इतिहास रचते हुए सतीश कुमार ने बढ़ाया देश का मान

इस सुपर हेविवेट मुक्केबाज़ ने इतिहास रचने से पहले रिंग में काफी चुनौतियों का सामना किया था।

जब सतीश कुमार (Satish Kumar) 19 साल के थे, तब तक उन्होंने मुक्केबाज़ी के बारे में नहीं सुना था।

लेकिन एक दशक बाद वो 91 किलोग्राम भार वर्ग में ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज़ बन गए।

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर शहर के रहने वाले सतीश कुमार हमेशा से ही देश की सेवा करना चाहते थे।

सतीश उस परिवार से आते हैं जहां उनके पिता एक किसान हैं और उनके चार भाई हैं, उनके बड़े भाई सेना में है, अपने बड़े भाई के नक्शेकदम पर चलकर ही सतीश कुमार सेना में जाना चाहते थे।

इसलिए वो साल 2008 में इंडियन आर्मी में शामिल हो गए, एक सिपाही के रूप में वो 300 किमी का यात्रा कर रानीखेत के छावनी में चले गए। 

बॉक्सिंग में करियर के लिए देर से लेकिन ठोस शुरुआत

एक सीमा पर तैनात, 6’2 ” (6 फ़िट 2 इंच) लंबे सतीश कुमार एक बॉक्सिंग कैंप के लिए वहां मौजूद थे, जिन्होंने उनसे खेल में अपना हाथ आजमाने का आग्रह किया।

सतीश कुमार सुपर हेविवेट श्रेणी में ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज़ हैं
सतीश कुमार सुपर हेविवेट श्रेणी में ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज़ हैंसतीश कुमार सुपर हेविवेट श्रेणी में ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज़ हैं

उन्होंने स्क्रॉल.इन के साथ एक इंटरव्यू में कहा था कि, “एक कोच ने मुझे वहां देखा और कहा, वाह, आप शारीरिक रुप से मजबूत हो। आप इसमें हाथ क्यों नहीं आजमाते? '' 

जिसके बाद उन्होंने अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया। 

सेना में रहते हुए सतीश कुमार ने अपने करियर के लिए सही फैसला लिया। 

एक और दो साल बाद उन्होंने चेन्नई में सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में अपना पहला पदक जीता, और अपने जीवन के लिए एक नए रास्तों को तैयार किया।

अपने 20वें साल की शुरुआत में उन्होंने रिंग में अपना करियर शुरू किया। सतीश कुमार ने उस उम्र में मुक्केबाज़ी की दुनिया में प्रवेश किया, जब उनके अधिकांश प्रतिद्वंदी पहले ही कई सालों के अनुभव के साथ अच्छी तरह से मुक्केबाज़ी की दुनिया में खुद को स्थापित कर चुके थे। इसके बावजूद उन्होंने कम समय में खुद को सुपर हेविवेट श्रेणी में स्थापित किया। 

‘ज़िंदगी में कुछ चीजें अच्छे के लिए होती हैं’

लेकिन अपने देश के मुक्केबाज़ों के खिलाफ रिंग में उनकी सफलता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता नहीं दिलाई।

चाहे वो विरोधियों में उनके सामने हार मानने वाला व्यवहार हो या फिर बदकिस्मती, अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में सफलता हासिल करने में समय लगा।

2013 विश्व चैंपियनशिप का क्वार्टर फाइनल एक ऐसा अवसर था जब प्री-क्वार्टर फ़ाइनल मुकाबले में दाहिनी आंख के ऊपर कट के कारण उन्हें रजत पदक विजेता से लड़ने के लिए अनफिट ’घोषित कर दिया गया था।

भारत के 2014 राष्ट्रमंडल खेलों के मुक्केबाज़ी दल से बाहर होना सतीश कुमार के लिए किसी बुरे सपने जैसा था, लेकिन 2014 के एशियाई खेलों और 2015 के एशियाई मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप में लगातार कांस्य पदक हासिल कर उन्होंने ये साबित कर दिया कि उनमें कितनी क्षमता है।

हालांकि रियो 2016 से ठीक पहले लगी उनकी गहरी चोट ने उन्हें ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए रिंग में उतरने से रोक दिया था।

