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स्टार जिम्नास्ट दीपा कर्माकर ने याद किया रियो में सफलता के बाद का मुश्किल दौर 

ओलंपिक में भाग लेने वाली एकमात्र भारतीय महिला जिम्नास्ट कर्माकर ने चोट को नहीं बनने दिया करियर की रुकावट 

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

दीपा कर्माकर (Dipa Karmakar) ने जब रियो ओलंपिक में चौथा स्थान हासिल किया, तो आगे उनसे भारतीय खेल में बड़ा कुछ करने की उम्मीद की गई, लेकिन 2017 में भारतीय जिम्नास्ट को एंटीरियर क्रूशीइट लिगामेंट (ACL) चोट के इलाज के लिए सर्जरी करवानी पड़ी। घुटने की पीड़ादायक चोट ने उसे लगातार प्रतिस्पर्धा से दूर रखा। चोट के कारण वह 2019 में स्टटगार्ट, जर्मनी में हुई विश्व चैंपियनशिप में भाग नहीं ले सकी और इसी कारण अभी तक टोक्यो खेलों के लिए स्थान सुरक्षित नहीं कर पाई हैं।

आलोचकों ने तो उनके करियर का अंत होने का पूर्वानुमान लगाना शुरू कर दिया था। कर्माकर मानती हैं कि यह मानसिक रूप से उनके लिए मुश्किल वक्त था, लेकिन लंबे समय से कोच बिशेश्वर नंदी (Bisheshwar Nandi) ने उन्हें मजबूत बने रहने में मदद की।

दीपा कर्माकर ने ओलंपिक चैनल को बताया, "2019 विश्व चैम्पियनशिप से पहले मैं बहुत सावधानी बरतते हुए अच्छी तरह से तैयारी कर रही थी। इसके बावजूद चोटिल हो गई और मुझे टूर्नामेंट से हटना पड़ा।"

उन्होंने कहा, "जब लोगों को मैंने यह कहते हुए सुना कि अब दीपा का अंत हो चुका है, तो वह वास्तव में टूट गई थी। यह मेरे और कोच नंदी सर के लिए मुश्किल स्थिति थी। क्योंकि हम टोक्यो का कोटा हासिल करने के उद्देश्य से टूर्नामेंट के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे। यह मेरे लिए मानसिक पीड़ा पहुंचाने वाला वक्त था, नंदी सर ने मुझे मजबूत बनाया और इस बात पर जोर दिया कि मैं जब भी वापसी करूं, तो अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ।"

छह साल की उम्र में ही कोच नंदी ने जिम्नास्ट कर्माकर को अपनी छत्रछायां में ले लिया था। अगरतला की जिम्नास्ट के पैर सपाट होने के कारण उसकी स्थिति स्पर्धा के लिए उपयुक्त नहीं थी, लेकिन कठोर प्रशिक्षण के माध्यम से कर्माकर ने अपने पैरों को धनुषाकार बनाने में सफलता हासिल की, जिसने भविष्य में उनकी राह को आसान बना दिया।

उन्होंने कहा, "नंदी सर के साथ मेरा पिता-पुत्री जैसा रिश्ता है। मैं उन्हें कोच और मागदर्शक के रूप में पाकर खुद को बहुत गौरवान्वित और भाग्यशाली महसूस करती हूं।"

"वो मेरे खेल के हर पहलू पर नज़र रखते हैं, यहां तक की मेरे खान—पान से लेकर मैंने सोने के समय तक के बारे में। बहुत से लोग उन्हें मेरे पिता मानते हैं। उनके मार्गदर्शन में जीरो से शुरुआत करते हुए मैं वर्तमान स्थिति पर पहुंची हूं। मुझे पूरी उम्मीद है कि उनकी देखरेख और आशीर्वाद से मैं दमदार वापसी कर सकूंगी।"

अन्य खेलों की तुलना में जिम्नास्टिक में उम्र का मामला बहुत मायने रखता है। 27 वर्षीय कर्मकार ओलंपियन ओकसाना चुसोवीतीना (Oksana Chusovitina) से प्रेरणा ले रही हैं।

एक्शन में भारतीय जिमनास्ट दीपा करमाकर 

उज्बेकिस्तान की चुसोवीतीना 41 साल और दो महीने की उम्र में रियो खेलों में भाग लेने के साथ ओलंपिक में प्रतिस्पर्धा करने वाली सबसे उम्रदराज जिमनास्ट बनीं। उन्होंने सात ओलंपिक में भाग लेकर भी रिकॉर्ड कायम किया और रियो ओलंपिक के वॉल्ट स्पर्धा के फाइनल में प्रोदुनोवा का प्रदर्शन करने वाली वो दूसरी जिम्नास्ट हैं।

कर्माकर ने कहा, "बहुत सारे लोग कहते हैं कि जिम्नास्ट में छोटी उम्र वाला ही बेहतर कर सकता है, लेकिन मुझे लगता कि जिम्नास्ट के प्रदर्शन में उम्र की इतनी बड़ी भूमिका नहीं होती।"

"इसके लिए ओकसाना का उदाहरण ले सकते हैं, जो 45 साल की उम्र में भी इतना अच्छा कर सकती हैं, तो फिर मैं उम्र के बारे में ज्यादा क्यों सोचूं। प्रदर्शन केवल इस बात पर निर्भर करता है कि आप मानसिक और शारीरिक रूप से कितने फिट हैं। अगर आपके पास लक्ष्य को पाने की ताकत है तो आप निश्चित रूप से इसे हासिल कर सकते हैं।"

उन्होंने कहा, "ओकसाना के अलावा भी आपको कई ऐसे उदाहरण मिलेंगे, जिन्होंने बढ़ती उम्र को अपने प्रदर्शन के आड़े नहीं आने दिया। मैं ऐसे लोगों से केवल अपने काम पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए खुद को आगे बढ़ाने और भविष्य में बेहतर करने के लिए प्रेरणा लेती हूं।"

कोरोना महामारी की मजबूरी के कारण लगे ब्रेक ने उन्हें घुटने की चोट से उबरने के लिए जरूरी समय दिया। कर्माकर ने अगस्त, 2020 में नेताजी सुभाष क्षेत्रीय कोचिंग सेंटर, अगरतला में प्रशिक्षण लिया। टोक्यो गेम्स के लिए कोटा हासिल करने से वंचित भारतीय जिम्नास्ट अगले साल के राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में लय में वापसी का लक्ष्य बना रही हैं।