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तेजस्विन शंकर: फ़िल्डिंग करते करते कर गए ट्रैक एंड फ़िल्ड में कमाल

क्रिकेट के मैदान में हुए एक ‘हसीन हादसे’ ने तेजस्विन को हाई जंप में करियर बनाने की राह दिखाई और देखते ही देखते उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड बना दिया। अब उनका ध्यान टोक्यो ओलंपिक पर केंद्रित है।

लेखक सैयद हुसैन ·

भारत की राजधानी दिल्ली ने क्रिकेट की दुनिया में इस देश को कई बड़े क्रिकेटर दिए हैं, जिन्होंने देश का नाम रोशन किया है। इस लिस्ट में विराट कोहली, वीरेन्दर सहवाग, गौतम गंभीर और आशीष नेहर के साथ कई बड़े खिलाड़ी शामिल हैं। युवा तेजस्विन शंकर (Tejaswin Shankar) ने भी हमेशा क्रिकेट में करियर बनाते हुए तेज़ गेंदबाज़ बनने का सपना देखा। इस सोच के साथ आगे बढ़ते हुए अचानक उन्होंने ट्रैक एंड फील्ड में अपना ध्यान केंद्रित किया और वह हाई जम्पर बन गए – शायद भारत के अब तक के सबसे बेहतर हाई जम्प खिलाड़ी।

तेजस्विन शंकर ने ओलंपिक चैनल से कहा,

“जिस माहौल में मैं बड़ा हुआ, वहां आस पास सिर्फ़ एक ही खेल था और वह था क्रिकेट। मेरे पिता जी BCCI में वकील थे, तो मुझे बहुत ही कम उम्र से क्रिकेट का शौक़ हो गया था।"

सातवीं कक्षा तक शंकर अपनी स्कूल की टीम के एक बेहतरीन सदस्य थे, अपनी लंबाई का फ़ायदा उठाते हुए शंकर काफ़ी तेज़ और उछाल लेती हुई गेंदबाज़ी करते थे जिससे सामने वाले बल्लेबाज़ों के होश फ़ाख़्ता हो जाते थे। लेकिन इस युवा खिलाड़ी की यही लंबाई उनके लिए दो मुंही तलवार की तरह हो गई थी, क्योंकि इसकी वजह से उन्हें क्रिकेट में बहुत परेशानी होने लगी थी और वह चपल और चुस्त नहीं रह पाते थे।

“आउटफ़ील्ड में मैं बहुत धीमा और कमज़ोर था, इसी वजह से जब मैं अंडर-14 से अंडर-16 की ओर जा रहा था तो अपनी राज्य की टीम में जगह बनाने से चूक गया। मेरे स्कूल के नए कोच ने तब मुझे बताया कि मुझे एथलेटिक्स में हाथ आज़माना चाहिए जिससे मैं अपनी दौड़ और चपलता को बेहतर कर सकता हूं। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम बस तभी गेंद को पकड़ पाओगे जब गेंद तुम्हारी तरफ़ आएगी।”

2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में तेजस्विन शंकर (Tejaswin Shankar) छठे स्थान पर रहे। 

‘हसीन हादसे’ का दौर 

अपने स्कूल के कोच सुनील कुमार के कहने पर शंकर अब ट्रैक एंड फ़िल्ड इवेंट्स में शिरकत करने लगे थे। जबकि शंकर के पिता कोच के इस नए मशवरे से बिल्कुल ख़ुश नहीं थे। इस युवा खिलाड़ी ने इस बात का भी ख़ुलासा किया कि यही वजह थी कि वह स्कूल के लंच ब्रेक में ही ट्रैक एंड फ़िल्ड में अभ्यास किया करते थे ताकि उनके घर वालों को इसका पता न चले।

"मैंने अपने करियर की शुरुआत कभी हाई जंपर के तौर पर नहीं की थी, बल्कि मेरी शुरुआत 400 मीटर दौड़ से हुई थी। और उसके बाद मैंने ट्रिपल जंप में भी हाथ आज़माया, लेकिन हाई जंप वह खेल था जिसमें मुझे क़ामयाबी मिलने लगी थी। 2013 में मैंने दिल्ली स्टेट चैंपियनशिप में भाग लिया जहां मुझे 1.70 मीटर की जंप के साथ कांस्य पदक मिला।"

