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वीआर रघुनाथ के जज़्बे ने उन्हें कैसे बनाया भारतीय हॉकी का दिग्गज

2013 एशिया कप में भारत के हाथ आया सिल्वर मेडल और साथ ही इस ड्रैग फ्लिकर ने “प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट” का खिताब भी हासिल किया।

लेखक Saurabh Shankar ·

एक खिलाड़ी का जीवन बहुत मुश्किलों से भरा होता है। टीम में अपनी जगह बनाने से लेकर खुद को हर चुनौती के लिए तैयार रखने तक, एक खिलाड़ी को अलग-अलग पड़ावों से गुज़ारना होता है। शारीरिक तौर से लेकर मानसिक संतुलन भी एक खिलाड़ी के लिए आवश्यक है। कभी एक खिलाड़ी आसमान पर होता है तो कुछ ही दिनों बाद वह टीम में जगह बनाने के लिए जूझ रहा होता है।

ऐसी ही ऊंचाई और निचाई भरा करियर रहा है भारत के पूर्व डिफेंडर और ड्रैग फ्लिकर वीआर रघुनाथ का। रघुनाथ ने अपने करियर में बहुत से उतार चढ़ाव देखें हैं, लेकिन बुरे समय में कभी भी अपना मनोबल गिरने नहीं दिया। टीम से बाहर हो जाने पर भी रघुनाथ ने कोशिशों में कमी नहीं आने दी और जब भी टीम को उनकी ज़रूरत पड़ी वह हमेशा अपनी काबिलियत लेकर तैयार रहखेल से जुड़ीं जड़ेवोक्कालिगा रामचंद्र रघुनाथ का जन्म कर्नाटक के कोडागु जिले के हाथुर गाँव में हुआ था। करीब 9 साल की उम्र में ही रघुनाथ ने खेल में करियर बनाने का फैसला किया। उनके पिता वीएस रामाचंद्रा जो कि भारत के लिए हॉकी खेल चुकें हैं, उन्ही से प्रेरणा लेकर रघुनाथ ने इस खेल को चुना।

युवा रघुनाथ ने हॉकी के अलावा बास्केटबॉल भी खेला लेकिन हॉकी की तरफ ज़्यादा रुझान होने के कारण उन्होंने बास्केटबॉल को शौकिया तौर पर रखा। कम उम्र में ही रघुनाथ ने भारत के लिए खेलने और मेडल जीतने का सपना देख लिया था।

रघुनाथ के जीवन का सफ़र स्पोर्ट्स अथोरिटी ऑफ़ इंडिया तक पहुंच गया था। साल 2003 में रघुनाथ को इंडिया सब-जूनियर के लिए चुना गया और वह एशिया कप का हिस्सा बनें। अपने उम्दा डिफेंसिव तकनीक से उन्होंने बहुत नाम कमाया और भारत उस प्रतियोगिता को जीतने में सफल भी रहा।

संदीप सिंह (बाएं) को चोट लगने के कारण वीआर रघुनाथ ने 2005 में भारतीय हॉकी में डेब्यू किया

कुछ सालों बाद रघुनाथ को सीनियर टीम में संदीप सिंह की जगह शामिल किया गया और उन्हें पाकिस्तान के खिलाफ खेलने का मौका मिला। उस समय वह सिर्फ 17 साल के थे और कोच द्वारा उन्हें फील्ड पर एक सीमित समय दिया गया। भारतीय टीम में अपनी जगह पुख्ता करने के लिए रघुनाथ ने ड्रैग फ्लिक के गुण को निखारा और अपने कारवां को आगे बढ़ाया।

“मैंने यह देखा कि भारत के पास ड्रैग फ्लिकर के खिलाड़ी कम हैं जो कि किसी भी समय खेल को पलट सकें। मुझमे यह खूबी थी और मैंने सूरज की गर्मी में घंटों इसे पुख्ता किया।” Indian publication के साथ बातचीत में रघुनाथ ने ये बातें बताईं।

कहते हैं न कि चुनौतियों को पार कर लेने के बाद अवसर ज़रूर मिलता है। रधुनाथ की मेहनत रंग लाई और 2008 सुल्तान अज़लान शाह कप के लिए उनका चयन किया गया। उनके कड़े डिफ़ेंस की बदौलत भारतीय टीम ने इस प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल जीता। बड़ी बात तो तब बनीं जब रघुनाथ को अपनी ही टीम के संदीप, जुगराज सिंह और इग्नेस तिर्की जैसे धुरंधरों के बीच अपनी जगह बनानी थी।

