अपने हीरो विजेंदर सिंह की बराबरी करना चाहते हैं मनीष कौशिक

24 वर्षीय इस मुक्केबाज़ ने भले ही ओलंपिक टिकट हासिल करने के लिए थोड़ा लम्बा सफर तय किया है, लेकिन अब वह विजेंदर सिंह की तरह ओलंपिक खेलों में पोडियम स्थान प्राप्त करने की चाहत रखते हैं।

विजेंदर सिंह (Vijender Singh) ने अगस्त 2008 में भिवानी से बीजिंग तक तय किए गए अपने सफर को यादगार बना दिया, जहां वह ऐतिहासिक कांस्य पदक जीतकर ओलंपिक खेलों में पोडियम स्थान हासिल करने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज़ बने। बीजिंग से लगभग 4,000 किमी दूर हरियाणा के उसी छोटे से गांव में 12 वर्षीय मनीष कौशिक (Manish Kaushik), जो उनको यह उपलब्धि हासिल करते हुए देख रहा था, उसके लिए विजेंदर एक हीरो बन गए। उसके बाद से कौशिक अपने आदर्श और हीरो विजेंदर सिंह के कदमों पर चलते हुए उन्हीं की तरह कीर्तिमान रचने के सफर पर चल पड़े। आखिरकार 12 साल बाद उन्हें यह अवसर मिल गया है।

ओलंपिक चैनल से हुई खास बातचीत में उन्होंने कहा, “मैंने 2008 में विजेंदर सिंह को बीजिंग में कांस्य पदक जीतते हुए देखा था। वह भी भिवानी से हैं, इसलिए वह मेरी नज़र में उसी वक्त हीरो बन गए। अभी मेरे लिए ओलंपिक पदक जीतना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गया है।”

जॉर्डन के अम्मान में हुए एशियाई मुक्केबाजी ओलंपिक क्वालिफायर में मनीष कौशिक टोक्यो ओलंपिक के लिए टिकट हासिल करने वाले 9वें मुक्केबाज़ बने। हालांकि, वह टूर्नामेंट में सीधे क्वालिफाई करने में असफल रहे। उन्होंने बॉक्स-ऑफ के जरिए देश के लिए नौवां ओलंपिक टिकट हासिल किया।

मनीष कौशिक ने 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर और 2019 वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता।
मनीष कौशिक ने 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर और 2019 वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता।मनीष कौशिक ने 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर और 2019 वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता।

मनीष कौशिक का मुक्केबाज़ी में शानदार सफर

24 वर्षीय भारतीय मुक्केबाज़ को अभी सीनियर लेवल पर केवल चार साल ही हुए हैं और उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। 2016 में उन्होंने पूर्व ओलंपियन शिवा थापा को हराकर सीनियर नेशनल का खिताब अपने नाम किया था।

दो साल बाद मनीष कौशिक एक बार फिर अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर गोल्ड कोस्ट में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में अपनी जगह बनाने में सफल रहे। शिव थापा (Shiva Thapa) जैसे दिग्गज को एक बार हराना भले ही सौभाग्य की बात हो सकती है, लेकिन दूसरी बार हराना बहुत मायने रखता है। मनीष कौशिक इस जीत का श्रेय अपने गुरुओं को देते हैं।

उन्होंने बताया, "भारतीय सेना में मेरे कोच बहुत अच्छे थे, जिन्होंने शिवा थापा के खेल का विश्लेषण किया और मुझे बताया कि कैसे उन्हें हराया जा सकता है।" भिवानी का यह युवा मुक्केबाज़ गोल्ड कोस्ट से अपने गले में सिल्वर मेडल लेकर लौटा, जो उनकी काबिलियत को दर्शाता है।

उनका आत्मविश्वास इस टूर्नामेंट के बाद आसमान छू रहा था। उन्होंने पिछले साल येकातेरिन्बर्ग में विश्व चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन किया और लाइटवेट वर्ग में कांस्य पदक जीता। अम्मान में मनीष कौशिक क्वार्टर फाइनल में चिंज़ोरिग बातरसुख से हार गए। लेकिन उनके पास बॉक्स-ऑफ में हैरी गारसाइड को हराकर टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने का एक और मौका था।

भारतीय मुक्केबाज़ मनीष कौशिक कॉमनवेल्थ गेम्स के फाइनल में इसी ऑस्ट्रेलियाई मुक्केबाज़ से हार गए थे, लेकिन इस बार उन्होंने बेहतर प्रदर्शन करते हुए जीत को अपने हक में कर लिया।

उन्होंने कहा, “एशियाई क्वालिफायर से कुछ महीने पहले ऑस्ट्रेलियाई एक शिविर के लिए भारत आए थे और मैंने तब हैरी गारसाइड के साथ मुकाबला किया था। इसने मुझे अच्छा अनुभव दिया और मैंने उसे टोक्यो ओलंपिक क्वालिफायर में इस्तेमाल करते हुए गारसाइड को हराने में सफलता हासिल की।

ओलंपिक खेलों के स्थगन से कोई परेशानी नहीं

COVID-19 महामारी ने अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) को टोक्यो ओलंपिक खेलों को एक साल तक के लिए स्थगित करने पर मजबूर कर दिया। मनीष कौशिक का मानना है कि यह स्थगन महज कुछ लोगों की योजनाओं को ही प्रभावित कर सकता है।

उन्होंने कहा, "यह वही है, जो यह है। आप इस स्थिति के बारे में बहुत कुछ नहीं कर सकते हैं, इसलिए मैं इसे ओलंपिक खेलों के लिए खुद को बेहतर रूप से तैयार करने के एक मौके के रूप में देख रहा हूं।"

यह भारतीय मुक्केबाज़ फिलहाल अपने घर पर कुछ बुनियादी अभ्यास कर रहा है और समय-समय पर अन्य मुक्केबाज़ों के साथ फिट रहने के लिए बॉक्सिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (बीएफआई) के ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्रों में भी भाग ले रहे हैं।

हालांकि, वह राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में जल्द से जल्द वापसी करने की उम्मीद कर रहे हैं, जिसे लॉकडाउन की वजह से स्थगित करना पड़ा। विजेंदर सिंह ने अपने गांव भिवानी को गौरवान्वित किया है और मनीष कौशिक के दृढ़ संकल्प की बदौलत आज वह भी इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। वह करीब एक दशक बाद उस विरासत को फिर से आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

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