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कर्नल राठौड़ का ओलंपिक सिल्वर मेडल बना भारतीय शूटिंग का आधार

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने एथेंस 2004 में भारत का पहला ओलंपिक रजत पदक जीता और देश के लिए विश्व स्तरीय निशानेबाजों को आगे बढ़ने की राह दिखाई।

लेखक विवेक कुमार सिंह ·

जब-जब भारत ने ओलंपिक गेम्स में उपलब्धि हासिल की है, तब-तब भारतीय प्रशंसकों ने इतिहास रचने वाले खिलाड़ी को अपने दिल में जगह दी है।

ऐसे ही एक खिलाड़ी हैं राज्यवर्धन सिंह राठौड़ (Rajyavardhan Singh Rathore), जिन्होंने न केवल जीत का परचम लहराया, बल्कि भारतीय खेल जगत में बढ़-चढ़कर अपना योगदान दिया।

आर्मी कर्नल ने साल 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल की लड़ाई में हिस्सा लिया था और भारत की विजय गाथा में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज कर लिया। इसके बाद उन्होंने शूटिंग में भी अपना करियर बनाया और एथेंस 2004 ओलंपिक गेम्स में सिल्वर मेडल जीतकर भारतीय सरज़मीं को एक बार फिर गौरवान्वित किया।

उस साल भारत ने 73 खिलाड़ियों को प्रतिस्पर्धा के लिए भेजा था जिसमे 57 खिलाड़ी व्यक्तिगत खेलों में हिस्सा ले रहे थे और उस समय टीम खेल केवल एक ही था, और वह था फ़ील्ड हॉकी।

लेकिन राज्यवर्धन सिंह राठौड़ सिल्वर मेडल के साथ घर लौटे।

जुनून ने दिलाई जीत

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ में खेल का जुनून शुरू से ही था। इंडियन मिलिट्री अकादमी में ही राठौड़ का कौशल पता लग गया था और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने कश्मीरी ज़मीन पर भी भारत का साथ दिया था।

हालांकि जब बात शूटिंग खेल की होती है तो बात कुछ अलग होती है। इसमें खिलाड़ी को ‘सटीक’ होना पड़ता है और अपने लक्ष्य को हासिल करना होता है। राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने पहली बार शूटिंग को साल 1998 में इंडियन आर्मी में रहकर शुरू किया। इस दौर में उन्हें एकाग्रता और अनुशासन की ज़रूरत थी और उन्होंने इन दो गुणों पर अपनी पकड़ मज़बूत की।

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ एथेंस ओलंपिक में भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक रजत पदक विजेता बने।

छह फुट लंबे कद के इस खिलाड़ी ने 2002 कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन क्ले टारगेट चैंपियनशिप (Commonwealth Games and Asian Clay Target Championships) में गोल्ड जीत कर अपने होने का प्रमाण पेश किया। इतना ही नहीं उन्होने वर्ल्ड शूटिंग और शॉटगन चैंपियनशिप (World Shooting and Shotgun Championships) में ब्रॉन्ज़ और सिल्वर मेडल भी हासिल किया।

वो 2004 के एथेंस ओलंपिक में शानदार फॉर्म में थे क्योंकि उन्होंने पिछले डेढ़ साल में हर बड़ी चैंपियनशिप के फाइनल में जगह बनाई थी।

ओलंपिक और विश्व चैंपियन के साथ किया ट्रेनिंग

जनवरी 2004 तक राठौड़ ने खुद ही अभ्यास किया था लेकिन वे जानते थे कि इस सपने को पूरा करने के लिए उन्हें सही परीक्षण और सही सलाह की भी ज़रूरत है।

अपने लक्ष्य को अपने दिल में लिए उन्होने इटली जाने का फैसला किया, जहां उनके गुरु बने पूर्व विश्व चैंपियन लूका मारिनि और ओलंपिक चैंपियन रसेल मार्क (Russell Mark)। वह इन दोनों के साथ लगभग 80 शॉट रोज़ाना अभ्यास करते थे और और अपने कौशल को और पुख़्ता करते थे।

उनकी इस शिद्दत ने उन्हें मौरो पेराज़्जी (Mauro Perazzi) से भी कुछ गुण सीखने में मदद की दी और आगे चल कर 2004 ओलंपिक गेम्स में उन्होंने मौरो पेरज़्जी की ही गन का इस्तेमाल कर अपने करियर को पंख दिए।

ओलंपिक खेलों के लिए जाने वाले महीनों में आर्मी मैन ने उन इवेंट्स का एक सटीक कैलेंडर तैयार किया, जिसमें वह भाग लेने वाले थे। ताकि वो ज्यादा से ज्यादा समय प्रशिक्षित कर सकें और शॉट्स को सटीक बना सकें।

यदि इस स्तर पर इस तरह की सावधानी पर्याप्त नहीं होती, तो राज्यवर्धन सिंह राठौड़ अपनी पत्नी गायत्री को भी बुला लेते, जिसे उन्होंने पिछले दो वर्षों में केवल चार महीने तक देखा था। इससे पता चलता है कि वो किस तरह की तैयारी में लगे थे। 