"जैसे ही मैं जीतने लगा मेरा खेल भी बेहतर होने लगा, इसके बाद मैं हाई जंप में ही आगे बढ़ना चाहता था। और फिर धीरे धीरे मैं क्रिकेट से दूर होता चला गया, और एथलेटिक्स को गंभीरता से लेता गया।"

20 वर्षीय शंकर बताते हैं कि हाई जंप उनके करियर में एक हसीन हादसे की तरह था, जब उनके कोच ने खेल बदलने की सलाह दी और फिर उन्होंने अपनी इस छुपी प्रतिभा को यहां ढूंढा। इसके बाद हाई जंप में उनके कोच ने पूरी मदद की, और फिर शंकर ने हाई जंप में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी। आज वह देश के एक बेहतरीन और प्रतिभाशाली हाई जंपर में से एक हैं।

2016 में 6 फ़ुट 4 इंच लंबे इस एथलीट ने हाई जंप में 12 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ डाला था, जब कोएमबटूर में हुई जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में शंकर ने 2.26 मीटर का नया रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया था। इसके बाद से तो शंकर ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बेहतरीन प्रदर्शन किया और कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 में वह 6ठे स्थान पर रहे थे।

अमेरिकी सपना

12वीं पास करने के बाद शंकर चाहते थे कि वह दिल्ली में ही पढ़ाई करें और साथ ही एथलेटिक्स में भी अपने करियर को आगे बढ़ाएं। लेकिन तभी शंकर को भारत के तब के जेवलीन थ्रो कोच गैरी कैलवर्ट से मुलाक़ात करने का मौक़ा मिला, और फिर वहां से उनके करियर ने एक नई दिशा प्रदान की। इस ऑस्ट्रेलियाई कोच ने युवा हाई जंपर को अमेरिकी कॉलेज स्पोर्ट्स और नेश्नल कॉलेजिएट एथलेटिक एसोसिएशन (NCAA) के बारे में बताया।

"मेरे पढ़ाई के ख़र्च के साथ साथ NCAA की प्रतिस्पर्धा इतनी अच्छी स्तर की हो सकती है कि 2020 या 2024 ओलंपिक के फ़ाइनल में पहुंचने वाले कई एथलीट इसी सिस्टम से निकलकर आ सकते हैं। और इसी चीज़ ने मुझे NCAA की तरफ़ आकर्षित किया।"

NCAA एक NGO है जो एथलीटों के लिए कई तरह के प्रोगराम चलाता है और उनकी मदद करता है ताकि अमेरिका को एक से बढ़कर एक और भविष्य के एथलीट मिल सकें। उनके एथलीट को एक बेहतरीन प्रतिस्पर्धा मिले, अच्छा कॉलेज और यूनिवर्सिटी मिले इसके लिए वह हमेशा स्कॉलरशिप निकालते रहते हैं और कुछ अच्छे और विदेशी एथलीटों को भी शामिल करते हैं। इसी प्रोगराम के तहत शंकर को कनसास स्टेट यूनिवर्सिटी में भी दाख़िला मिल गया।

"कानसस स्टेट यूनिवर्सिटी के पास सही मायनों में हाई जंप के लिए कई दिग्गज और बड़े कोच हैं। इस यूनिवर्सिटी के कुछ पूर्व छात्रों में मैट हेमिंगवे, जिन्होंने 2004 एथेंस ओलंपिक में रजत पदक जीता था, और एरिक काईनार्ड भी शामिल हैं जो लंदन ओलंपिक के विजेता थे। और यही वजह थी कि मैं कानसस कॉलेज में ही जाना चाहता था, लेकिन जब मैंने कॉलेज के साथ ईमेल के ज़रिए संपर्क स्थापित करना चाहा तो शुरू में उनकी ओर से जवाब नहीं आया था। जबकि दूसरे कई कॉलेज से सकारात्मक जवाब आने लगे थे, मैं किसी और कॉलेज में बस दाख़िला लेने ही वाला था कि कानसस की तरफ़ से मुझे ऑफ़र आ गया। और तभी मैंने उस मौक़े को दोनों हाथों से लपक लिया।"

शंकर और कानसस यूनिवर्सिटी दोनों के लिए ही ये बेहद शानदार रहा, क्योंकि तब 19 साल की उम्र में अपने पहले ही सीज़न में NCAA के लिए शंकर ने ऐतिहासिक गोल्ड मेडल जीता। इस युवा खिलाड़ी ने 2018 में 2.29 मीटर के साथ एक नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया।

