भारत के राहुल अवारे ओलंपिक में जगह बनाने के लिए तैयार, रेसलिंग के फिर से शुरू होने से जागी उम्मीद

फ्रीस्टाइल रेसलिंग कॉमनवेल्थ गेम्स चैंपियन को टोक्यो 2020 में एक और ओलंपिक से बाहर होते देखा जा रहा था, लेकिन अब उन्हें उम्मीद की एक नई किरण नज़र आई है और वह अपने मिशन से विचलित नहीं होना चाहेंगे। 

टोक्यो 2020 ओलंपिक खेलों को स्थगित किए जाने की वजह से भारतीय फ्रीस्टाइल रेसलर राहुल अवारे (Rahul Aware) को ओलंपिक खेलों में प्रतिस्पर्धा करने का मौका मिल सकता है।

57 किग्रा में 2018 राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण पदक जीतने के बावजूद शुरुआत में ऐसा नहीं लग रहा था कि 28 वर्षीय को ओलंपिक में प्रतिस्पर्धा करने के लिए चुना जाएगा। हमवतन रवि कुमार (Ravi Kumar) ने उनकी राह को मुश्किल बना दिया, क्योंकि 57 किलोग्राम में 2019 विश्व चैंपियनशिप के कांस्य पदक जीतकर उन्होंने पहले ही अवारे के पसंदीदा भार वर्ग में भारत के लिए ओलंपिक बर्थ हासिल कर लिया था।

नूर-सुल्तान में हुई 2019 विश्व चैंपियनशिप में ही अवारे ने कम प्रतिद्वंद्विता [लेकिन गैर-ओलंपिक] वाले 61 किलोग्राम भार वर्ग में हिस्सा लेने का फैसला किया और वहां उन्होंने कांस्य पदक भी जीता।

वास्तविक रूप से अब वह 65 किग्रा ओलंपिक भार वर्ग में चुनौती दे सकते थे। लेकिन एशियाई खेलों में राष्ट्र के शीर्ष पदक की उम्मीदों में से एक माने जा रहे बजरंग पूनिया (Bajrang Punia) ने पहले ही उस भार वर्ग में क्वालीफाई कर लिया था। जिसने अवारे के लिए इस दरवाज़े को भी बंद कर दिया था।

राहुल अवारे ने स्टीवेन ताकाहाशी को हराकर गोल्ड कोस्ट में हुए 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में 57 किग्रा का स्वर्ण पदक जीता।
राहुल अवारे ने स्टीवेन ताकाहाशी को हराकर गोल्ड कोस्ट में हुए 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में 57 किग्रा का स्वर्ण पदक जीता।राहुल अवारे ने स्टीवेन ताकाहाशी को हराकर गोल्ड कोस्ट में हुए 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में 57 किग्रा का स्वर्ण पदक जीता।

मुझे लगता है कि रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (WFI) चयन ट्रायल के लिए जाएगा। ऐसे में मैं अपना 100 प्रतिशत दूंगा।”

हालांकि, ऐसा भी जरूरी नहीं है कि जिस एथलीट ने ओलंपिक के लिए अपने राष्ट्र के स्पॉट को सील किया हो, वही ओलंपिक खेलों में प्रतिस्पर्धा कर सकता है। 2019 में क्वालिफाइंग इवेंट्स और साल 2021 में होने वाले टोक्यो 2020 की तारीखों के बीच इतने लंबा समय अंतराल होने के साथ अवारे का मानना है कि उनके पास अभी भी भारतीय ओलंपिक संघ द्वारा चुने जाने का मौका हो सकता है।

उन्होंने स्पोर्टस्टार से कहा, "इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जिस पहलवान ने भारत के लिए जगह पक्की की है, वह भविष्य में अच्छे फॉर्म में होगा। मुझे लगता है कि रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (WFI) सेलेक्शन ट्रायल कराएगा। ऐसे में मैं अपना 100 प्रतिशत दूंगा।”

