फ़ीचर

बैडमिंटन हिस्ट्री: भारतीय फ़ैन्स के लिए एक गाइड

भारत के कई बैडमिंटन सितारे एक बड़ा नाम बन गए हैं, तो आइए बैडमिंटन का इतिहास और बैडमिंटन के नियम जानने का प्रयास करते हैं।

लेखक लक्ष्य शर्मा ·

पीवी सिंधु (PV Sindhu), साइना नेहवाल (Saina Nehwal) और बी साई प्रणीत (B Sai Praneeth) की वजह से भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन हो रहा है और भारत में बैडमिंटन का क्रेज भी लगातार बढ़ता जा रहा है।

चाहे पिकनिक पर या एक प्रोफेशनल खेल के तौर पर,यह खेल हर किसी को भाता है। ये अलग बात है कि कम ही लोगों को पता है कि भारत में खेल का विकास कैसे हुआ।

पीवी सिंधु ने साल 2019 की शुरुआत में अपना पहला वर्ल्ड चैंपियनशिप टाइटल जीता।

यहां, हम बैडमिंटन का इतिहास और इसे प्रसिद्ध करने वाले लोगों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं, इसके अलावा बैडमिंटन के नियम समझने की कोशिश करते हैं।

PV Sindhu won her maiden World Championships title earlier this year

बैडमिंटन के उपकरण

जैसे दूसरे खेलों में गेंद का इस्तेमाल होता है, वैसे ही बैडमिंटन में शटलकॉक का उपयोग किया जाता है। परंपरागत रूप से, इससे बनाने के लिए हंस के पंखों का उपयोग किया जाता है, जिसको 16 चमड़े की पतली परत से ढके एक कॉर्क बेस में डाले जाते हैं।

बाएं पंख की तरफ से इसका उपयोग ज्यादा किया जाता है, ताकि बेहतर नतीजे हासिल किए जा सके। पंखों की लंबाई 62 और 70 मिमी के बीच होती है और वजन 4.74 से 5.50 ग्राम तक होता है।

वही प्रोफेशनल गेम में करीब 20 से 25 शटलकॉक का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि मैच के दौरान उसकी शेप बिगड़ जाती है। खिलाड़ी मैच के बीच में ही शटल को बदलने के लिए कह सकता है लेकिन केवल उसी कंडीशन में जब अंपायर और विरोधी भी इससे सहमत हों।

The shuttlecock: a 'ball' unlike no other

बैडमिंटन खेल का आविष्कार कैसे हुआ?

बर्डी से खेले जाने वाले इस खेल यानी बैडमिंटन की हिस्ट्री पर नज़र डालें तो सबसे पहले सवाल उठता है कि इस खेल का जन्म कहां और कैसे हुआ, इसके बारे में आज भी कुछ कहा नहीं जा सकता। बैडमिंटन का इतिहास बड़ा ही रोमांचक है। उनके अनुसार यह खेल सौ साल से भी पहले के समय से यूरोप और एशिया में ये खेल खेला जा रहा है। कहा जाता है कि इस खेल का नाम इंग्लैंड के ग्लॉस्टरशायर काउंटी ड्यूक ऑफ ब्यूफोर्ट के बैडमिंटन हाउस से पड़ा।

साल 1873 में भारत ने पुणे में तैनात ब्रिटिश अधिकारियों को अपने मेहमानों से मिलवाने के दौरान यह खेल खेला गया, इस खेल का नाम पुणे और पूने के बाद ही रखा गया।

इसके बाद कुछ ब्रिटिश स्वीकृत निकाय स्थापित हुए, जैसे 1877 में बाथ बैडमिंटन क्लब (Bath Badminton Club) और 1899 में बैडमिंटन फेडरेशन ऑफ इंडिया (Badminton Federation of India)। वहीं फिर बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन (Badminton World Federation ) की स्थापना साल 1934 में की गई ताकि अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन को संचालित किया जा सके। भारत साल 1936 में इस फेडरेशन में शामिल हुआ। इस आर्टिकल को पढ़ना जारी रखिए... यकीन मानिए बैडमिंट हिस्ट्री आपको स्कूल की किताबों की तरह उबाऊ नहीं लगेगी।

युद्ध के बाद के समय में एशियाई राष्ट्रों में न केवल भारत, बल्कि चीन, मलेशिया, दक्षिण कोरिया और जापान से भी कई महान खिलाड़ी निकले।

बैडमिंटन के नियम

आज के समय में बैडमिंटन तीन फॉर्मेट में खेला जाता है, सिंगल, डबल्स और मिक्सड डबल्स

सिंगल्स गेम में खिलाड़ी को यह फायदा होता है कि कोर्ट का आधा हिस्सा उसका ही होता है। हां इतनी जगह के लिए उसका फिटनेस और खेल का स्तर बहुत अधिक होता है। इसके अलावा खिलाड़ी को आक्रमकता और पोजिशन के लिए भी रणनीति बनानी पड़ती है।

वहीं डबल्स की बात करें तो दोनों तरफ इतनी ही जगह दो खिलाड़ियों के लिए होती है। इसमें सिंगल गेम की तरह पोजिशन पर ज्यादा फोकस नहीं करना पड़ता। डबल्स गेम काफी आक्रामक माना जाता है, खासकर मेंस डबल्स में ज्यादा आक्रामकता देखने को मिलती है।

मिक्स्ड डबल्स इस मायने में अलग हैं क्योंकि महिला खिलाड़ी को आगे और पीछे पुरुष खिलाड़ी को पोजिशन लेनी होती है। ये मानते हुए कि पुरुष ज़्यादा ताक़तवर होते हैं और उनकी पहुंच और स्मैश बेहतर होते हैं। इसी को देखते हुए प्रतिद्वंदी हमेशा इस रणनीति के साथ खेलते हैं कि महिला खिलाड़ी को आगे लाया जाए, और यही स्टाइल दूसरे भी अपनाते हैं।

