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फवाद मिर्ज़ा के ख़ून में है घुड़सवारी, अब हैं ओलंपिक के लिए तैयार

20 सालों में ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करने वाले पहले भारतीय घुड़सवार बने फवाद मिर्ज़ा

लेखक सैयद हुसैन ·

नया साल फवाद मिर्ज़ा के लिए कई ख़ुशियां लेकर आया, बेंगलुरु के इस 27 वर्षीय घुड़सवार का वैसे तो ओलंपिक के लिए रास्ता पिछले साल नवंबर में ही साफ़ हो गया था, लेकिन इस पर आधिकारिक मुहर इंटरनेशनल फ़ेडरेशन फ़ॉर इक्वेस्टेरियन स्पोर्ट्स (ईएफ़आई) ने 2019 के सीज़न के बाद जारी हुई रैंकिंग में लगा दी।

आधिकारिक तौर पर आई इस ख़बर ने तेज़ी से ऊभरते हुए सितारे के लिए सोने पर सुहागा का काम किया। फवाद ने दो साल पहले ही घुड़सवारी में भारत के 36 साल के सूखे को ख़त्म किया था, जो एशियन गेम्स से चला आ रहा था। उन्होंने एशियन गेम्स के व्यक्तिगत और टीम दोनों ही इवेंट में रजत पदक जीता था।

2019 में उनके इस प्रदर्शन के लिए भारत सरकार ने उन्हें अर्जुन पुरस्कार से भी नवाज़ा था, लेकिन ये सब इस जाबांज़ घुड़सवार के लिए इतना आसान नहीं रहा।

ओलंपिक चैनल के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में फवाद मिर्ज़ा ने बड़ा ख़ुलासा किया। “मेरा वह घोड़ा जिसके साथ मैंने रजत जीता था, सिग्नॉरिटी मेडिकॉट 2019 की शुरुआत में घायल हो गया था, जो मेरे लिए एक बड़ा झटका था। मैं उसी पर अपनी क्वालिफ़िकेशन की उम्मीद लगाए बैठा था, लेकिन बदक़िस्मती से वह प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सके।”

हालांकि उनका साहस और इच्छाशक्ति ज़ाया नहीं गई, उन्होंने नए घोड़े डजारा 4 के साथ दौड़ में शिरकत की और इसी से फवाद ने सीसीआई3*एस में जीत दर्ज की, जो अक्टूबर में पोलैंड के स्ट्रेज़गॉम में आयोजित हुई थी, और ये एक ओलंपिक क्वालिफ़ाइंग टूर्नामेंट था। फवाद इस प्रतियोगिता को सीज़न की सबसे शानदार उपलब्धियों में से एक मानते हैं।

शाही वंश

फवाद मिर्ज़ा की ज़िंदगी में घोड़ों का साथ हमेशा रहा है, उनके पिता भी एक घुड़सवारी पशु चिकित्सक हैं। वह एक ऐसे परिवार से हैं जिनके पूर्वजों में मैसूर राज्य का एक शाही परिवार शामिल है।

"पांच साल की उम्र से ही मैं घुड़सवारी कर रहा हूं, और यही था जो मैं हमेशा चाहता था कि स्कूल के बाद करूं, और धीरे धीरे मेरी यही दीवानगी करियर में बदल गई थी।": फवाद मिर्ज़ा, घुड़सवार

"एक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी, कर्नल राजेश पट्टू, जिन्होंने मुझे सर मार्क टॉड के अंतरराष्ट्रीय करियर के कुछ पुराने कैसेट दिए थे और वह मैं ख़ूब देखता था। ये मैंने इतनी बार देख रखा है कि आपको मिनट दर मिनट बता सकता हूं कि क्या हुआ था।" फवाद मिर्ज़ा ने बच्चे की तरह इस बात को बताकर ख़ुश हुए।

जब वह स्कूल में थे, तब उन्हें एहसास हुआ कि उनके पास एक प्रतियोगी लकीर है और जैसे-जैसे वह बड़े होते गए उन्होंने उसे एक खेल में तराशा जो उनके लिए आदर्श था।

उन्होंने कहा, "मेरी प्रतिस्पर्धा को एक ऐसे जानवर के साथ मिलाना अद्भुत था, जिसके आसपास मैं रहना पसंद करता था और इसलिए मैंने राष्ट्रीय स्तर पर घुड़सवारी शुरू की और यह वही वक़्त था जहां मेरी यात्रा वास्तव में शुरू हुई।"

विराम और फिर वापसी

हालांकि, कुछ साल पहले ज़िंदगी एक चौराहे पर भी आई, जब उन्हें यह तय करना पड़ा कि क्या वह पेशेवर रूप से घुड़सवारी करना चाहते या फिर घुड़सवारी। और इसका जवाब वह नहीं था जैसी उम्मीद थी।

"मैंने पढ़ाई करने का विकल्प चुना और मनोविज्ञान और व्यवसाय में डिग्री प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड चला गया और छुट्टियों के दौरान जब घर वापस आने पर घुड़सवारी की, तो ये साफ़ था कि इसे मैं सबसे ज़्यादा मिस कर रहा हूं।"

उनका जुनून इतना मजबूत था कि वह जब भी भारत में होते तो बिना किसी प्रशिक्षण के राष्ट्रीय खेलों में हिस्सा लेते थे और वे उन घोड़ों के साथ दौड़ में जाते थे, जो उन्होंने पहले से प्रशिक्षित किया था, जिसका मतलब था कि उन्होंने उनके साथ एक अच्छी साझेदारी निभाई।

फवाद मिर्ज़ा की दुआएं तब रंग लाईं, जब उन्हें प्रायोजक मिलने लगे, जिसने अंततः उन्हें 2014 एशियाई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने में मदद की। "मैंने तब से पीछे मुड़कर नहीं देखा।"

असली सपना

भारत का ये घुड़सवार अभी जर्मनी में अभ्यास कर रहा है, और वह अपने आपको अपने सबसे बड़े सपने के लिए 6 महीने में तैयार कर लेंगे।

“देखिए, किसी भी खेल में चोट लगने का खतरा हमेशा बना रहता है, और मैं उस डर के कारण खुद को वापस नहीं मोड़ सकता। मैं कड़ी मेहनत से प्रशिक्षण लेता रहूंगा और टोक्यो से पहले सबसे अच्छे फ़ॉर्म में होने के लिए और अधिक कार्यक्रमों में भाग लूंगा।”

जब उनसे ये पूछा गया कि ओलंपिक में अपनी उम्मीदों को वह कैसे देखते हैं ? इसपर उन्होंने कहा, “जब आप दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ एथलिटों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं तो यह कठिन होने वाला है। यह मेरा पहला ओलंपिक होगा, जबकि एशियाई खेल ख़ुद में बड़ा था, लेकिन ये और भी बड़ा है।"

"लेकिन मैं कभी भी एक बड़ी चुनौती के दबाव में झुकने के लिए नहीं बना हूं, मेरी प्रतिस्पर्धी प्रकृति इसकी इजाज़त नहीं देती है। दूसरे लोग सोच सकते हैं कि मेरे पास कोई मौका नहीं है, लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि मैं कर सकता हूं, अगर आप अपने लिए ख़ुद से नहीं कर सकते, तो फिर आपके लिए कोई नहीं कर सकता।"

"मैं इतना कह सकता हूं कि अगर मेरा दिन रहा तो मैं सर्वश्रेष्ठ रहूंगा, और मैं इसको सच करने की पूरी कोशिश करूंगा।"