"पहले ही दिन से ऐसा लगता है कि सबकुछ मेरे लिए ही हो रहा था, और क़िस्मत से जब मैं फ़ाइनल में हिस्सा ले रहा था तो बारिश आ गई। मैंने ये देखा है कि जब भी बारिश होती है तो मैं अच्छा करता हूं, और जैसे ही बारिश शुरू हुई, मैं समझ गया था कि ये मेरा दिन है।"

बारिश के अलावा अपने इस प्रदर्शन का श्रेय शंकर अपनी कोचिंग प्रक्रिया और ट्रेनिंग के तरीक़े को देते हैं जिसने उन्हें अमेरिकन कॉलेजिएट स्पोर्ट्स के लिए तैयार किया।

एक बेहतरीन ट्रेनिंग

एक बड़ा फ़र्क़ जो इस युवा हाई जंपर ने भारत और विदेश के कोचिंग के तरीकों में पाया वह ये था कि विदेश में कोचिंग एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक तौर पर होती है। शंकर ने इन बातों को उजागर करते हुए कहा:

"जब मैंने भारत में हाई जंप की शुरुआत की थी तो मैं और कोच दोनों ही कैसे अच्छा किया जाए इसके लिए कई तरह की रिसर्च किया करते थे। लेकिन यहां अमेरिका में ये प्रोगराम एक ट्राएड एंड टेस्टेड तरीक़े से होता है। और यही क़ामयाही का सबसे बड़ा रास्ता है, हमें अपनी ट्रेनिंग में क्या क्या करना है ये पहले से ही पता रहता है। एक महीने पहले ही हमें बता दिया जाता है कि हमें किस तरह से ट्रेनिंग करनी है और किन इवेंट्स में शिरकत करना है।"

शंकर ने इस बात का भी ख़ुलासा किया कि उन्हें दूसरे ट्रैक एंड फ़िल्ड में भी हिस्सा लेने के लिए कहा जाता था, ताकि वह फ़िट रहें और एत ही चीज़ से बोर न हो जाएं।

"हाई जंप एक ऐसा खेल है, जहां आप अपने दाएं पैर को ज़्यादा उठाते हैं। इसके साथ साथ कई ऐसे इमबैलेंसेज़ हैं जो आप करते हैं। इसलिए मुझे हर्डल्स और लॉन्ग जंप में भी खेलने के लिए बोला जाता था ताकि मेरा शरीर बैलेंस रह सके। इससे मुझे एक ही खेल को बार बार खेलने की बोरियत भी नहीं होती थी, और मैं ट्रेनिंग के दौरान पूरी तरह से ख़ुद को तरोताज़ा महसूस करता था। क्योंकि अगर मैं एक ही चीज़ सोमवार से गुरुवार तक रोज़ाना 10 घंटे तक करूं तो थकान हो सकती थी।"

क्या है भविष्य ?

शंकर ने हाल ही मे हुई IAAF वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में जानबूझकर हिस्सा नहीं लिया था ताकि वह 2020 टोक्यो ओलंपिक के लिए ख़ुद को ज़्यादा बेहतर तरीक़े से तैयार कर सकें, जो उनका लक्ष्य है।

20 वर्षीय इस युवा हाई जंपर की नज़र अपने व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को और भी बेहतर करने पर है ताकि वह भारत को पहला ट्रैक एंड फ़िल्ड मेडल दिला सकें। शंकर मानते हैं कि 2019 वर्ल्ड चैंपियनशिप में हुए नतीजों से उन्हें प्रेरणा मिली है और वह भी सभी को चौंका सकते हैं।

"किसी ने नहीं सोचा था कि कोई गोल्ड मेडल जीतने के लिए 2.37 मीटर का हाई जंप कर सकता है। क़तर के मुतियाज़ बर्शिम के बारे में तो किसी को उम्मीद भी नहीं थी क्योंकि पिछले साल उन्हें एड़ी में चोट आई थी। लेकिन उन्होंने न सिर्फ़ जीता बल्कि रिकॉर्ड भी तोड़ डाला। अगर आपका अच्छा दिन रहा तो आप कुछ भी कर सकते हैं।"

जब अपने क्रिकेट के खेल को सुधारने के लिए शंकर ने हाई जंप की ओर रुख़ किया था तो ख़ुद उन्हें नहीं पता था कि ये हसीव हादसा उन्हें आने वाले समय में देश की एक बड़ी उम्मीद बना देगा।