कर्नल राठौड़ का ओलंपिक सिल्वर मेडल बना भारतीय शूटिंग का आधार

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने भारत को पहला ओलंपिक मेडल देकर इस खेल को भारत में मज़बूत किया और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन गए।

जब-जब भारत ने ओलंपिक गेम्स में उपलब्धि हासिल की है, तब-तब भारतीय प्रशंसकों ने इतिहास रचने वाले खिलाड़ी को अपने दिल में जगह दी है। ऐसे ही एक खिलाड़ी हैं जिन्होंने न केवल जीत का परचम लहराया, बल्कि भारतीय खेल जगत में बढ़-चढ़ कर अपना योगदान भी दिया है।

जी हां, हम बात कर रहे हैं राज्यवर्धन सिंह राठौड़ (Rajyavardhan Singh Rathore) की। आर्मी कर्नल, जिन्होंने साल 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल की लड़ाई में हिस्सा लिया था और भारत की विजय गाथा में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज कर लिया था। इसके बाद उन्होंने शूटिंग में भी अपना करियर बनाया और एथेंस 2004 ओलंपिक गेम्स में सिल्वर मेडल जीतकर भारतीय सरज़मीं को एक बार फिर गौरवान्वित किया। आपको बता दें कि राठौड़ के घर का नाम ‘चिली’ है और यह नाम उनको उनकी माँ ने दिया है।

उस साल भारत ने 73 खिलाड़ियों को प्रतिस्पर्धा के लिए भेजा था जिसमे 57 खिलाड़ी व्यक्तिगत खेलों में हिस्सा ले रहे थे और उस समय टीम खेल केवल एक ही था, और वह था फ़ील्ड हॉकी।

जुनून ने दिलाई जीत

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ में खेल का जुनून शुरू से ही था। इंडियन मिलिट्री अकादमी में ही राठौड़ का कौशल पता लग गया था और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने कश्मीरी ज़मीन पर भी भारत का साथ दिया था।

हालांकि जब बात शूटिंग खेल की होती है तो बात कुछ अलग होती है। इसमें खिलाड़ी को ‘सटीक’ होना पड़ता है और अपने लक्ष्य को हासिल करना होता है। राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने पहली बात शूटिंग को साल 1998 में इंडियन आर्मी में रहकर शुरू किया। इस दौर में उन्हें ज़रूरत एकाग्रता और अनुशासन की थी और उन्होंने इन दो गुणों पर अपनी पकड़ मज़बूत की।की।

आज़ाद भारत के लिए राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ओलंपिक में व्यक्तिगत सिल्वर मेडल जीतने वाले पहले खिलाड़ी बने।
आज़ाद भारत के लिए राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ओलंपिक में व्यक्तिगत सिल्वर मेडल जीतने वाले पहले खिलाड़ी बने।आज़ाद भारत के लिए राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ओलंपिक में व्यक्तिगत सिल्वर मेडल जीतने वाले पहले खिलाड़ी बने।

उंचे और लंबे कद के इस खिलाड़ी ने 2002 कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन क्ले टारगेट चैंपियनशिप (Commonwealth Games and Asian Clay Target Championships) में गोल्ड जीत कर अपने होने का प्रमाण पेश किया। इतना ही नहीं उन्होने वर्ल्ड शूटिंग और शॉटगन चैंपियनशिप (World Shooting and Shotgun Championships) में ब्रॉन्ज़ और सिल्वर मेडल भी हासिल किया।

बारीकियों पर दिया ध्यान

जनवरी 2004 तक राठौड़ ने खुद ही अभ्यास किया था लेकिन वे जानते थे कि इस सपने को पूरा करने के लिए उन्हें सही परीक्षण और सही सलाह की भी ज़रूरत है। अपने लक्ष्य को अपने दिल में लिए उन्होने इटली जाने का फैसला किया, जहां उनके गुरु बने पूर्व विश्व चैंपियन लूका मारिनि और ओलंपिक चैंपियन रसेल मार्क (Russell Mark)। वह इन दोनों के साथ लगभग 80 शॉट रोज़ाना अभ्यास करते थे और और अपने कौशल को और पुख़्ता करते थे।

उनकी इस शिद्दत ने उन्हें मौरो पेराज़्जी (Mauro Perazzi) से भी कुछ गुण सीखने की अनुमति दी और आगे चल कर 2004 ओलंपिक गेम्स में उन्होंने मौरो पेरज़्जी की ही गन का इस्तेमाल कर अपने करियर को पंख दिए।

इस बीच इस आर्मी मैन ने प्रतियोगिताओं की एक सूची तैयार की और ट्रेनिंग में जुट गए। अपने परिवार से लगभग 4 महीने से दूर रह रहे राठौड़ ने अपनी पत्नी को फोन कर कुछ रणनीतियों पर काम किया और हर समय बस शूटिंग कर बारे में ही सोचडबल शॉट ने दिलाया सिल्वर

