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पढ़ें टोक्यो 2020 के लिए क्वालिफाई करने वाले शिवपाल सिंह की कहानी, जिन्हें विरासत में मिला खेल

वाराणसी के एक परिवार में जन्मे शिवपाल सिंह जेवलिन थ्रो में देश दुनिया में भारत का नाम रोशन कर रहें हैं।

लेखक सतीश त्रिपाठी ·

भारत के उत्तर में बसा वाराणसी (Varanasi) जिला धार्मिक नगरी के रूप में जाना जाता है, जो हमेशा से भक्तों और पर्यटकों को लुभाता रहा है। गंगा नदी के तट पर स्थित यह शहर अपनी संस्कृति और परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इस शहर के सभी कस्बों की हलचल से दूर इसकी एक और पहचान है, जो वाराणसी को बहुत करीब से महसूस होने का एहसास दिलाता है। वाराणसी का एक परिवार, जो जेवलिन थ्रो में देश दुनिया में वाराणसी और भारत का नाम रोशन कर रहा है। दरअसल, यह शुरुआत पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन जगमोहन सिंह (Jagmohan Singh) के साथ-साथ रामाश्रय सिंह (Ramasaray) और शिवपूजन सिंह (Shivpujan Singh) के साथ हुई। अब वहीं, इस परिवार के सदस्य शिवपाल सिंह (Shivpal Singh) जेवलिन थ्रो में ओलंपिक में हिस्सा लेने जा रहे हैं।

जेवलिन थ्रोअर (javelin thrower ) शिवपाल सिंह ने मार्च में टोक्यो 2020 में अपनी जगह सुनिश्चित कर ली है। शिवपाल जानते हैं कि वह ओलंपिक में न केवल खुद के लिए बल्कि भाला फेंक खिलाड़ियों की एक नई पीढ़ी के लिए खेलेंगे। शिवपाल सिंह ने अपने ओलंपिक क्वालिफिकेशन को लेकर कहा, "यह सब एक सपने जैसा है। ऐसा लग रहा था कि हर कोई जानता था कि मैं ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करूंगा। कभी कोई संदेह नहीं था। घर के सभी लोग जानते थे कि ओलंपिक क्वालिफाई करने में मुझे कोई मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ेगा।"

अपने पिता और चाचा से सीखा यह खेल

शिवपाल एक ऐसे परिवार से आते हैं, जहां हर दूसरा आदमी भाला फेंकने में माहिर था। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि शिवपाल सिंह भी इस खेल को जल्दी से सीख गए। वहीं, इस 24 वर्षीय एथलीट शिवपाल सिंह ने ओलंपिक चैनल से बातचीत में कहा, "मेरे दादा जी भाला फेंकते थे, मेरे चाचा जगमोहन पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन रह चुके हैं और मेरे पिताजी (रामाश्रय) और चाचा (शिवपूजन) भी एक बेहतरीन थ्रोअर थे।"

उन्होंने अपने परिवार के और सदस्यों के बारे में ज़िक्र करते हुए कहा, "मेरा छोटा भाई नंदकिशोर सिंह भी एक जेवलिन थ्रोअर हैं। वह इस समय नेशनल कैंप में हैं और इस महीने इंडियन नेवी में शामिल होंगे और इसके साथ ही मेरे दो चचेरे भाई इटावा में प्रशिक्षण ले रहें हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता कि यह खेल मेरे लिए अलग है।"

शिवपाल ने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए कहा, "मैं बचपन में काफी मोटा था और मेरा वजन बहुत ज़्यादा था। मुझे लगता है कि मैं 12-13 साल के आसपास था,  जब मेरे माता-पिता ने मुझे नई दिल्ली में चाचा के पास भेजने का फैसला किया ताकि मैं फिट रहूं। जेवलिन मेरा कभी लक्ष्य नहीं था।" वहीं, शिवपाल ने लगभग छह साल तक अपने चाचा के साथ प्रशिक्षण लिया।  दरअसल, चाचा जगमोहन नेवी में अधिकारी थे। जगमोहन युवाओं के लिए काफ़ी सख़्त अधिकारी थे, यही वजह है कि उन्हें सभी 'क्रूर' बताते थे।

शिवपाल ने मुस्कराते हुए अपने चाचा के साथ बिताए हुए दिनों के बारे में कहा, "मुझे लगता है, मेरे पास अभी उनके छड़ी (स्पाइक्स) के निशान हैं।" उन्होंने आगे कहा, "मुझे अभी भी पालम (दक्षिण पश्चिम दिल्ली में एक प्रमुख उपनगर और आवासीय कॉलोनी) में प्रशिक्षण याद है। सभी जानते हैं कि दिल्ली की सर्दियां कितनी मुश्किल भरी होती हैं। अब इसमें आप प्रशिक्षण की कल्पना करें। आपके पास 2-3 लेयर वाले लोग होंगे जो खुद को सुरक्षित कर रहे होंगे, जबकि मैं यहां पसीना बहा रहा था। यह उस समय बहुत बुरा महसूस होता था, लेकिन जब मैं अब अपने आपको वापस मुड़कर देखता हूं तो मुझे लगता है कि शिवपाल सिंह गलत नहीं हैं क्योंकि उन दिनों की कड़ी मेहनत और ट्रेनिंग ने मुझे एक एथलीट बना दिया, जो आज मैं यहां हूं।"

