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रोड टू टोक्यो 2020: लवलीना असम की मुक्केबाज़ी को आगे ले जा रही हैं 

खुद को साबित करने के बाद मुक्केबाज़ लवलीना बोरगोहेन की निगाहें अब ओलंपिक में मेडल जीतने पर है।

लेखक विवेक कुमार सिंह ·

उज्बेकिस्तान की मफ़्तुनाख़ोन मेलीवा (Maftunakhon Melieva) के खिलाफ ओलंपिक क्वालिफायर के क्वार्टर फाइनल मुकाबले के तीनों राउंड में शानदार प्रदर्शन करते हुए,असम की मक्केबाज़ लवलीना बोरगोहेन (Lovlina Borgohain) ने महिलाओं के वेल्टरवेट 69 किलोग्राम भारवर्ग में अपनी प्रतिद्वंदी को एक पक्षीय फ़ैसले से हराते हुए सफलतापूर्वक भारत के लिए ओलंपिक का टिकट सुनिश्चित किया।

ओलंपिक क्वालिफायर के सेमीफाइनल में चीन की गो हॉन्ग (Hong Gu) से हारकर प्रतियोगिता से बाहर होने के बावजूद वो आठ ओलम्पिक मुक्केबाजों के साथ अपना पहला ओलम्पिक बर्थ हासिल करने में सफल रहीं।

सिर्फ 23 साल की उम्र में मुक्केबाज़ लवलीना बोरगोहेन का शानदार प्रदर्शन ओलंपिक कांस्य-पदक विजेता एमसी मैरी कॉम (MC Mary Kom) के अनुभव की तुलना में तो बस एक शुरुआत है। हालांकि जिस तरह से रिंग में वो शानदार प्रदर्शन कर रही हैं, उससे देखने के बाद ऐसा ही लगता है कि वो भी मैरी कॉम की तरह ऊंचाई पर पहुंच सकती हैं।

बहनों से मिली प्रेरणा

लवलीना बोरगोहेन का जन्म 2 अक्टूबर 1997 को असम के गोलाघाट जिले में हुआ था। ज्यादातर सफल खिलाड़ियों की तरह उन्होंने भी सबसे पहले अपने भाई-बहनों से खेल की प्रेरणा ली। आपको बता दें कि उनकी बड़ी बहनें लीशा और लीमा, दोनों ने राष्ट्रीय स्तर पर बॉक्सिंग की है।

सिर्फ 13 साल की उम्र में उन्होंने मय थाई (एक प्रकार की मुक्केबाज़ी) को अपनाया। इसी दौरान वो प्रसिद्ध भारतीय मुक्केबाजी कोच पदुम बोरो से मिली, जिन्होंने स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के मुक्केबाजी ट्रायल के दौरान इस खिलाड़ी की प्रतिभा को देखा और उन्होंने मुक्केबाजी की प्रेरणा दी।

पदुम बोरो और बाद में मुख्य महिला कोच शिव सिंह के मुक्केबाजी प्रशिक्षण ने बॉक्सर लवलीना बोरगोहेन को 2017 में पहली सफलता दिलाई। कजाकिस्तान के अस्ताना में प्रेसिडेंट कप में उन्होंने कांस्य पदक जीता, और बाद में उसी साल उन्होंने वियतनाम में आयोजित एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में अपनी झोली में एक और कांस्य पदक डाला।

राष्ट्रमंडल खेलों में दिखाया अपने मुक्के का दम

इंडिया ओपन 2018 में स्वर्ण पदक जीतने वाली इस मुक्केबाज़ को वेल्टरवेट श्रेणी में 2018 राष्ट्रमंडल खेलों के लिए चुना गया। हालांकि वह क्वार्टरफाइनल में सैंडी रेयान से 2-3 से हार गईं, लेकिन गोल्ड कोस्ट में हुए इवेंट में गोल्ड मेडल जीतने वाली ब्रिट के खिलाफ उनकी मुक्केबाज़ी ने उनके हौसले बढ़ा दिए, जिससे उनके अंदर विश्वसनीयता बढ़ी।

रूस के उलान-उडे में आयोजित 2018 और 2019 AIBA महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के बाद, किसी को भी संदेह नहीं था कि वो भारत को ओलंपिक के मंच पर गौरवान्वित करेंगी।

उस साल उन्होंने मंगोलिया में उलानबातार कप में रजत पदक जीता और पोलैंड में 13वीं अंतरराष्ट्रीय सिलेसियन चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीता।

चयनकर्ताओं ने इसे ध्यान में रखा और बॉक्सिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (BFI) के ट्रायल को जीतकर उन्होंने अपने प्रतिभा का लोहा मनवाया। जिसके बाद चयनकर्ताओं ने ओलंपिक क्वालिफायर्स के लिए भारतीय मुक्केबाजों दल में उन्हें शामिल किया और 2020 ओलंपिक के लिए टिकट बुक करने का मौका दिया।

असम से निकल रहे हैं नई पीढ़ी के मुक्केबाज़

विश्व मंच पर लवलीना बोरगोहेन के कारनामों ने उनके अपने राज्य असम में बॉक्सरों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिली है। इस लिस्ट में जमुना बोरो और भाग्यबती कचहरी जैसे नाम शामिल हैं।

भारत का प्रतिनिधित्व करने की उनकी सफलता ने पूर्वोत्तर भारत के मुक्केबाजों की अगली पीढ़ी के बीच चिंगारी का काम किया है और उन्हें कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिली है।

2019 विश्व चैंपियनशिप जैसे टूर्नामेंट में कांस्य पदक विजेता अंकुशिता बोरो (64 किग्रा अंडर -21), इरफान खान (49 किग्रा अंडर -21) और बुलेन (बोरगोहेन) जैसे नामों ने हाल ही में खेले गए भारत के युवा खेलों में असम के 35 खिलाड़ियों की सूची का नेतृत्व किया। जहां एक स्वर्ण पदक, चार रजत और 14 कांस्य सहित कुल 19 पदकों के साथ उन्होंने अपने राज्य को गौरवांवित किया।

लवलीना बोरगोहेन के आगे का सफर

ओलंपिक के रिंग में उतरने से पहले किसी भी कार्यक्रम में लवलीना को हिस्सा नहीं लेना है। 69 किलोग्राम भारवर्ग में दुनिया में तीसरे स्थान पर रहने वाली मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन, 2020 के ओलंपिक में पदक जीतने के सपने को हासिल करने की उम्मीद के साथ जुलाई में अपने साथी भारतीय मुक्केबाजों के साथ जमकर प्रशिक्षण लेंगी।