सख्त समय

खिलाड़ी का समय ज़रूर बदलता है और रघुनाथ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 2010 में इन्हें टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और FIH मेंस हॉकी वर्ल्ड कप में खेलने का सपना अधूरा रह गया। टीम में न होने की वजह से रघुनाथ का वज़न बढ़ना शुरू हो गया, जिसका परिणाम उनकी फिटनेस पर भी पड़ा। भारत में ही खेले जाने वाले 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी वे भाग नहीं ले पाए और इससे उनके करियर पर गहरा असर पड़ा।

एक खिलाड़ी वही होता है जो टीम से बाहर होकर भी वापसी करे। टीम में न होने के बाद भी रघुनाथ ने अपने मनोबल को हिलने नहीं दिया और डोमेस्टिक प्रदर्शन पर ध्यान देते हुए भारतीय टीम में आने की ललक अपने साथ रखी। एक साल के बाद इस खिलाड़ी ने टीम में दोबारा अपनी जगह बनाई और इस बार बारी थी 2012 लंदन गेम्स को फतह करने की। नए कोच माइकल नॉब्‍स और नए फ़िजियो डेविड जॉन ने रघुनाथ का बाखूबी साथ निभाया जिससे उन्हें अपनी जगह पुख्ता करने में आसानी हुई और पूरी टीम ने बेहतर परिणाम प्राप्त किए।

रघुनाथ ने एक इंटरव्यू में बताया कि “माइकल नॉब्‍स ने पूरी टीम ही बदल दी थी। उनके योगदान को सराहाया जाना चाहिए। उन्होंने टीम के सयोंजन को परख कर टीम बनाई। डेविड जॉन के आने से खिलाड़ियों की फिटनेस में काफी सुधार आया है।” हालांकि 2012 लंदन गेम्स में भारतीय टीम कुछ ख़ास नहीं कर पाई और प्रतियोगिता में कुल मिलकर उन्होंने 18 बार अपने प्रतिद्वंदियों को गोल मारने की अनुमति दी। इतना ही नहीं, मेंस हॉकी टीम 2012-13 की FIH प्रो लीग में भी जूझती दिखी और छठे पायदान पर प्रतियोगिता का अंत किया।

समय वापसी का

साल 2013 के मौजूदा हालातों को देखते हुए भारतीय टीम से एशिया कप में अच्छे प्रदर्शन की आस टूटटी जा रही थी। इस प्रतियोगिता में पाकिस्तान, साऊथ कोरिया जैसे कड़े प्रतिद्वंदी भी हिस्सा ले रहे थे और भारत का पलड़ा कहीं न कहीं कमज़ोर णाम प्राप्त किए।

वीआर रघुनाथ को 2013 एशिया कप में प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट का खिताब मिला

हालांकि यह प्रतियोगिता भारत और रघुनाथ के लिए सफल साबित हुई। अपने ड्रैग फ्लिक के कौशल से इन्होने कुल 6 गोल दागे और भारत को फाइनल तक की राह दिखाई। साऊथ कोरिया बनाम भारत, यह फाइनल दोनों ही मुल्कों के लिए ख़ास था। मुकाबला भी कड़ा हुआ लेकिन 3-4 के स्कोर से भारत को हार का सामना करना पड़ा। लेकिन भारतीय हॉकी टीम के प्रदर्शन की जमकर तारीफ़ हुई और इतना ही नहीं रघुनाथ को प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट के खिताब से भी नवाज़ा गया।

अब रघुनाथ ने भारतीय हॉकी टीम में अपनी जगह मज़बूत कर ली थी। 2014 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने सिल्वर मेडल जीता और रघुनाथ इस टीम के अहम खिलाड़ियों में गिने गए। इतना ही नहीं, यह खिलाड़ी 2016 रियो ओलंपिक गेम्स में भी टीम की मज़बूत कड़ी था। साल 2016 में, रघुनाथ को अर्जुन अवॉर्ड से नवाज़ा गया और यह किसी भी खीलाडी के लिए बेहद ख़ास होता है। महिला हॉकी टीम की बात करें तो ऋतू रानी को भी अर्जुन अवॉर्ड दिया गया और हॉकी ने उस साल बहुत सी वाह वाहाई लूटी।

अपना सूरज उदय किया, हर सरज़मीन पर अपना लोहा मनवाया और साल 2017 में वीआर रघुनाथ खेल से रिटायर हो गये। अपने नाम 100 से भी ज़्यादा अंतराष्ट्रीय गोल किए और अनगिनत पुरस्कारों से नवाज़े जाने के बाद रघुनाथ ने हॉकी की दुनिया में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करा लिया। फिलहाल मेंस हॉकी टीम की डिफ़ेंस की कमान हरमनप्रीत सिंह, रुपिंदर पल सिंह और बीरेंद्र लाकड़ा के हाथ है।