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फोगाट बहनों से लेकर साक्षी मलिक तक: जानिए भारत में महिला कुश्ती के उत्थान की दास्तां

इस सूची में एक ही परिवार के तीन सदस्य और एक ओलंपिक पदक विजेता के साथ ही एक उभरती हुई रेसलर भी शामिल है। 

लेखक रितेश जायसवाल ·

एक खेल के तौर पर कुश्ती का भारत में समृद्ध इतिहास रहा है। उत्तर भारत के हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के अखाड़े कई दशकों तक देश के सर्वश्रेष्ठ पहलवानों को तैयार करने के लिए काफी प्रसिद्ध रहे हैं।

हालांकि, इन सबके बावजूद केडी जाधव (KD Jadhav) ने हेलसिंकी 1952 में कुश्ती में पहला पदक जीता था, लेकिन इस खेल के बारे में चर्चा तब बढ़ी जब सुशील कुमार (Sushil Kumar) ने बीजिंग 2008 में कांस्य पदक जीतकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। फिर भी कुश्ती का खेल हमेशा पुरुषों पर ही केंद्रित रहा।

लेकिन बीते एक दशक में भारत में महिलाओं की कुश्ती में भी काफी सुधार देखा गया है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की महिला पहलवानों का प्रदर्शन बेहद शानदार रहा है और इसी की वजह से उन्हें भारत में इस खेल के सितारों के रूप में स्थापित करने में मदद की है।

यहां हम भारत की कुछ सर्वश्रेष्ठ महिला पहलवानों पर एक नज़र डालने के साथ ही उनके उत्थान की दास्तां बताने का प्रयास कर रहे हैं:

गीता फोगाट और बबीता फोगाट

भले ही भारत की सबसे ज्यादा पसंदीदा कुश्ती लड़ने वाली बहनों को बॉलीवुड की बायोपिक ‘दंगल’ के बाद प्रसिद्धि मिली, लेकिन उन्होंने अपने शानदार और दमदार प्रदर्शनों के दम पर पहले ही अंतरराष्ट्रीय ख्याति हासिल कर ली थी।

एक साल के अंतर पर जन्मी गीता फोगाट (Geeta Phogat) और बबीता फोगाट (Babita Phogat) के लिए कुश्ती उनके खून में ही थी। दंगल में बॉलीवुड सुपरस्टार आमिर खान (Aamir Khan) ने उनके पिता और राज्य स्तर के चैंपियन महावीर फोगाट (Mahavir Phogat) का किरदार निभाया था। कुछ मुश्किलों की वजह से महावीर बहुत आगे नहीं बढ़ सके।

महावीर ने अपनी दो बेटियों को कुश्ती के लिए प्रेरित किया और उनके खून में दौड़ता यह खेल कड़े प्रशिक्षण के साथ मिलकर बेहद उम्दा हो गया, जिसने उन्हें दिग्गज महिला पहलवानों के तौर पर स्थापित किया।

गीता फोगट और बबीता फोगट ने 2009 के राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय पदक जीता। गीता ने 55 किग्रा और बबीता ने 51 किग्रा में स्वर्ण पदक जीता।

इसके बाद 2010 में गीता फोगाट ने कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीतने वाली पहली महिला भारतीय पहलवान बनकर इतिहास रच दिया, जबकि बबीता फोगाट ने रजत जीतकर अपनी बहन का साथ दिया।

भारत में महिलाओं की कुश्ती में गीता और बबीता फोगाट का नाम सबसे आगे रहा है।

गीता फोगाट ने लंदन 2012 में ओलंपिक खेलों में अपना डेब्यू किया और ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली महिला भारतीय पहलवान बनने से चूक गईं, क्योंकि वह तेत्याना लज़ारेवा (Tetyana Lazareva) के खिलाफ रेपचेज बाउट में हार गईं।

हालांकि, इस वर्ष उन्होंने अन्य कई सफलताएं हासिल की। गीता ने 2012 में कनाडा के स्ट्रैथकोना काउंटी में महिला कुश्ती विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक के तौर पर अपना पहला विश्व चैंपियनशिप पदक जीता। इस प्रतियोगिता में बबीता फोगाट ने भी कांस्य पदक जीता।