सतीश कुमार ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि, “वो आयरलैंड के खिलाफ क्वार्टर फाइनल मुकाबला था और मैंने पहला राउंड काफी आराम से जीत लिया। लेकिन दूसरे राउंड में लगभग 10 सेकंड शेष रहने पर, मुझे अपनी भौंहों पर एक बुरा कट लगा, जिसके बाद मुझे तीसरे राउंड को खत्म करने के लिए मजबूर होना पड़ा। वो बहुत दर्दनाक था।”

ये सतीश कुमार के जीवन की एक और बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन उनके आगे बढ़ते रहने की इच्छा का ही शायद कारण है कि उन्होंने ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर इतिहास रच दिया।

सतीश कुमार ने कहा कि, "जीवन में कुछ चीजें अच्छे के लिए होती हैं।"

सतीश कुमार के करियर का सबसे बेहतरीन साल

सतीश कुमार रियो 2016 की असफलता के बाद निराश हुए और पहले से अधिक शारीरिक और भावनात्मक रूप से मजबूत होने के लिए ट्रेनिंग शुरू कर दी।

अगर रियो में निराशा के कारण 2016 उनके मुक्केबाज़ी करियर का असफल साल रहा, तो वहीं अगले तीन साल बुलंदशहर के मुक्केबाज़ के लिए काफी आशाओं से भरे रहे।

उन्होंने अगले साल 2018 की शुरूआत में अपने पहले इंडियन ओपन और कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक हासिल करने से पहले चेक गणराज्य में ग्रां प्री उस्तीनद लाबेम में स्वर्ण के साथ अपनी वापसी को यादगार बनाया।

2018 में अर्जुन अवार्ड हासिल करने वाले सतीश कुमार का मानना है कि उन्होंने अपने करियर के दो साल का सफर सर्वश्रेष्ठ रूप में तय किया है।

उनकी सबसे यादगार जीत इसी साल मार्च में एशियाई मुक्केबाज़ी ओलंपिक क्वालिफ़ायर्स में ओटगनबायर डेवि (Otgonbayer Daivii) के खिलाफ मिली थी

भारत के सतीश कुमार ने एशियन मुक्केबाज़ी ओलंपिक क्वालिफायर्स में ओटगनबायर डेवि को हराकर टोक्यो के लिए टिकट हासिल किया
भारत के सतीश कुमार ने एशियन मुक्केबाज़ी ओलंपिक क्वालिफायर्स में ओटगनबायर डेवि को हराकर टोक्यो के लिए टिकट हासिल कियाभारत के सतीश कुमार ने एशियन मुक्केबाज़ी ओलंपिक क्वालिफायर्स में ओटगनबायर डेवि को हराकर टोक्यो के लिए टिकट हासिल किया

भारतीय सुपर हेविवेट मुक्केबाज़ ने मंगोलियाई मुक्केबाज़ को हराने के बाद कहा, "मैं बिल्कुल नहीं बता सकता कि मुझे कितनी खुशी महसूस हो रही है।"

उन्होंने आगे कहा, “मैं अपने भविष्य के मुक़ाबलों में और भी बेहतर प्रदर्शन करना चाहता हूं। मैं सुपर हेविवेट डिविजन से ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाले अपने देश का पहला मुक्केबाज़ बनकर खुश और गर्व महसूस कर रहा हूं।”

ओलंपिक खेलों के लिए एक लंबा और कठिन सफर है, जिस पर सतीश कुमार दृढ़ता के साथ चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ने की क्षमता रखते हैं।

वह खेलों के सबसे बड़े इवेंट में किस तरह का मुक़ाबला करते हैं, ये देखना बाकी है। उनका करियर जिस भी मोड़ पर हो, लेकिन 30 साल के इस मुक्केबाज़ से बेहतर की उम्मीद की जा सकती है।

अब तक के इनके परिणामों के छोड़ दें तो भी सतीश कुमार ओलंपिक में भारत के पहले सुपर हैवीवेट बॉक्सर होंगे जिन्होंने इस भार वर्ग में टिकट हासिल कर इतिहास रचा है।

इतिहास उन्हें भारत के सबसे पहले सुपर हेविवेट मुक्केबाज़ के रूप में याद करेगा और जो अगले साल टोक्यो में एक अच्छे प्रदर्शन के साथ लोगों के दिल में उतरना चाहेंगे।

लेकिन सतीश कुमार आर्मी मैन होने के नाते, शायद हमेशा उसे परिभाषित करते हैं कि कैसे सेना हार नहीं मानती।

"देश पहले आता है, मैं जरूरत पड़ने पर किसी की भी सेवा करने के लिए तैयार हूं।"

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