जल्दी गुस्सा हो जाने वाला एक छोटा बच्चा

अगर साल 2021 में होने वाले ओलंपिक खेलों में अवारे अपनी जगह पक्की करने में सफल रहते हैं तो मध्य भारतीय राज्य महाराष्ट्र से अपनी अद्भुत शुरुआत के लिए यह बड़ी उपलब्धि होगी। क्योंकि यहां कुश्ती को बहुत लोकप्रियता मिलती है।

पूर्व प्रतिस्पर्धी पहलवानों का बेटा और पोता होने की वजह से ही अवारे ने बहुत पहले ही इस खेल का स्वाद चख लिया था। इसके साथ ही वह यहां अपने आक्रामक स्वभाव का भी अच्छी तरह इस्तेमाल कर सके।

उनके पिता बालासाहेब अवारे ने प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) को बताया, “राहुल जब स्कूल में था, तब बहुत झगड़ा करता था। वह एक जल्दी गुस्सा हो जाने वाला बच्चा था। तकरीबन हर रोज़ गांव के लोग मेरे पास उसकी शिकायत लेकर आते थे। तभी मैंने उसके अंदर के रेसलर को पहचाना था। उसके गर्म मिजाज़ ने उसे एक अच्छा पहलवान बनने में काफी मदद की है।”

एक गर्म स्वभाव के बच्चे के लिए कुश्ती का मंच उसके लिए सही साबित हुआ। 
एक गर्म स्वभाव के बच्चे के लिए कुश्ती का मंच उसके लिए सही साबित हुआ। एक गर्म स्वभाव के बच्चे के लिए कुश्ती का मंच उसके लिए सही साबित हुआ। 

विनम्र और अद्भुत शुरूआत

12 साल की उम्र में उसके अपने से बेहतर प्रतिद्वंद्वियों से प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता की पहचान होने के बाद उन्हें पुणे में 1970 के राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता हरिश्चंद्र बिराजदार (Harishchandra Birajdar) के सानिध्य में प्रशिक्षण लेने के लिए भेज दिया गया। इस एक सही फैसले ने उसे सीनियर नेशनल्स में सात स्वर्ण पदक, कॉमनवेल्थ और वर्ल्ड ब्रॉन्ज़ मेडल ख़िताब जीतने में मदद की।

अपने गांव में एक मुफ्त रेसलिंग ट्रेनिंग सेंटर चलाने वाले अवारे के पिता वर्ल्ड चैंपियनशिप में अपने बेटे की उपलब्धि से बहुत खुश थे। यह परिवार एक सप्ताह में 15,000 रुपए में अपना गुजारा करता था।

उन्होंने आगे कहा, "हमने जिस तरह से अपना गुजारा किया है, उस तरह से आज राहुल की इतनी बड़ी जीत पूरे इलाके को खुशी देती है। राहुल की ऐतिहासिक जीत मेरे लिए सबसे बड़ा खुशी का पल है। मैं भी एक पहलवान था, लेकिन मार्गदर्शन की कमी की वजह से मैं उत्कृष्ट प्रदर्शन नहीं कर सका।”

ओलंपिक निराशा

अवारे के करियर का सबसे बुरा पल तब आया जब उन्होंने महसूस किया कि राष्ट्रीय महासंघ ने रियो 2016 ओलंपिक में उन्हें स्थान देने से अनदेखा किया है।

57 किग्रा में भारत के राष्ट्रीय चयन ट्रायल में जीत हासिल करने के बाद उन्हें मंगोलिया में होने वाले ओलंपिक क्वालिफिकेशन टूर्नामेंट में प्रतिस्पर्धा करने के लिए नहीं चुना गया, जहां युवा स्टार के पास तीन क्वालिफाइंग स्थानों में से एक को हासिल करने का शानदार मौका था।

