ओलंपिक में अपनी छाप छोड़ने का मौका मिला है। उन्होंने बैंकॉक में 21वीं विश्व तीरंदाजी चैंपियनशिप के दौरान हुए कॉन्टिनेंटल क्वालीफिकेशन टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन के साथ महिला रिकर्व व्यक्तिगत स्पर्धा में टोक्यो के लिए कोटा हासिल किया।  

खेल के लिए असीम जुनून के साथ उन्होंने रत्तू चट्टी के छोटे से गांव को दुनिया के नक्शे पर ला दिया है। वही गांव जहां उसके माता-पिता से उसके छोटी उम्र में घर छोड़ने पर सवाल किया गया था।

"हमारे पड़ोसी मेरे माता-पिता से कहते थे कि उन्हें लड़की को घर से बाहर नहीं भेजना चाहिए। लेकिन, आज जब मैं घर जाती हूं, तो वे सभी आते हैं और मेरे माता-पिता से पूछते हैं कि उन्हें मेरे आने की सूचना क्यों नहीं दी गई। यह देखकर अच्छा लगता है कि मैंने कुछ हासिल किया है उसके कारण लोग मुझे देखना चाहते हैं और अपने बच्चों को मेरे जैसा बनाना चाहते हैं।”

टोक्यो में एक पदक पूरे भारत के बच्चों को उसके जैसा बनने के लिए प्रेरित कर सकता है।