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तालीमेरेन एओ: स्वतंत्र भारत के पहले फ़ुटबॉल कप्तान की कहानी

तालीमीरेन एओ ने इंग्लिश क्लब आर्सनल में शामिल होने का अवसर ठुकरा दिया, क्योंकि उन्होंने अपने पिता से वादा किया था कि वो डॉक्टर बनेंगे।

लेखक विवेक कुमार सिंह ·

सवाल: भारतीय फुटबॉल टीम के पहले कप्तान कौन थे?

उत्तर: डॉक्टर तालीमेरेन एओ (Talimeren Ao) ने 1948 के लंदन ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ भारत की कप्तानी की। देश की आजादी के बाद भारतीय फुटबॉल टीम का ये पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच था।

भले ही पीके बनर्जी (PK Banerjee), चुन्नी गोस्वामी (Chuni Goswami), तुलसीदास बलराम (Tulsidas Balaram), सेलन मन्ना (Sailen Manna) या आईएम विजयन (IM Vijayan), भाईचुंग भूटिया (Bhaichung Bhutia) और सुनील छेत्री (Sunil Chhetri) जैसे आधुनिक महान खिलाड़ियों की सूची में उनका नाम न लिया जाता हो, लेकिन तालिमेरेन एओ भारतीय फुटबॉल इतिहास के एक शानदार अध्याय रहे हैं।

1948 के लंदन ओलंपिक में तालिमेरेन एओ (निचले पंक्ति में बीच में), भारतीय फुटबॉल टीम के पहले कप्तान बने। तस्वीर: AIFF/Twitter

फुटबॉल के मैदान पर और उसके बाद के जीवन और उपलब्धियों पर एक नज़र।

लंबी कूद में राष्ट्रीय रिकॉर्ड

म्यांमार के साथ अपनी सीमा के पास भारत के उत्तरपूर्वी भाग में नागालैंड (पहले का अविभाजित असम) के चांगकी गाँव में जन्मे, तालीमेरेन एओ शायद एक पैदाइशी एथलीट थे।

उनके पिता सुबुंगवती नंगडंगरी इस क्षेत्र के पहले पादरी थे और तालिमेरेन एओ उनके 12 बच्चों में से चौथे थे। एक एथलीट और फुटबॉलर के रूप में एओ की असाधारण योग्यता जोरहाट मिशन स्कूल और फिर गुवाहाटी के प्रसिद्ध कॉटन कॉलेज में उनके दिनों के दौरान देखी गई।

एओ ने एक कॉलेज मीट में 23 फीट (7.01 मीटर) लंबी छलांग लगाई - जो कई वर्षों तक अनौपचारिक राष्ट्रीय रिकॉर्ड के रूप में रहा। वो एक असाधारण वॉलीबॉल खिलाड़ी भी थे, लेकिन फुटबॉल में एओ सबसे ज्यादा चमके थे।

वास्तव में वो एथलेटिक्स में इतने ट्रॉफी और पदक जीतते थे कि चंगकी में अपने पैतृक घर तक ट्रेक के दौरान उन्हें ऊपर ले जाना एक बड़ा कार्य था। तालीमेरेन एओ दोस्तों के बीच अपनी ट्राफियां वितरित करते थे और केवल अपने पदक और प्रमाण पत्र घर ले जाते थे!

कॉलेज के छात्र के रूप में भी एओ उस समय महाराणा क्लब - असम के सबसे बड़े फुटबॉल क्लब में शामिल हो गए। हालाँकि वो स्कूल और कॉलेज में एक स्ट्राइकर के रूप में खेलते थे, लेकिन क्लब में उनके कार्यकाल के दौरान उन्हें एक रक्षात्मक मिडफ़ील्डर में बदल दिया गया था।

तालीमेरेन एओ अपने कैरियर के बाकी हिस्सों में एक डिफेंडर के रूप में शानदार प्रदर्शन करने के लिए बेकरार थे।

एओ के बारे में महान सेलन मन्ना ने कहा, "सही समय पर गेंद को टैकल करने वाले और बहुत ही परिश्रमी और एक महान टीम-प्लेयर है।"

सच्चा खिलाड़ी और एक शानदार प्रतियोगी

एओ के शुरुआती दिनों का सबसे दिलचस्प पहलू वो था, जब 1938 में एक स्थानीय क्लब के खिलाफ एक कॉलेज मैच के टाई होने के बाद, वो एक विपक्षी खिलाड़ी से भिड़ गए, जहां उन्हें जबड़े में भयानक चोट लगी।

अप्रभावित, तालिमेरेन एओ ने उठकर, विपक्षी खिलाड़ी की मदद की, जिसने उनके जबड़े को तोड़ा था, अपने पैरों पर खड़े हुए और चले गए। चोट गंभीर थी और एओ एक महीने के लिए अस्पताल में भर्ती हो गए। वो लगभग एक साल तक फुटबॉल नहीं खेल पाए।

