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पुलेला गोपीचंद: वो दिग्गज खिलाड़ी जिसने साइना और सिंधु जैसे हीरो को तराशा 

भारतीय बैडमिंटन दिग्गज ने साइना नेहवाल और पीवी सिंधु जैसे धुरंधर खिलाड़ियों को कोचिंग देकर ओलंपिक खेलों में बढ़ाया है देश का सम्मान

लेखक जतिन ऋषि राज ·

“अगर आप खेल से प्यार करते हैं, या उससे जुड़े ज्ञान को बांटते हैं बावजूद इसके अंदर से आप जानते हैं कि आपको खेल से जुड़ा सब कुछ मालूम नहीं है तो यकीन मानिए आप एक बेहतरीन कोच बन सकते हैं।” कुछ इस तरीके से भारतीय बैडमिंटन के दिग्गज पुलेला गोपीचंद चंद ने ओलंपिक चैनल से बात करते हुए अपने एक्सक्लूसिव इंटरव्यू की शुरुआत की।

अपने ऐसे ही सिद्धांतो पर चल कर यह पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी अपने कोचिंग के करियर को ऊंचाइयों तक ले गया। पहले खिलाड़ी बन कर और अब कोच के तौर पर गोपीचंद ने भारतीय बैडमिंटन के इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों से दर्ज कर दिया है।  पीवी सिंधु, साइना नेहवाल और श्रीकांत किदांबी जैसे दिग्गजों को बैडमिंटन के गुण सिखाने वाला यह कोच आज भी अपने देश के गौरव को बढ़ाने की इच्छा रखता है। अगर इनके ओलंपिक गेम्स के करियर की बात करें तो इनके पास 2000 सिडनी गेम्स के दौरान प्री-क्वाटरफाइनल तक की यादें हैं। लेकिन रिटायरमेंट के बाद गोपीचंद ने साइना और सिंधु द्वारा भारत को दो ओलंपिक मेडल जितवाएं हैं और यह बात भारतीय बैडमिंटन इतिहास में चार-चांद लगाती है।

पुलेला गोपीचंद की कोचिंग में पीवी सिंधु ने रियो 2016 में रजत पदक जीता।

एक सुनेहरा सपना

गोपचंद अपने समय के एक बेहतरीन खिलाड़ी रहे हैं और इस बात का प्रमाण उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स 1998 में दो मेडल जीत कर दिया। तीन साल बाद उन्होंने प्रकाश पादुकोन के बाद ऑल इंग्लैंड ओपन जीत कर बैडमिंटन की दुनिया में अपनी छाप छोड़ी। हालांकि ओलंपिक गेम्स का सफर कुछ ख़ास नहीं रहा और उसके बाद घुटने की चोट के कारण उनका कोर्ट पर असर ज़रूर कम हुआ। यह कुछ पहलू रहे जिनकी वजह से गोपीचंद ने अपने करियर में कुछ और कहानियां जोड़ने का फैसला किया।

"कई चीजें मैंने ट्रायल के दौरान और अपनी गलतियों से सीखीं। इसलिए, अपने करियर के अंत में जब मैंने जीतना शुरू किया तो चीज़े अच्छी लगने लगीं। उस समय मुझे एहसास हुआ कि जीतने का यही फॉर्मूला था और जीतने के लिए यही जरूरी है। लेकिन दुर्भाग्य से मैं इसका बहुत अधिक इस्तेमाल नहीं कर सका, क्योंकि मैं चोटिल हो गया। मेरे घुटनों की कई सर्जरी हुईं और मेरे पैर में बहुत सारी समस्याएं रहने लगीं। खेलने और आराम करने के इस उतार-चढ़ाव ने मुझे कोचिंग की ओर धकेल दिया, क्योंकि मुझे लगा कि मैनें जो भी सीखा है वह युवा खिलाड़ियों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। इसलिए मुझे अपने अनुभव को सभी से साझा करना चाहिए।" गोपीचंद ने इंटरव्यू के दौरान बताया।

