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साल 2019 में भारतीय फ़ुटबॉल का हर रंग जो लाता है उम्मीद की नई किरण

ब्लू टाइगर्स के लिए पिछले 12 महीने कायापलट करने वाले रहे, जिन्होंने भारतीय प्रशंसकों का काफी ध्यान आकर्षित किया।

लेखक सैयद हुसैन ·

पिछला एक साल भारतीय फ़ुटबॉल के लिए काफ़ी मिला जुला सफ़र लेकर आया, एक मंझे हुए कोच का अपने पद से अचानक मैच के बाद हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में इस्तीफ़ा देना नेश्नल फुटबॉल फ़ेडरेशन के लिए झटका देने वाला था, लेकिन अगले ही महीने उनकी जगह एक बेहतरीन कोच को लाना सभी को चौंका भी गया।

हालांकि इन उथल-पुथल के बीच ये दौर द ब्लू टाइगर्स के लिए एक नई उम्मीद के साथ ख़त्म हुआ।

एक धमाकेदार आगाज़

ऐसा कभी कभार ही होता है कि भारतीय फ़ुटबाल टीम की मैच रिपोर्ट दुनिया के हर संस्थानों द्वारा प्रकाशित हो, लेकिन जब 6 जनवरी को भारतीय टीम ने थाईलैंड को शिकस्त दी तो वह पूरी दुनिया में सुर्ख़ियां बन गईं।

ये न सिर्फ़ 1964 के बाद पहली बार एशियन कप फ़ाइनल्स में द ब्लू टाइगर्स की जीत थी बल्कि उनके कप्तान सुनील छेत्री ने लियोनेल मेसी को भी पीछे छोड़ दिया था। छेत्री एक्टिव खिलाड़ियों में सबसे ज़्यादा गोल करने के मामले में दूसरे नंबर पर पहुंच गए।

छेत्री ने उस मैच में हाफ़ टाइम तक दोनों ही टीमों की ओर से सबसे ज़्यादा गोल किए थे, और फिर जेजे लालफेकलुआ और अनिरुद्ध थापा के साथ मिलकर गोलों में और इज़ाफ़ा हुआ। भारत ने थाईलैंड को 4-1 से रौंदते हुए नॉकआउट दौर में जगह बनाने की ओर मज़बूत क़दम बढ़ा दिया था। इसी क्रम में छेत्री ने अपने करियर गोलों की संख्या 66 तक पहुंचा दी थी, जो मेसी से एक ज़्यादा है, इस फ़ेहरिस्त में पुर्तगाल के महान फ़ुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो 85 गोल के साथ सबसे ऊपर हैं।

अच्छे आगाज़ का अंत

कॉन्टिनेन्टल स्टेज पर इस शानदार शुरुआत के बावजूद भारतीय फ़ुटबॉल टीम इसे भुनाने में नाकाम रही। छेत्री और कंपनी को इसके बाद यूएई के हाथों 0-2 और बेहरिन से 0-1 से हार झेलनी पड़ी, जिसकी वदह से ग्रुप स्टेज से द ब्लू टाइगर्स आगे नहीं जा पाए, ये एक सपने का अंत होने जैसा था।

एक ड्रॉ ही भारत को अगले दौर में ले जाने के लिए काफ़ी था, लेकिन भारतीय टीम ने 91’’ वें मिनट में गोल खा लिया और प्रतियोगिता से बाहर होना पड़ा। इसके बाद उससे भी तगड़ा झटका तब लगा जब मैनेजर स्टीफ़ेन कन्सटनटाइन ने अपने पद से संन्यास ले लिया, चार साल से वह इस पद पर थे।

आईएसएल से आ रही प्रतिभाएं

कन्सटनटाइन के संन्यास का समय और 2018 इंडियन सुपर लीग की शुरुआत साथ साथ हुई थी, आईएसएल वह पूल है जहां प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। इस प्रतियोगिता का पांचवां संस्करण जो मार्च 2019 तक चला था, वहां से साहल अब्दुल सामद, आशिक़ कुरुनियान, लालियानज़ुआला चाग्टे, ब्रैंडन फ़र्नान्डीज़, नरेन्दर गेहलोत, निशु कुमार और इस तरह के कई ऐसे नाम सामने आए जो आने वाले वक़्त का सितारा हैं।

आईएसएल के उस संस्करण के ख़त्म होने तक आम लोगों के साथ साथ फ़ुटबॉल फ़ेडरेशन ने भी एक धारणा बना ली थी और वह ये थी कि अब समय आ गया है जब भारतीय फ़ुटबॉल में युवा प्रतिभाओं को मौक़ा मिलना चाहिए। इस उम्मीद की किरण ने और मांग उजागर कर दी थी और वह थी एक अच्छे कोच और टेक्निकल डायरेक्टर की जल्द से जल्द ज़रूरत। जो एक ऐसी नींव तैयार कर सकें, जिसमें युवा जोश भी हो अनुभव का समावेष भी ताकि नतीजों के साथ साथ फ़ैन्स का भी दिल जीता जा सके।