इस घटना ने एओ के खेल कौशल को प्रभावित किया।

डॉक्टर तालीमेरेन एओ (बाएं) को फुटबॉल के मैदान पर उनके खेल कौशल और शानदार प्रदर्शन के लिए जाना जाता था। तस्वीर: फीफा / ट्विटर

तालीमेरेन एओ एक लौह-इच्छाशक्ति वाले एथलीट थे, जो हमेशा जीत के लिए बेक़रार रहते थे। अगर कोई भी उनकी सज्जनता को कमजोरी के रूप में लेता, तो वो बहुत बड़ी गलती करता था।

एओ के बेटे तालीकोचांग ने ईएसपीएन के साथ एक इंटरव्यू के दौरान याद करते हुए कहा, "बैडमिंटन कोर्ट हो या फुटबॉल का मैदान, जब भी कोई मुक़ाबला होता था, तब हम ज्यादा देर तक उनके बेटे नहीं रह पाते थे। हम उनके विरोधी हो जाते थे।”

उन्होंने कहा, "वो हमें उतनी ही बुरी तरह से हराने की कोशिश करते, जितनी बुरी तरह से वो हमें हरा सकते थे, ताकि हम अगले मैच में हाताश हो जाएं।"

“जिस मेंटल स्ट्रेंथ के बारे में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम बात करती थी, वो उन दिनों उस सिद्धांत का पालन करते थे।”

मोहन बागान और भारतीय फुटबॉल टीम

एओ की प्रतिभा का शोर जल्द ही कोलकाता पहुंच गया –जिसे भारतीय फुटबॉल का मक्का कहा जाता है। तालीमेरेन एओ 1943 में कोलकाता के मोहन बागान के साथ जुड़ गए और एक साल के भीतर ही क्लब के कप्तान बन गए।

एओ के नेतृत्व में, मोहन बागान की शानदार डिफेंस की वजह से उसका दूसरा नाम 'ग्रेट वॉल ऑफ चीन' का नाम पड़ गया। तालीमेरेन एओ ने पश्चिम बंगाल में मोहन बागान के साथ बाकी करियर का समय बिताया। इस टीम ने दो IFA शील्ड, तीन कलकत्ता लीग और कई अन्य खिताब जीते।

उन्हें जल्द ही 1948 के ग्रीष्मकालीन खेलों के लिए लंदन की यात्रा करने वाली भारतीय फुटबॉल टीम के लिए चुना गया।

1948 ओलंपिक: फुटबॉल बनाम बूटबॉल और आर्सनल

एओ ने न केवल 1948 के लंदन ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ भारतीय फुटबॉल टीम की कप्तानी की, बल्कि भारत ने पहला अंतरराष्ट्रीय मैच एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में खेला, जिसके वो भारतीय दल के ध्वजवाहक भी थे।

फ्रांस से 2-1 से मैच हारने के बावजूद, तालीमेरेन एओ की भारतीय टीम के अधिकांश खिलाड़ी नंगे पांव खेल रहे थे। हालांकि अपने शानदार प्रदर्शन के माध्यम से ये टीम स्थानीय फैंस का दिल जीतने में कामयाब रही।

प्रतियोगिता का परिणाम, वास्तव में, बहुत अलग हो सकता था अगर भारतीय फुटबॉल टीम दो पेनल्टी नहीं गवांती।

मैच के बाद के मीडिया इंटरैक्शन में, जब पूछा गया कि भारतीय खिलाड़ियों ने नंगे पैर क्यों खेला, तो तालीमेरेन एओ ने मशहूर जवाब दिया, "भारत में, हम फुटबॉल खेलते हैं, जबकि आप बूटबॉल खेलते हैं!" ये टिप्पणी केवल ब्रिटिश मीडिया के लिए बड़ी बात नहीं थी, बल्कि लंदन के कई अखबारों में सुर्खियां बटोरीं।

मैच के बाद, राजकुमारी मार्गरेट के आग्रह पर भारतीय फुटबॉल टीम को किंग जॉर्ज VI और क्वीन विक्टोरिया से मिलने के लिए बकिंघम पैलेस में एक रात के खाने पर आमंत्रित किया गया था। जैसा कि कहा जाता है, तालीमेरेन एओ को अंग्रेजी क्लब आर्सनल के साथ एक अनुबंध की पेशकश की गई थी लेकिन भारतीय खिलाड़ी ने इसे विनम्रता से ठुकरा दिया।

ओलंपिक के बाद, तालीमेरेन एओ ने इंग्लैंड, नीदरलैंड, वेल्स और आयरलैंड में कई प्रदर्शनी मैचों में भारतीय फुटबॉल टीम का नेतृत्व किया। दौरे का मुख्य आकर्षण डच दिग्गज अजाक्स पर 5-2 की प्रसिद्ध जीत थी।