बबीता फोगाट ने 2014 में अपना पहला राष्ट्रमंडल खेल स्वर्ण पदक जीता और रियो 2016 में अपना ओलंपिक डेब्यू किया, जहां वह पहले ही राउंड में हार गईं।

बड़ी बहन गीता फोगाट को शादी के बाद पिछले साल दिसंबर में मॉं बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिसकी वजह से वह बीते कुछ वर्षों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर रही हैं। लेकिन उन्होंने मैट पर वापसी की इच्छा जरूर जाहिर की और टोक्यो ओलंपिक से एक साल पहले उन्होंने ओलंपिक खेलों में अपनी एक और उपस्थिति दर्ज कराने की उम्मीद बढ़ा दी है।

बबीता फोगाट के लिए भी स्थिति कुछ ऐसी ही है, उन्होंने कुछ साल पहले राजनीति में कदम रखा था। उनका आखिरी अंतरराष्ट्रीय पदक 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में रजत था और वह भी अपनी बहन के साथ टोक्यो ओलंपिक के लिए कट हासिल करने की उम्मीद कर रही हैं।

साक्षी मलिक

ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली महिला भारतीय पहलवान साक्षी मलिक एक ऐसा नाम है जिसे कोई भी भारतीय प्रशंसक आसानी से नहीं भूल पाएगा।

12 वर्ष की उम्र में प्रशिक्षण शुरू करने के बाद साक्षी मलिक जूनियर श्रेणियों में लगातार पदक विजेता बनी रहीं और 2013 के कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने वरिष्ठ स्तर पर अच्छा प्रदर्शन किया।

साक्षी मलिक ने 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों और 2015 के एशियाई चैंपियनशिप में रजत पदक के साथ यह विजयरथ जारी रखा, लेकिन 58 किग्रा वर्ग में भागीदारी की वजह से वह लगभग हमेशा ही हमवतन दिग्गज पहलवान गीता फोगाट की देखरेख में रहीं।

हालांकि, रियो 2016 में यह सबकुछ बदल गया। गीता फोगाट के स्थान पर विश्व ओलंपिक क्वालीफायर में सुर्खियों में रहने के बाद साक्षी मलिक ने शानदार ढंग से ओलंपिक में अपना डेब्यू सुनिश्चित किया।

साक्षी मलिक: ओलंपिक जीत की यादों को कर रहीं ताज़ा

रियो 2016 में साक्षी मलिक अपनी लाजवाब वापसी के साथ किए गए बेहतरीन प्रदर्शन ...

पहले दो राउंड में ज्यादा बेहतर न कर पाने की वजह से साक्षी मलिक अंततः रूस की वेलेरिया कोब्लोवा से हार गईं, लेकिन रेपचेज राउंड के जरिए उन्हें दूसरा मौका मिला।

आइज़ुलु टाइनबेकोवा (Aisuluu Tynybekova) के खिलाफ शुरुआती बढ़त हासिल करना बहुत आदर्श प्रदर्शन नहीं था, लेकिन साक्षी मलिक ने मेडल बाउट के दौरान कुछ बेहतरीन दांव-पेंच लगाए और आखिरकार इतिहास रच दिया

इसने साक्षी को भारत में एक बड़ा स्टार बना दिया और इस जीत की वजह से वह गीता फोगाट की छाया से उभरने में कामयाब रहीं।

इस अविश्वसनीय उपलब्धि के बाद साक्षी मलिक के लिए आगे की राह बहुत आसान नहीं रही है, लेकिन वह अभी भी टोक्यो ओलंपिक के लिए भारतीय पहलवानों के दल में शामिल होने की उम्मीद कर रही हैं।

विनेश फोगाट

जैसा कि हमने पहले ही बताया है कि फोगाट परिवार के खून में ही कुश्ती दौड़ती है। यह तथ्य तब और भी स्पष्ट हो गया जब पिछले दशक के अंत में उनके परिवार का एक तीसरा सदस्य सुपरस्टार के रूप में उभरा।

गीता और बबीता की चचेरी बहन विनेश फोगाट वर्तमान में भारत की प्रमुख महिला पहलवानों में से एक हैं।