उन्होंने आगे कहा "यह लगभग किसी नई चीज़ को जानने और उसका उपयोग करने की ललक के समान था। भले ही इसने काम किया या नहीं, लेकिन मुझे लगता है कि इसने मुझे अचानक कोचिंग करियर में आगे बढ़ा दिया। क्योंकि जब मैनें खुद को कम, फिर और कम खेलते हुए देखा, तो मैनें ठान लिया कि अब कोचिंग देना ही सही रहेगा। इससे जूनियर खिलाड़ियों को काफी मदद मिलेगी। सौभाग्य से मेरे लिए शुरुआती परिणाम ही बहुत अच्छे रहे।"

गोपीचंद अकादमी

साल 2008 में हैदराबाद शहर के गच्चीबौली ज़िले में गोपीचंद ने अपने ही नाम से पुलेला गोपीचंद बैडमिंटन अकादमी खोली। इतना ही नहीं, गोपीचंद ने इस अकादमी खोलने के सपने को अपना घर गिरवीं रख पूरा किया। एक से बढ़कर एक सुविधा के साथ गोपीचंद का अनुभव हर भारतीय युवा खिलाड़ी के लिए सर्वश्रेष्ठ खिलाडी बनने के लिए काफी है।

उन्होंने कहा "मेरे लिए काम करने का जुनून और उसकी गुणवत्ता बेहद अहम है। अगर आपको बेहतर बनना है तो आपको उच्च दर्जे का अभ्यास करना ज़रूरी है और उससे भी ज़रूरी है कि वह अभ्यास लगातार चलता जाए। एक और अहम बात यह है कि आप सिर्फ 4-5 घंटे अभ्यास करने के बाद पूरा दिन वह सब नहीं कर सकते जिस वजह से आपके अभ्यास या खेल को सीखने की आदत ख़राब हो।”

अपने कोचिंग के तरीकों पर बात करते हुए गोपीचंद ने कहा "यह बहुत ज़रूरी है कि आपकी ज़िन्दगी में ध्यान बना रहे तब भी जब आप खेल रहे हैं और जब आप नहीं भी खेल रहे हो। एक खिलाड़ी के लिए अच्छा आराम, सही आहार और अनुशासन बेहद ख़ास चीज़ें हैं।"

यह सभी गुण उनकी शिष्य साइना नेहवाल ने सीखे और उनको इस मेहनत का फल भी मिला। नेहवाल पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं जिन्होंने ओलंपिक मेडल जीता। यह कारनामा उन्होंने 2012 लंदन गेम्स के दौरान किया।

नेहवाल के बारे में बात करते हुए गोपीचंद ने 2008 बीजिंग गेम्स के एक किस्से को याद कर कहा कि कैसे नेहवाल ने क्वार्टरफाइनल की भिड़ंत में मारिया युलिआंती से मिली बढ़त को गंवाने के साथ-साथ मुकाबले को भी गंवा दिया। "उस समय नेहवाल महज़ 18 साल की थी और मुकाबले में 11 - 4 से आगे चल रही थी लेकिन फिर भी वह हार गई। उन्हें खुद को नहीं पता कि उस दिन उन्होंने क्या खोया था। उस दौरान, मज़ाक में मैंने उन्हें अगले दिन जिम आने को कहा तो उन्होंने कहा कि “क्या मैं कल थोड़ा ज़्यादा आराम कर सकतीं हूं? मैं सुबह 6:30 तक पहुंच जाउंगी।" इस बात से पता चलता है कि अपने खेल के प्रति वह शुरु से ही कितनी समर्पित थी।" गोपीचंद ने आगे बात करते हुए बताया।

यह गोपीचंद का ही दृढ़ निश्चय था जिसने नेहवाल को 2008 बीजिंग की बुरी यादों को दूर किया और उन्हें आगे और बेहतर करने का हौसंला दिया। कोच गोपीचंद की मेहनत तब रंग लाई जब नेहवाल ने चार साल बाद 2012 लंदन ओलंपिक में मेडल जीता। इस जीत का श्रेय नेहवाल के साथ-साथ उनके कोच गोपीचंद की उस ज़िद को भी जाता है जिसने अपने शिष्य पर भरोसा जताते हुए उसे तराशने की कोई कसर नहीं छोड़ी।