एथेंस 2004 का सिल्वर मेडल राठौड़ के लिए ख़ास बना। इस दिन से पहले भारत ने व्यक्तिगत वर्ग में ब्रॉन्ज़ तक ही अपने कदम बढ़ाए थे। यह जीत इसलिए भी ख़ास थी क्योंकि यह मेडल भारत के लिए शूटिंग में पहला मेडल साबित हुआ।

मंच सज चुका था और खिलाड़ी तैयार थे। ऐसे में राठौड़ की शुरुआत मनचाही नहीं हुई। प्रिलिमिनरी राउंड में वे केवल 200 में से 135 अंक ही हासिल कर पाए और खुद को 5वें स्थान पर ले जा खड़ा किया। हालांकि इस स्थान की वजह से उनका कारवां रुका नहीं और उनके पास अथे।

इसके बाद राठौड़ ने निशाने सटीक होने लगे लेकिन यूएई के शेख अहमद अल मकतौम (Ahmed Almaktoum) ने अच्छी स्पर्धा दिखाते हुए गोल्ड हासिल किया। ग़ौरतलब है कि अहमद अल मकतौम ने शूटिंग 34 साल की उम्र में शुरू की थी लेकिन इस वजह से उनके हौसलों में कोई फर्क नहीं आया। ओलंपिक गेम्स में यह मेडल उनके भी देश के लिए शूटिंग का पहला मेडल साबित हुआ।

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ पर अत्यंत दबाव था क्योंकि सिल्वर मेडल के लिए तीन और दावेदार भी थे। भारतीय कर्नल ने सटीक पना दिखाते हुए 200 में से 179 अंक हासिल किए। उन्होंने अपने अंतिम शॉट्स को सही निशाने पर मारते हुए भारत के नाम एक सिल्वर मेडल जोड़ दिया और अपने नाम के आगे विजेता भी लगा दिया।

एथेंस 2004 मेंस डबल ट्रैप से यूएई के अहमद अल मकतौम और चीन के  वांग ज़ेंग के साथ भारतीय राज्यवर्धन सिंह राठौड़।
एथेंस 2004 मेंस डबल ट्रैप से यूएई के अहमद अल मकतौम और चीन के वांग ज़ेंग के साथ भारतीय राज्यवर्धन सिंह राठौड़।एथेंस 2004 मेंस डबल ट्रैप से यूएई के अहमद अल मकतौम और चीन के वांग ज़ेंग के साथ भारतीय राज्यवर्धन सिंह राठौड़।

सिल्वर मेडल ने बदली भारतीय शूटिंग की दशा

एथेंस 2004 ने भारत के शूटिंग के खेमे को और मज़बूत कर दिया। युवा खिलाड़ियों की प्रेरणा बनें राठौड़ ने शूटिंग का स्तर अपने देश में उंचा कर दिया।

इस खिलाड़ी ने अभिनव बिंद्रा (Abhinav Bindra) जैसे खिलाड़ियों को प्रेरणा दी और गोल्ड मेडल जीतने का हौंसला भी। 2008 बीजंग में गोल्ड मेडल जीतने वाले बिंद्रा ने कहा “राठौड़ ने मुझे बदल दिया। उनके सिल्वर मेडल ने मुझे गोल्ड मेडल जीतने का हौंसला दिया।”

इसके बाद यह सिलसिला रुका नहीं और लंदन गेम्स में ब्रॉन्ज़ जीतने वाले गगन नारंग (Gagan Narang) ने अभिनव बिंद्रा को अपना आदर्श माना था। इसी के साथ विजय कुमार (Vijay Kumar) ने भी बिंद्रा से प्रेरणा लेते हुए लंदन गेम्स में अपनी विजय गाथा लिखी और सिल्वर मेडल से देश को सम्भोधित किया।

तब से लेकर अब तक बहुत से भारतीय शूटरों ने इसे पेशा बनाने की साझी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि राज्यवर्धन सिंह राठौड़ कही न कही सभी खिलाड़ियों की प्रेरणा रहे हैं। चाहे वे जीतू राय (Jitu Rai) हो या फिर हीना सिंधु (Heena Sidhu), सभी के जीवन में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के साथ अभिनव बिंद्रा का भी प्रभाव पड़ा। दिव्यांश सिंह पनवर (Divyansh Singh Panwar) से लेकर विश्व नंबर एक इलावेनिल वालारिवन (Elavenil Valarivan) ने भी शूटिंग से भारत को इज़्ज़त बख़्शी है।

अभी की बात करें तो मनु भाकर, सौरभ चौधरी (Manu Bhaker and Saurabh Chaudhary) की जोड़ी सराहना की पात्र हैं और साथ ही अंजुम मोदगिल और अपूर्वी चंदेला (Anjum Moudgil and Apurvi Chandela) भी ज़ोरों से अपने कारवां को सफलता की ओर आगे बढ़ा रही हैं।

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की उपलब्धि को एक दशक से भी ज़्यादा हो चुका है लेकिन उनका बोया हुआ बीज आज भी भारतीय शूटिंग और भारत के गौरव में चार चांद लगाने में प्रभावशाली है। टोक्यो 2020 की बात करें तो भारत की ओर से शूटिंग का सबसे बड़ा खेमा जापान में शिरकत करता हुआ दिखाई देगा।

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