शिवपाल ने लगातार ऊंचाईयां हासिल

शिवपाल सिंह ने खुद को इस खेल में एक बेहतरीन एथलीट के तौर पर स्थापित किया और वह लगातार ऊंचाईयों को छूते चले गए। लेकिन कोहनी की चोट की वजह से उनको थोड़ा ठहरना पड़ा। शिवपाल सिर्फ 2019 तक ही नहीं, बल्कि देश के एक बेहतरीन एथलीट के तौर पर उन्होंने अपने आपको स्थापित किया। पिछले साल इस भारतीय ने एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप (Asian Athletics Championships) में 86.23 मीटर के थ्रो के साथ रजत पदक जीता था। 2019 वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप (World Athletics Championships) में सर्वश्रेष्ठ एथलीट के खिलाफ प्रतिस्पर्धा की और फिर दक्षिण एशियाई खेलों में एक और रजत पदक अपने नाम किया। हालांकि इस बार इनका थ्रो 84.16 मीटर का था।    

शिवपाल सिंह ने नेपाल के काठमांडू में हुए भारत और पाकिस्तान के मुकाबले का ज़िक्र करते हुए कहा, "मैं इस प्रतियोगिता में अपनी भावनाओं में बह गया था,  इस दौरान मैंने अपनी प्रतियोगिता को समाप्त करने का फैसला किया था, मुझे घुटने में चोट भी लग गई थी, लेकिन जब मैंने अरशद (पाकिस्तान के नदीम) को मुझसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए देखा तो मैं फिर से जाने के लिए उत्सुक हुआ। मुझे ऐसा लगता है कि यह एक गलती थी।"

हालांकि इसके बाद शिवपाल ने ज़िंदगी में बड़े सपने को देखना कम नहीं किया। शिवपाल को विश्वास है कि 90 मीटर उनके लिए ज्यादा दूर नहीं है। उन्होंने कहा, "मैं पोचेफ्सट्रूम मीट (Potchefstroom meet) में आसानी से 90 मीटर को क्रॉस कर सकता था। लेकिन भाला फेंकते समय मेरे हाथ से छूट गया और ब्लॉक में लगा नहीं। वैसे भी मेरे अभी भी फेडरेशन कप है।" फिलहाल एथलेटिक्स मीट अगले महीने होने वाली है।

फेडरेशन कप में शिवपाल और नीरज होंगे आमने-सामने

वहीं, अब फेडरेशन कप में शिवपाल और स्वर्ण पदक नीरज चोपड़ा के साथ भिड़ते हुए नज़र आएंगे। दरअसल, नीरज चोपड़ा ने 2016 के वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप के अंडर-20 में जूनियर विश्व रिकॉर्ड को तोड़ा है तब से यह 22 वर्षीय एथलीट चोपड़ा एक बेहतरीन थ्रोअर के तौर पर सामने आया है।  

नीरज चोपड़ा ने हमेशा ही अपने भाले से बेहतरीन प्रदर्शन किया है। चाहे एशियाई खिताब हो या राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक हासिल करना हो। नीरज भारतीय सेना में नायब सूबेदार भी हैं, उन्होंने न केवल खुद के लिए, बल्कि भारत में भाला के खेल के लिए एक मिसाल पैदा की है।

लेकिन इस सफलता के बावजूद नीरज चोपड़ा ने शीर्ष पर जाने के लिए हमेशा कड़ी मेहनत की। वहीं, शिवपाल इस पर ध्यान देने में कभी नहीं हिचकिचाए। शिवपाल का मानना है कि वास्तव में नीरज चोपड़ा ने उन्हें थ्रोअर के रूप में बेहतर बनाने में मदद की है।

उन्होंने कहा, "यह बहुत अच्छा है! जब नीरज आसपास होता है तो मजा करता हूं। पहले, आपके पास किसी के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करने के लिए हो सकता है और फिर यह काफी मजेदार है। आपको जेवलिन के बारे में बोलने के लिए बहुत कुछ मिलता है। जहां हम अपनी तकनीक पर चर्चा करते हैं कि खुद को और कैसे बेहतर करें। मैंने हमेशा उसके आसपास रहने का आनंद लिया है। वह एक बेहतरीन लड़का है और हम एक-दूसरे का भरपूर समर्थन करते हैं।" 

हर समय कुछ नया सीखने की भूख और आगे बढ़ने की ललक के साथ शिवपाल ने भारतीय सर्किट (Indian circuit) में भाला फेंक प्रतियोगिता में हिस्सा लिया है। लेकिन क्या वह एक बेहतरीन एथलीट के तौर पर बेहतरीन चुनौती दे सकते हैं?