अपनी चचेरी बहनों की तुलना में पांच साल छोटी विनेश फोगाट के करियर की शुरुआत भी उनके जैसी ही थी। वह हरियाणा के अखाड़ों में कुश्ती खेलती थीं और उनके पिता और चाचा उसके कोच थे।

विनेश ने 2013 में नई दिल्ली में हुई एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता और 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में 48 किग्रा वर्ग में स्वर्ण हासिल करके खुद को महिला रेसलिंग का अगला बड़ा स्टार घोषित किया। उन्होंने उस वर्ष के अंत में एशियाई खेलों में कांस्य पदक भी जीता।

पदक के लिए लगभग हर टूर्नामेंट में उन्होंने भाग लिया, जिसके बाद विनेश फोगाट ने रियो 2016 में अपना ओलंपिक पदार्पण किया। वह उस समय पदक जीतने के लिए पसंदीदा पहलवानों में से एक थी, लेकिन क्वार्टर फाइनल में घुटने की चोट लगने की वजह लोगों का यह सपना टूट गया।

टोक्यो ओलंपिक में विनेश फोगाट पदक की सबसे बड़ी उम्मीदवार थीं।

हालांकि, विनेश ने 2017 और 2018 में एशियाई चैंपियनशिप में लगातार सिल्वर जीतकर खुद के हुनर को फिर से साबित किया।

साल 2018 विनेश के लिए सबसे सफल साबित हुआ, जहां भारतीय पहलवान ने अपने राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक का बचाव किया और एशियाई खेलों में अपना पहला स्वर्ण पदक जीता।

2019 में विनेश फोगाट ने कजाकिस्तान के नूर-सुल्तान में अपना पहला विश्व चैंपियनशिप पदक – कांस्य जीता और इसी के साथ टोक्यो ओलंपिक में एक कोटा स्थान हासिल कर लिया।

उनके प्रयासों को देखते हुए इस वर्ष उन्हें देश के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया गया, हालांकि विनेश COVID-19 टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने की वजह से समारोह में शामिल नहीं हो सकीं।

अब विनेश फोगाट जल्द ही मैट पर वापसी करने की उम्मीद करेंगी और अगले साल टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने की कोशिश करेंगी।

अल्का तोमर

यह नाम शायद कई लोगों के लिए अनसुना और अपरिचित हो सकता है, लेकिन अल्का तोमर (Alka Tomar) ने भारत में महिलाओं की कुश्ती के फलने-फूलने की नींव रखी। वह भी उस समय जब सुविधाएं बहुत अनुकूल नहीं थीं और भारत में महिलाओं की कुश्ती बहुत प्रचलित नहीं हुई थी। अल्का तोमर ने शुरुआती वर्षों में चुपचाप अपना काम करना जारी रखा और एशियाई और राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप में लगातार पदक जीते।

हालांकि, अल्का का सबसे यादगार पल विश्व चैंपियनशिप में आया।

2006 की विश्व महिला कुश्ती चैंपियनशिप में 20 वर्षीय अल्का तोमर ने अपने 59 किलोग्राम के कांस्य के साथ इतिहास रच दिया, जिससे वह विश्व चैंपियनशिप पदक जीतने वाली पहली महिला भारतीय पहलवान बन गईं।

वास्तव में यह 39 साल में किसी भारतीय पहलवान, पुरुष या महिला के द्वारा जीता गया पहला विश्व चैंपियनशिप पदक था।

अल्का तोमर (बाएं से तीसरी) ने दोहा में 2006 के एशियाई खेलों में कांस्य जीता।

उस वर्ष बाद में अल्का तोमर ने दोहा में अपने पहले एशियाई खेलों में भी पदक जीता और यह भी कांस्य पदक रहा।

भले ही गीता फोगाट 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण जीतने वाली पहली महिला भारतीय पहलवान बन गईं, लेकिन अल्का तोमर ने अपने आप में एक स्वर्ण पदक के जैसा ही प्रदर्शन किया था।

अल्का ने 2011 कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में अपने स्वर्ण के बाद कुश्ती से संन्यास ले लिया और उसके बाद वह कुश्ती कोच बन गईं।