मैदान के अंदर-बाहर कप्तान का रिकॉर्ड

लंदन में एक युवा टीम का नेतृत्व कर रहे थे, जिसमें बहुत कम ऐसे खिलाड़ी थे, जो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने वाले थे। ऐसे में एओ एक देश के राजदूत की भूमिका निभा रहे थे, जिसने सदियों से शासन करने वाली औपनिवेशिक शक्तियों से स्वतंत्रता हासिल की थी।

एक कठिन सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के बीच, तालीमेरेन एओ ने सुनिश्चित किया कि टीम को जब भी किसी चीज की जरूरत होगी वो खड़े मिलेंगे।

उदाहरण के लिए, फ्रांस के खिलाफ अपने मैच से पहले, भारतीय फुटबॉल टीम ने इंग्लिश क्लब टीमों के खिलाफ लंदन में कई तैयारी मैच खेले। इनमें से एक क्लब के प्रबंधक ने प्रेस को बताया कि अगर भारतीय उनकी टीम को हरा सकते हैं, तो वो अपना पद छोड़ देंगे।

भारत ने मैच जीत लिया। मैच समाप्त होने के बाद उनकी प्रतिक्रिया के लिए पूछे जाने पर, एओ ने जोर देकर कहा कि वो तब तक बोलने नहीं जा रहे हैं जब तक कि क्लब प्रबंधक अपने शब्द वापस नहीं लेते। ये सब निश्चित रूप से हंसी-मजाक की बात थी!

तालीमेरेन एओ ने 1952 में फुटबॉल से संन्यास ले लिया, तब वो अपने खेल के चरम पर थे। उन्होंने खुद से कुछ वादा किया।

डॉक्टर तालिमेरेन एओ: जिन्होंने अपना वादा किया पूरा

जहां फुटबॉल तालिमेरेन एओ को विरासत में मिली थी, वहीं इसके अलावा भी वो बहुत कुछ कर चुके हैं जिसके बारे में जानने की जरूरत है।

तालीमेरेन एओ नागा समुदाय से संबंधित हैं – जो नागालैंड के लिए स्वदेशी जातीय जनजातियों का एक समूह है और पूर्वोत्तर भारत के कुछ अन्य राज्य भी शामिल हैं। अपनी संस्कृतियों, परंपराओं, जीवन शैली के साथ समुदाय कुछ हद तक मुख्य भूमि से अलग थी।

1950 में, जब वो मोहन बागान और भारत के लिए खेल रहे थे, एओ ने कोलकाता में प्रसिद्ध कारमाइकल मेडिकल कॉलेज (वर्तमान में आरजी कर मेडिकल कॉलेज) से डॉक्टर बनने के लिए आवश्यक एमबीबीएस की डिग्री - एक स्नातक की डिग्री हासिल की। वो एमबीबीएस की डिग्री पाने वाले पहले नागा थे।

उनके पास भौतिकी में बी.एससी की डिग्री भी थी।

ऐसा माना जाता है कि तालीमेरेन एओ ने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई जारी रखने के लिए आर्सेनल के लिए खेलने की पेशकश को ठुकरा दिया। हालांकि फुटबॉल ही उनका जीवन था और वो एक ऐसा व्यक्ति थे जो 'प्रतिबद्धता' शब्द का अर्थ जानते थे।

किशोरावस्था में एओ ने टाइफाइड की वजह से अपने पिता को खो दिया। उनकी मृत्यु के समय, श्रद्धेय ने अपने बेटे को डॉक्टर बनने और अपने लोगों की सेवा करने के लिए कहा।

भारतीय फुटबॉल के लिए अपनी भूमिका निभाने के बाद, एओ सर्जन के रूप में अपने गांव वापस चले गए और उन्हें रोना अस्पताल में चिकित्सा अधीक्षक नियुक्त किया गया। 1963 में नागालैंड को राज्य का दर्जा मिलने के बाद, एओ स्वास्थ्य सेवाओं के राज्य के पहले निदेशक बने और 1978 में अपनी रिटायरमेंट तक इस पद पर रहे।

तालीमेरेन एओ का 13 सितंबर 1998 को 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

एक फुटबॉलर के रूप में, एओ में समान गुण के साथ अपने दोनों पैरों का उपयोग करने की बेहतरीन क्षमता थी। वो करिश्माई व्यक्ति थे, जिसे दो अलग-अलग सपने देखने और उसे पूरे करने में परेशानी नहीं हुई।

उत्तर पूर्व में मूक फुटबॉल क्रांति में एओ की उपलब्धियों की शुरुआत हुई, जिसे अक्सर आधुनिक भारतीय फुटबॉल की नर्सरी माना जाता है।

पूर्वोत्तर भारत ने कई भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी तैयार किए हैं, जिनमें भाईचुंग, रेंडी सिंह (Renedy Singh), गौरामांगी सिंह (Gouramangi Singh), उदांता सिंह (Udanta Singh) और जीजे लालपेखलुआ (Jeje Lalpekhlua) जैसे सितारे शामिल हैं।

तालिमेरेन एओ की विरासत अभी भी जारी है।