उनकी जगह संदीप तोमर (Sandeep Tomar) को भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया, और बाद में उन्होंने ब्राजील में प्रतिस्पर्धा की थी।

भार वर्ग को बदला

अपने हाथों से ओलंपिक का मौका निकल जाने के बाद अवारे रेसलिंग मैट पर अपनी बढ़ी हुई भूख के साथ लौटे, और पहले से कहीं ज्यादा गुस्से में भी। गोल्ड कोस्ट में हुए 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में एक मनोरंजक अंतिम बाउट में उन्होंने चोट से उबरने के बाद कनाडा के स्टीवेन ताकाहाशी (Steven Takahashi) को 15-7 से करारी शिकस्त दी।

इस सफलता के बावजूद उन्होंने 2019 विश्व चैंपियनशिप के लिए 61 किलोग्राम और एक गैर-ओलंपिक भार वर्ग में जाने का विकल्प चुना। कांस्य पदक जीतने के बावजूद, 57 किग्रा में रवि कुमार के कांस्य पदक के साथ वह भार वर्ग श्रेणी में बदलाव करने के अपने फैसले के साथ टोक्यो 2020 ओलंपिक खेलों में जगह बना सकते हैं।

तो राहुल अवारे ने ऐसा क्यों किया?

उन्होंने 61 किग्रा में प्रतिस्पर्धा करने के अपने फैसले के बारे में बात करते हुए हिंदुस्तान टाइम्स से कहा, "मैं इस भार वर्ग में अच्छा प्रदर्शन कर रहा हूं। वैसे में 57 किग्रा वर्ग में भी भाग ले सकता था, लेकिन 61 किग्रा वर्ग में प्रतिस्पर्धा करना सुनिश्चित किया और उसके बाद से मैं लगातार पदक जीत रहा हूं। मुझे पता था कि यह ओलंपिक भार वर्ग नहीं है, लेकिन मैं हर स्तर पर सफलता हासिल करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूं।”

अवारे ने आगे कहा, "हम ओलंपिक से एक साल दूर हैं और कुछ भी हो सकता है, लेकिन अगर इस बार नहीं तो मैं निश्चित रूप से 2024 के ओलंपिक और यहां तक कि 2028 में भी अपनी छाप छोड़ना चाहूंगा।"

भविष्य की संभावनाएं

2016 में अपनी ओलंपिक निराशा के बाद उन्होंने अपने खेल को शिखर तक पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत की। यह एक क्रूर और गलत निर्णय होगा अगर टोक्यो में एक बार फिर उन्हें ओलंपिक खेलों की चयन प्रक्रिया से बाहर रखा गया।

लेकिन वह एक बड़ा गेम खेल रहे हैं, और अपने भविष्य की सफलता का आधार तैयार कर रहे हैं। अभी के लिए उनकी मुख्य प्राथमिकता खुद खेल में सुधार करना है, और उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ उन्हें जीत हासिल करने से अधिक अनुभव मिलेगा। यह उनके लिए बहुत अच्छा होगा।

उन्होंने कहा, "अंतरराष्ट्रीय इवेंट्स में लगातार भाग लेने की वजह से मुझे अपनी तकनीक में सुधार करने की सलाह दी जाती है। मुझे यह भी पता चला कि ईरान, रूस और अमेरिकी पहलवान कैसे अभ्यास करते हैं। हमें मैट पर बेहतर होने के लिए उनकी शैली को लागू करने की आवश्यकता है। हमें अपने पहलवानों को नई तकनीकों और कौशलों को सिखाने की जरूरत है।”

अगर महाराष्ट्र का लड़का कॉमनवेल्थ चैंपियन बन सकता है तो जरा कल्पना कीजिए कि वह किन ऊंचाईयों तक पहुंच सकता है। उनकी अद्भुत प्रतिभा उन्हें भविष्य में बहुत आगे ले जा सकती है।

क्या आपको यह आर्टिकल पसंद आया? इसे अपने दोस्तों के साथ साझा करें!