बैडमिंटन खेल एक समकोण कोर्ट पर खेला जाता है, जो एक नेट द्वारा विभाजित होता है। कोर्ट एकल और युगल दोनों के लिए चिह्नित है, लेकिन कुछ मामलों में केवल एकल के लिए चिह्नित किया जाने की अनुमति होती है।

शटलकॉक को नेट की दूसरी तरफ मारने के लिए केवल एक मौका दिया जाता है, अगर शटल नीचे या नेट पर लग जाए तो अंपायर इसे फॉल्ट कहेगा। गलती होने पर दूसरे पक्ष को एक पॉइंट मिलता है और जो खिलाड़ी 21 पॉइंट पहले हासिल करता है, वह जीत जाता है।

जब दोनों विरोधियों के स्कोर 20-20 हो तो  कोई भी जब तक नहीं जीतता,जब तक वह 2 अंको की बढ़त ना हासिल कर लें। जब खेल 29-29 की बराबरी तक चला जाए तो जो गोल्डन पॉइंट हासिल करता है, वह विजेता बनता है।

बैडमिंटन के नियमों एक 'लेट्स' भी है, इस नियम में रैली रुक जाती है और दोबारा खेली जाती है लेकिन न तो स्कोर में बदलाव होता है और न ही सर्विस में कोई फेरबदल होता है। लेट्स का नियम तब पालन में आता है जब बग़ल में स्थित एक और कोर्ट पर मैच चल रहा हो और वहां से शटल कॉक इस कोर्ट पर आ जाए, और उस समय शटलर सर्विस लेने को तैयार न हो या शटल कॉक की वजह से उसका ध्यान भटक गया हो तो इसे लेट्स कहते हैं।

China’s Lin Dan is one of the most successful active players in badminton

बैडमिंटन और ओलंपिक

बैडमिंटन को सबसे पहले साल 1972 म्यूनिख ओलंपिक में शामिल किया गया था हालांकि साल 1992 तक इस खेल को पूरी तरह से ओलंपिक में शामिल नहीं किया गया था। इस दौरान केवल पुरुष और महिला एकल और युगल प्रतियोगिता शामिल थी।

इसके 4 साल बाद साल 1996 एंटलाटा ओलंपिक में मिक्सड डबल्स को भी शामिल किया गया और तब से लेकर अब तक ऐसा ही चल रहा है।

बैडमिंटन के महान खिलाड़ी

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध बैडमिंटन खिलाड़ियों में से, चीन के गाओ लिंग (Gao Ling), 2000-2004 के बीच चार ओलंपिक पदक के साथ, एक ऐसा नाम है जो किसी से भुलाए नहीं भूलता। वहीं दक्षिण कोरिया के गिल यंग-आह (Gil Young-ah) और किम डोंग-मून (Kim Dong-moon) का नाम भी इस लिस्ट में शामिल है, जिनके नाम 3 ओलंपिक पदक है

चीन के लिन डैन भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में शुमार

लिन डैन (Lin Dan) एक ऐसा नाम जिन्हें सिंगल फॉर्मेट के महान खिलाड़ियों में शुमार किया जाता है। वह अब इकलौते खिलाड़ी है, जिन्होंने 9 मेजर बैडमिंटन खिताब अपने नाम किए हैं। इस बात पर बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उनका निकनेम “सुपर डैन” है।

भारत का गर्व

प्रकाश पादुकोण (Prakash Padukone) एक ऐसा नाम जो सबसे पहले याद आता है, जिन्होंने इस खेल में भारत का नाम सबसे पहले रोशन किया। इस खिलाड़ी की सबसे बड़ी उपलब्धि साल 1978 कॉमनवेल्थ के सिंगल इवेंट में गोल्ड मेडल जीता है और इसके बाद वह साल 1980 में नंबर वन रैंकिंग हासिल करने वाले भारतीय बनें।

इस खिलाड़ी के पद चिन्हों पर चलते हुए सैयद मोदी (Syed Modi) और पुलेला गोपीचंद (Pullela Gopichand) ने भी देश का नाम रोशन किया। वहीं अगली पीढ़ी में सिंधु, नेहवाल और ज्वाला गुट्टा (Jwala Gutta) जैसी महिला खिलाड़ी ने देश का प्रतिनिधित्व किया।

भारत में बैडमिंटन की वैश्विक लोकप्रियता वास्तव में तब बढ़ गई जब उसने 1992 के बार्सिलोना में स्पेन के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में आधिकारिक खेल के रूप में अपनी शुरुआत की। दीपांकर भट्टाचार्य (Dipankar Bhattacharya) भाग लेने वाले भारत के पहले बैडमिंटन खिलाड़ी थे।

इसके बाद भारतीय खिलाड़ी लगातार ओलंपिक में हिस्सा लेते रहें। पीवी सिंधु और साइन नेहवाल ही ऐसी खिलाड़ी हैं, जिन्होंने ओलंपिक में पदक जीते हैं। साइना ने जहां 2012 लंदन ओलंपिक में तो सिंधु ने 2016 रियो ओलंपिक में पदक जीता।

पादुकोण की ओलंपिक गोल्ड क्वीस्ट (Olympic Gold Quest) से लेकर पुलेला गोपीचंद की घर को गिरवी रख कर तैयार की गई गोपीचंद बैडमिंटन एकेडमी युवा खिलाड़ियों को तराश रहे हैं।

आज उनके ही प्रयासों से खेल की दुनिया में कई बड़े नाम भारत ने दिए और बैडमिंटन को और उच्च स्तर पर ले जाने में मदद मिली है।