एक नया युग

इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ऑल इंडिया फ़ुटबॉल फ़ेडरेशन (एआईएफ़एफ़) ने अपने साथ रोमानिया के दिग्गज डोरु इसाक को नए टेक्निकल डायरेक्टर के तौर पर जोड़ा। जापानी क्लब योकोहामा के एफ़ मारिनो के पूर्व टेक्निकल डायरेक्टर ने इसपर ख़ुशी ज़ाहिर की, क्योंकि उनके रेज़ुमे में 1997 से 2002 तक जापानी ओर नागोया ग्रेम्पस आठ में प्रसिद्ध आर्सेन वेंगर के तौर पर शामिल होना भी लिखा था।  उनके साथ मुख्य रूप से युवा विकास पर ध्यान केंद्रित करना था, और अब वह समय आ चुका था जब उनके साथ एक कोच को भी जोड़ा जाए जिससे भारतीय फ़ुटबॉल में एक नई जान आनी थी।

पहले से ही योग्य और अनुभवी मैनेजर एलबर्ट रोका, स्वेन गोरान एरिक्सन और सैम अलार्डिस जैसे दिग्गजों का नाम एआईएफ़एफ़ के पास मौजूद था, लेकिन इसके बावजूद फ़ेडरेशन ने इगोर स्टीमैक को टीम का मैनेजर बनाकर सभी को चौंका दिया। असल में इस पूर्व क्रोशियाई मैनेजर के चयन के पीछे इंटरव्यू के दौरान उनके द्वारा दी हुई बेहतरीन प्रेज़ेंटेशन स्किल थी, हालांकि इसे फ़ुटबॉल फ़ैन्स ने कम सराहा। लेकिन एआईएफ़एफ़ को भरोसा था कि स्टीमैक ही वह शख़्स हैं, जो भारत को 2023 वर्ल्ड कप की सही दिशा में ले जाएंगे।

रोडमैप

2019 में ‘रोडमैप’ शब्द पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया, जिसमें एआईएफएफ ने आई-लीग क्लबों के साथ लगातार बहस भी की है, एआईएफ़एफ़ ने ये साफड किया कि आईएसएल प्रथम-स्तरीय लीग बनने के कगार पर है, और आई-लीग दूसरे स्तर पर पहुंच गई है।

इसके बाद देश की सबसे पुरानी फ़ुटबॉल लीग ने आलाधिकारियों से भी मुलाक़ात की, कई दौर की मुलाक़ातों के बाद अक्टूबर में एशियन फ़ुटबॉल फेडरेशन (एसीसी) और एआईएफ़एफ़ के बीच एक रोडमैप पर सहमति बनी और आख़िरकार इस बहस का अंत हुआ। इंडियन सुपर लीग को देश की सबसे प्रीमियर प्रतियोगिता मानते हुए इस बात पर मुहर लगी कि आईएसएल के विजेता को एएफ़सी चैंपियंस लीग का दर्जा मिलेगा और आई लीग के विजेता को एफ़सी कप का दर्जा दिया जाएगा।

इसके अलावा आईएसएल को ये भी निर्देश दिया गया कि 2020-21 के संस्करण के ख़त्म होने तक आई लीग के दो क्लबों को आईएसएल में शामिल किया जाए, और फिर 2022-23 और 2023-24 के संस्करणों में आई लीग के विजेता को आईएसल में बिना किसी शुल्क के लिया जाए। जबकि 2024-25 तक समानांतर इंडियन लीग कनवेन्शनल प्रमोशन और रेलेगेशन सिस्टम के तौर पर काम करेगी।

धीमी लेकिन स्टीमैक की सकारात्मक शुरुआत

इगोर स्टीमैक को भारतीय फ़ुटबॉल की डोलती कश्ती की ठिन चुनौती दी गई थी, जिसने कई तूफ़ानों को भी देखा और सहा। शुरुआत में इस क्रोशियाई मैनेजर ने बेहतरीन अंदाज़ में भारतीय फ़ुटबॉल के मसीहा बन कर उभरे, उन्होंने कई युवा खिलाड़ियों को मौक़े दिए।

लेकिन कोई इमारत सिर्फ़ एक दिन में नहीं खड़ी हो जाती, इसके लिए स्टीमैक और फ़ैन्स सभी को ही कुछ वक़्त का इंतज़ार करना होगा। इसमें वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफ़ाई करने का चल रहा भारतीय क्रम बेहद शानदार उदाहरण है। भारत ने अब तक पांच में से तीन मैच ड्रॉ कराए हैं और दो में उन्हें हार भी मिली है, लेकिन जो भी भारतीय फ़ुटबॉल को क़रीब से जानते और देखते हैं, उन्हें ये ज़रूर लग रहा होगा कि वे सही दिशा में जा रहे हैं।

एक तरफ़ जहां कन्सटनटाइन जहां लॉन्ग बॉल में विश्वास रखते थे, और इसके लिए वह फ़ॉर्वर्ड में अच्छे और अनुभवी खिलाड़ियों को रेखते थे तो इसके ठीक उलट स्टीमैक की रणनीति कुछ अलग है। उन्हें ऐसे खिलाड़ियों को रखना पसंद है जो पास बहुत दिया करते हैं, और इसी पर वे खेल को आगे बढ़ाते हैं।

धीमी गति से हो रहे इन बदलावों ने ज़ाहिर तौर पर प्रशंसकों को थोड़ा असंयमित कर दिया है, लेकिन जब वर्ल्ड कप की मेज़बानी कर रहे देश क़तर के ख़िलाफ़ उन्हीं के घर में ड्रॉ खेला तो ये भी साबित किया और फ़ैन्स को जोश से लबरेज़ किया कि ब्लू टाइगर्स दहाड़ मारने के लिए भी तैयार हैं।