जिस काम में उसने हाथ आजमाया था, वो बहुत मुश्किल था और लेकिन अब इनाम पाने का समय आ गया था।

एथेंस 2004 मेंस डबल ट्रैप से यूएई के अहमद अल मकतौम और चीन के वांग ज़ेंग के साथ भारतीय राज्यवर्धन सिंह राठौड़।

जब राठौड़ मे जीता एथेंस में सिल्वर मेडल

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की अच्छी शुरूआत नहीं हुई क्योंकि उन्होंने प्रारंभिक दौर में 200 में से 135 अंक हासिल किए लेकिन उन्हें पांचवें स्थान पर रखा गया और इसलिए वे आगे बढ़ गए। तत्कालीन 28 वर्षीय निशानेबाज़ की मां उन्हें 'चिल्ली' पूकारती थीं।

उन्होंने अपने लक्ष्य को अक्सर सही जगह मारा, लेकिन यूएई के शेख अहमद अल्माटोकम ने एक बढ़त हासिल की और अपने देश को पहला ओलंपिक पदक दिलाते हुए स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 34 साल की उम्र में शूटिंग शुरू की थी,

हालाँकि, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ पर दबाव अभी भी बना हुआ था क्योंकि वह रजत पदक के लिए तीन अन्य निशानेबाजों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे थे और अपने अंतिम प्रयास में अपने दोनों फ्लाइंग क्ले टारगेट को मारने की जरूरत थी।

कर्नल अपने दोनों शॉट्स को सही जगह मारा, जहां उन्होंने 200 में से 179 अंक हासिल किए और जश्न में अपना दाहिना हाथ उठाया।

"ओलंपिक पदक जीतना किसी भी खिलाड़ी के लिए सबसे गर्व का पल होता है, और मेरे लिए, गर्व की बात यह थी कि ओलंपिक में भारत के लिए पहला व्यक्तिगत रजत पदक जीतकर मैं अपने देश के लिए ऐसा कर सका।"

लेकिन राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के 2004 ओलंपिक के कारनामे का वास्तविक महत्व बहुत बाद में ही पचा चला।

सिल्वर मेडल ने बदली भारतीय शूटिंग की दशा

2004 में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का ओलंपिक पदक भारतीय शूटिंग के लिए स्पार्क साबित हुआ जिसने भारत को आगे के ओलंपिक खेलों - बीजिंग 2008 और लंदन 2012 में कई शूटिंग पदक जीतने के लिए प्रेरित किया।

अभिनव बिंद्रा (Abhinav Bindra), भारत के सबसे अधिक पहचाने जाने वाले भारतीय निशानेबाज हैं, जिन्होंने 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग के फाइनल में जगह बनाई, लेकिन सातवें स्थान पर रह पाए, जबकि लंदन 2012 में कांस्य पदक विजेता हमवतन गगन नारंग (Gagan Narang) फाइनल में नहीं जा सके।

बीजिंग 2008 के स्वर्ण पदक विजेता बिंद्रा ने अपने शानदार प्रदर्शन के लिए राज्यवर्धन सिंह राठौर के एथेंस में जीते गए पदक से प्रेरणा ली थी।

“राठौड़ ने मुझे बदल दिया। उनके रजत ने सुनिश्चित किया कि स्वर्ण पदक मैं जीत सकता हूं।"

इसके बाद, बिंद्रा ने लंदन 2012 में गगन नारंग और विजय कुमार (Vijay Kumar) को क्रमशः कांस्य और रजत के लिए प्रेरित करने में मदद की, जिससे भारतीय शूटिंग को चार ओलंपिक पदक मिले।

तब से लेकर अब तक बहुत से भारतीय शूटरों ने इसे पेशा बनाने का मन बना लिया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि राज्यवर्धन सिंह राठौड़ कहीं न कहीं सभी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा रहे हैं। चाहें वो जीतू राय (Jitu Rai) हो या फिर हीना सिंधु (Heena Sidhu), सभी के जीवन में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के साथ अभिनव बिंद्रा का भी प्रभाव पड़ा है। दिव्यांश सिंह पनवर (Divyansh Singh Panwar) से लेकर विश्व नंबर एक इलावेनिल वालारिवन (Elavenil Valarivan) ने भी शूटिंग से भारत को गौरवांवित किया है।

हाल के समय में मनु भाकर (Manu Bhaker) और सौरभ चौधरी (Saurabh Chaudhary) की जोड़ी ने शानदार झलक दिखाई है अंजुम मोदगिल (Anjum Moudgil) और अपूर्वी चंदेला (Apurvi Chandela) भी ज़ोरों से अपने कारवां को सफलता की ओर आगे बढ़ा रही हैं। राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की उपलब्धि को एक दशक से भी ज़्यादा हो चुका है लेकिन उनका बोया हुआ बीज आज भी भारतीय शूटिंग और भारत के गौरव में चार चांद लगा रहा है। टोक्यो 2020 की बात करें तो भारत की ओर से शूटिंग का सबसे बड़ा खेमा जापान में शिरकत करता हुआ दिखाई देगा।