कैसे “गन्स एंड ग्लोरी” ने गगन नारंग को बनाया बेहतर शूटर

भारतीय शूटर गगन नारंग ने बताया कि शूटिंग की अकादमी खोलकर युवा बच्चों को सिखाना कैसे खुद उनके लिए कारगर साबित हुआ।  

पिछले कुछ सालों में भारत और शूटिंग का रिश्ता मज़बूत होता गया है। विश्व स्तर पर भारतीय निशानेबाज़ अपने देश का सम्मान बढ़ाते नज़र आए और अलग-अलग चैंपियनशिप में जीत हासिल कर भारतीय शूटिंग का भविष्य तय करते गए। भारत के चहेते शूटर गगन नारंग को भी काफी हद तक भारत को शूटिंग में मिली सफलता का श्रेय जाता है। उनकी अकादमी “गन्स एंड ग्लोरी” की बात की जाए तो उन्होंने श्रेया अग्रवाल और आईएसएसएफ रियो वर्ल्ड कप में गोल्ड जीतने वाली इलावेनिल वलारिवन को ट्रेनिंग दी है। गगन द्वारा भारतीय भविष्य सितारों को ट्रेनिंग देना भारत की शूटिंग अवस्था का एकमात्र लाभ नहीं है, बल्कि उनका मानना है कि इस ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने खुद के कौशल को भी बढ़ाया जिस वजह से उन्हें ओलंपिक गेम्स 2012 में मेडल जीतने में आसानी हुई।

शुरुआती दौर

2010 कॉमनवेल्थ गेम्स ने मानों भारतीय शूटिंग को एक नई जान दे दी थी और साथ ही नारंग को भविष्य के लिए दृष्टि भी। 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान भारत ने कुल मिलाकर 30 मेडल जीते और नारंग ने 10 मीटर एयर राइफल में खेलते हुए गोल्ड जीत कर भारत के गौरव को बढ़ाया।

उस समय को याद करते हुए नारंग ने कहा “मेरे हिसाब से 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स ने भारतीय शूटिंग की अवस्था को बदल कर रख दिया। गेम्स के दौरान शूटिंग की नई रेंज तैयार की गई, सरकार ने एक अच्छी टीम बनाने में बेहद मदद की जिस वजह से ओलंपिक गेम्स के परिणामों में बढ़ोतरी दिखी। इसके साथ-साथ विदेशी कोच, खेल से जुड़ी सामग्री उपलब्ध कराई गई। मैं गर्व से कह सकता हूं कि मुझे एक सफल खिलाड़ी बनाने में खेल प्रणाली की अहम भूमिका रही है।"

गगन नारंग (दाएं) ने जीता 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल
गगन नारंग (दाएं) ने जीता 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडलगगन नारंग (दाएं) ने जीता 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल

“जैसा मैंने कहा है कि मेरे करियर में प्रणाली (सिस्टम) की अहम भूमिका रही है और इसी वजह से इसको लौटाने की इच्छा मुझमें ज़्यादा रही है।" नारंग ने अपनी अकादमी की स्थापना के बारे में आगे बताया कि “2010 कॉमनवेल्थ गेम्स की जीती हुई राशि मैंने इस अकादमी को बनाने मैं लगा दी।"

“गन्स एंड ग्लोरी” मुनाफा न बनाने वाली अकादमी है जहां भारत के भविष्य के सितारों को तैयार किया जाता है। इसकी शाखाएं भारत के मुंबई, पुणे, हैदराबाद और बेंगुलुरु जैसे शहरों में भी उपस्थित हैं और वहां खिलाड़ियों को बेहतर ट्रेनिंग, सुविधाएं और खेल से जुड़ी सामग्री प्रदान की जाती है।"

“गन्स एंड ग्लोरी खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं प्रदान करने के लिए बनाई गई है ताकि वह खेल को बारिकी से सीख सकें। हमारा लक्ष्य खिलाड़ियों को एक से एक सुविधाएं प्रदान करना है ताकि वह खुद को सर्वश्रेष्ठ बनने की ओर शुरुआत से ही ले जा सकें। युवा खिलाड़ियों को अकादमी द्वारा दी गई सुविधाएं बिलकुल वैसी ही हैं जैसी भारतीय टीम के खिलाड़ियों को मिलती हैं। शूटिंग एक महंगा खेल है और हमनें इसको अपनाने की कीमतों को नीचे गिराने की कोशिश की है और हम युवा बच्चों को स्कॉलरशिप भी देंगे ताकि उनके माता-पिता पर ज़्यादा बोझ न पड़े।" नारंग ने बात करते हुए बताया।

सीख के साथ किया सुधार

2008 बीजिंग गेम्स के दौरा अभिनव बिंद्रा पहले भारतीय बनें जिन्होंने ओलंपिक गेम्स में व्यक्तिगत गोल्ड मेडल जीता वहीं नारंग को 9वें स्थान से संतोष करना पड़ा। हालांकि नारंग ने इसकी भरपाई 4 साल बाद 2012 लंदन ओलंपिक गेम्स में मेडल जीतने के बाद कर दी। इस बाबत उन्होंने कहा “मेरे ऊपर दबाव बहुत था। ऐसा नहीं है कि दबाव खराब होता है बल्कि इस दबाव ने ही मुझे अच्छा प्रदर्शन करने पर मजबूर किया। हालांकि बीजिंग 2008 के बाद से ही मेरे ऊपर दबाव बढ़ने लग गया था। मुझे वापस जाकर अपने ओलंपिक सफर की दोबारा शुरुआत करनी थी और हर मोड़ पर अपने कौशल में सुधार लाना था।"

इसके अलावा, नारंग ने कहा कि “मेरी अकादमी ने मुझे एक बेहतर शूटर बनाया। 2011 में जब मैंने अकादमी खोली तो तब लोगों को लगा कि मैं अपना समय व्यर्थ कर रहा हूं लेकिन असल मायनों में मुझे उससे फायदा मिला क्योंकि मैं खुद भी वहां बच्चों को सिखाता हूं। वह समय कुछ सीखने का था और कुछ सुधार कार्य का भी। आखिर में मैंने दबाव को सही तरीके से संभाला और आगे बढ़ा।"

गगन नारंग 2012 लंदन ओलंपिक गेम्स में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने के बाद ख़ुशी मनाते हुए
गगन नारंग 2012 लंदन ओलंपिक गेम्स में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने के बाद ख़ुशी मनाते हुएगगन नारंग 2012 लंदन ओलंपिक गेम्स में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने के बाद ख़ुशी मनाते हुए

2012 ओलंपिक गेम्स में भी नारंग की स्थिति 2008 गेम्स जैसी ही थी और उस समय चीन के वांग ताओ सबसे मज़बूत स्थिति में चल रहे थे। लेकिन इस 36 वर्षीय भारतीय शूटर ने हार नहीं मानी और 10.7 का बेहतरीन शॉट लगाकर मेडल पर अपना कब्ज़ा जमाया। इसके बाद यह निशानेबाज़ शूटिंग की दुनिया में नए कारनामे करता गया और 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में एक सिल्वर और एक ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। अब नारंग की नज़रें टोक्यो 2020 में क्वालिफाई कर फिर एक बार अपने देश के गौरव को बढ़ाने पर है।

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