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यादगार प्रदर्शन: जब भारत के रमेश कृष्णन ने ऑस्ट्रेलियन ओपन में वर्ल्ड नंबर एक को दी थी मात

कृष्णन ने 1989 में आयोजित ऑस्ट्रेलियन ओपन में गत चैंपियन मैट विलेंडर को हराकर रचा था इतिहास

लेखक भारत शर्मा ·

वैश्विक मीडिया के लिए साल 1989 में नंबर एक टेनिस खिलाड़ी मैट्स विलेंडर की हार की खबर को कवर करना किसी परेशान, हैरान, चौंकाने वाले पल की तरह ही था। इसका अहम कारण था कि चार में तीन ग्रैंड स्लैम खिताब अपने नाम करने वाले विलेंडर को ऑस्ट्रेलियन ओपन में भारतीय सनसनी रमेश कृष्णन से हार झेलकर बाहर होना पड़ा था।

रमेश कृष्णन ने अपनी ताकत और चतुराई के मिश्रण के दम पर आस्ट्रेलियन ओपन के दूसरे दौर में 6-3, 6-2, 7-6 से जीत हासिल करते हुए विलेंडर को बाहर का रास्ता दिखा दिया था। यह एकमात्र मौका था कि जब किसी भारतीय खिलाड़ी को दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी को हराने में सफलता मिली थी।

1989 में ऑस्ट्रेलियाई ओपन के दूसरे दौर से पहले दोनों खिलाड़ी सात बार आमने-सामने हो चुके थे और उनमें से छह में विलेंडर को जीत मिली थी। 1987 में विलेंडर और कृष्णन अपनी संबंधित टीमों के लिए नंबर एक खिलाड़ी थे, जब स्वीडन और भारत ने डेविस कप खिताब के लिए मुकाबला किया था।

हालांकि, स्वीडन ने प्रतिरोध की सभी आशाओं को खारिज करते हुए गोथेनबर्ग में इनडोर क्ले कोर्ट पर कृष्णन को 6-4, 6-1, 6-3 से हरा दिया था।

1988 में विलेंडर ऑस्ट्रेलियन ओपन, फ्रेंच ओपन और US ओपन के साथ तीन ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने वाले पुरुष खिलाड़ी बनकर उभरे थे। अपने पूर्ववर्ती ब्योर्न बोर्ग की तरह स्वीडिश खिलाड़ी अगले सत्र में अपने राज का विस्तार करने के लिए तैयार नजर आए।

ऑस्ट्रेलियाई ओपन में शुरुआती दौर में परेशानी के संकेत मिले। 24 वर्षीय इस खिलाड़ी को साथी स्वेड टोबियास सैंवेंटसन ने पांच सेट में 6-3, 2-6, 7-5, 5-7, 6-3 से हरा दिया था।

हालांकि, कृष्णन द्वारा तैयार किए गए जाल से कोई बच नहीं पाया। उनके पास लंबे मैच खेलने और दमदार शॉट खेलने का हुनर नहीं था। इसके बाद भी वह दुनिया में 51वें स्थान पर थे। उन्होंने अपने तीखे स्ट्रोक के साथ एक जाल तैयार किया और फिर मनोरम वॉली के साथ लक्ष्य को हासिल कर लिया।

कृष्णन के अथक आक्रमण ने ऑस्ट्रेलियन ओपन में सात बार के प्रमुख चैंपियन विलेंडर के खिलाफ जीत हासिल की।

रमेश कृष्णन ने साल 1981 और 1987 के क्वार्टर फाइनल में बनाई थी जगह

रमेश कृष्णन ने 2014 में अपनी जीत को याद करते हुए कहा था, 'यह मेरे करियर का शिखर था और उन मैचों में से एक था जहां मैंने अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन किया। यह एक बड़ी जीत थी क्योंकि मैं चोट से उबर रहा था। दर्शकों के अधिक संख्या ने भी मुझे बहुत परेशान किया था। जब मैं दूसरे सेट में 1-0, 4-0 से आगे चल रहा था तब विलेंडर के बचाव में उन्होंने हल्की हूटिंग की थी, लेकिन अधिकारियों ने मैच को रोकने से इनकार कर दिया।"

हालांकि कृष्णन ने शुरुआत से ही मैच में अपना दबदबा बना लिया था, लेकिन फिनिश लाइन के करीब आते ही उन्होंने दबाव महसूस करना शुरू कर दिया। तीसरे सेट में 3-5 के पिछड़ने के बाद विलेंडर ने नौवें गेम में क्रॉस-कोर्ट पास के साथ वापसी की शुरुआत को 30-40 पर पहला मैच प्वाइंट बचाया। इसके बाद विलेंडर ने कृष्णन के सेट को 5-5 पर सेट करने के लिए उसे तोड़ दिया।

कृष्णन ने कहा, "टाई-ब्रेकर के दौरान सर्विस करते समय मैंने अपना रैकेट तोड़ दिया था और मैं 5-4 से ऊपर था। मैं घबरा गया था और इसे 5-5 करने के लिए एक डबल-फॉल्ट किया। मैंने फोरहैंड वॉली के साथ अपना चौथा मैच प्वाइंट अर्जित किया।"

उन्होंने ऐतिहासिक जीत पर मुहर लगाने के लिए विलेंडर की पहुंच से बाहर एक बैकहैंड क्रॉस-कोर्ट वॉली पर पंच मारा। वह 1973 में जर्मनी के कार्ल मीलर के बाद पहले ऐसे खिलाड़ी बन गए थे, जिसने दूसरे दौर में एक गत चैंपियन को बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

कृष्णन के करियर के बेहर अहम मुकाबलों में से एक इस मैच ने विलेंडर को किनारे कर दिया था।

मैच के बाद विलेंडर ने कहा, "मानसिक रूप से मैं अभी मैच में नहीं था। उन्होंने कभी हार नहीं मानी और कोई गलती नहीं की। US ओपन के बाद से खुद को प्रेरित करना मेरे लिए मुश्किल रहा। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। मैं नंबर एक पर था और वहां मैं केवल नीचे ही जा सकता था।"

इस हार ने विलेंडर के करियर पर ग्रहण सा लगा दिया था। यही कारण रहा कि उसके बाद वह एक बार भी ग्रैंड स्लैम खिताब नहीं जीत सके। ग्रैंड स्लैम में उनका सबसे अच्छा परिणाम 1990 में ऑस्ट्रेलियन ओपन में सेमीफाइनल फाइनल था। इसके बाद साल 1996 में उन्होंने संन्यास ले लिया।

पिछले तीन मौकों पर ग्रैंड स्लैम में अंतिम आठ में जगह बनाने वाले कृष्णन के लिए विलेंडर पर मिली जीत ने भारतीय टेनिस इतिहास में उनकी जगह को और मजबूत कर दिया था।