एक्सक्लूसिव: 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में मिली हार ने मेरी ज़िंदगी को बदल दिया – लवलीना बोरगोहेन

भारत की ये 22 वर्षीय महिला मुक्केबाज़ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पिछले दो सालों से कमाल का प्रदर्शन कर रही हैं, टोक्यो 2020 में 69 किग्रा भारवर्ग में लवलीना भारत की बड़ी उम्मीद हैं

नए युग की भारतीय महिला मुक्केबाज़ों में लवलीना बोरगोहेन (Lovlina Borgohain) पिछले दो सालों से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करती आ रही हैं।

2017 एशियन चैंपियनशिप में अपना पहला कांस्य पदक जीतने के बाद लवलीना बोरगोहेन ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार उनका ग्राफ़ ऊपर की ओर ही बढ़ता गया है। इसके बाद उन्होंने 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में जगह बनाई और फिर अपने पहले ही वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक भी अपने नाम किया।

इतना ही नहीं इस असम की मुक्केबाज़ ने इसके बाद रूस के उलान-उड़े में हुई 2019 वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी कांस्य पदक जीता। लवलीना ने राष्ट्रीय ट्रायल में 69 किग्रा भारवर्ग में शानदार जीत के साथ बॉक्सिंग फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (BFI) को मजबूर कर दिया कि उन्हें एशियन ओलंपिक क्वालिफ़ायर्स में भेजा जाए।

जॉर्डन के अम्मान में खेले गए एशियन क्वालिफ़ायर्स में लवलीना ने अपने चयन को सार्थक साबित किया और उन्होंने टोक्यो ओलंपिक का टिकट हासिल कर लिया।

ओलंपिक चैनल के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में असम की इस महिला ने कहा, ‘’मुझे लगता है अब तक का मेरा सफ़र अच्छा रहा है। मैंने ख़राब तो नहीं खेला है लेकिन अपना सर्वश्रेष्ठ भी नहीं दे पाई हूं।‘’

‘’मैं जानती हूं कि लगातार दो वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतना बेहतरीन है, लेकिन मेरा लक्ष्य है अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतना। मैंने महसूस किया है कि इसके लिए मुझे और कड़ी मेहनत करनी है।‘’

लवलीना ने हाल के दिनों में अपने बेहतरीन प्रदर्शन से एक बार फिर महिला मुक्केबाज़ी में एक प्रेरणा की तरह सामने आईं हैं। ठीक उसी तरह जैसे 2012 लंदन में एमसी मैरी कॉम (MC Mary Kom) के पदक जीतने के बाद भारतीय महिला मुक्केबाज़ी की तस्वीर ही बदल दी थी। मैरी कॉम के साथ साथ लवलीना ने भारतीय मुक्केबाज़ी संघ की भी तारीफ़ की और कहा कि उनके समर्थन के बग़ैर ये क़ामयाबी संभव नहीं थी।

‘’फ़ेडरेशन की भूमिका इसमें बेहद अहम रही है। पूरी टीम को इसका श्रेय जाता है फिर चाहें वे विदेशी कोच हों, डॉक्टर हों, मसाज करने वाले हों या फिर सपोर्ट स्टाफ़ हों, सभी के सभी एक लक्ष्य को पूरा करने के इरादे से मेहनत कर रहे हैं।‘’

हार से सीखा सबक़

22 वर्षीय इस मुक्केबाज़ ने 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी जगह बनाई थी, क्योंकि उससे पहले उन्होंने इंडिया ओपन में स्वर्ण पदक जीतकर BFI को प्रभावित कर दिया था।

लेकिन कॉमनवेल्थ गेम्स में लवलीना का सफ़र क्वार्टरफ़ाइनल में ही थम गया था, जब ब्रिटिश मुक्केबाज़ सैंडी रेयान (Sandy Reyan) के हाथों उन्हें हार मिली थी। आगे चलकर सैंडी ने अपने सभी मुक़ाबले जीतते हुए स्वर्ण पदक भी जीता था। लवलीना मानती हैं कि इसी हार ने उन्हें एक नई सीख दी और फिर उनकी ज़िंदगी बदल गई।

‘’मैंने बहुत अच्छी तैयारी की थी फिर चाहे वह तकनीक हो या फ़िटनेस। लेकिन जब मुझे हार मिली तो ये एक बड़ा झटका था। उसी के बाद मैंने ये महसूस किया कि सिर्फ़ शारीरिक तौर पर मज़बूत ही होना काफ़ी नहीं है, बड़ी प्रतियोगिता में मानसिक तौर पर भी मज़बूत होना पड़ता है। जिसके बाद इस खेल के मनोवैज्ञानिक पहलू को भी मैंने समझा।‘’

‘’मैंने मानसिक तौर पर मज़बूत होने के लिए मेडिटेशन का सहारा लिया, इससे बाउट के दौरान मुझे एकाग्रता बनाने में भी मदद मिली। और फिर मैं बेहतर प्रदर्शन करने लगी।‘’

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टोक्यो का टिकट

इसी साल जॉर्डन के अम्मान में हुए एशियन बॉक्सिंग क्वालिफ़ायर्स में लवलीना ने अपना नाम उन 9 भारतीय मुक्केबाज़ों की फ़ेहरिस्त में दर्ज करा लिया, जिन्हें ओलंपिक का टिकट हासिल हुआ है।

भारतीय मुक्केबाज़ ने इस चैंपियनशिप के क्वार्टरफ़ाइनल में उज़बेकिस्तान की मफ़्तूनाख़ोन मेलीवा (Maftunakhon Melieva) को शिकस्त देकर टोक्यो 2020 के लिए क्वालिफ़ाई किया था।

हालांकि इसके बाद सेमीफ़ाइनल में उन्हें चीन की गू होंग (Gu Hong) के हाथों हार मिली थी, और उन्होंने जॉर्डन में कांस्य पदक के साथ अपना सफ़र सकारात्मक तरीक़े से ख़त्म किया।

‘’मेरी प्राथमिकता टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करना था। और जब मैंने ये हासिल कर लिया था तो शायद मेरा ध्यान भटक गया था, और सेमीफ़ाइनल में मेरी हार की वजह यही हो गई। ये पहली बार था कि मेरा सामना होंग से हो रहा था, लिहाज़ा उनके ख़िलाफ़ किस रणनीति के साथ उतरा जाए, ये भी नहीं जानती थी।‘’

अब जब एक साल के लिए टोक्यो ओलंपिक टल गया है तो लवलीना को अच्छे से तैयारी का मौक़ा भी मिल गया है। वह इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए ख़ुद को फ़िट भी रख रही हैं और साथ ही साथ वीडियो देखते हुए वह अपने और प्रतिद्वंदियों की ताक़त और कमज़ोरियों का भी विश्लेषण कर रही हैं।

‘’मैंने अपने लिए काफ़ी सख़्त और अनुशासित रूटीन बना रखी है। इस लॉकडाउन के दौरान मैं लगातार यही करती आ रही हूं। टोक्यो ओलंपिक के दौरान भी मेरा लक्ष्य है कि मैं बिना दबाव के रिंग में उतरूं और अपना 100 फ़ीसदी दूं, बाक़ी तो ऊपर वाले के हाथ में है।‘’

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