फ़ीचर | बॉक्सिंग

जानिए भिवानी की इस पूजा रानी ने कैसे तय किया टोक्यो ओलंपिक तक का सफ़र

पिता की कड़ी आपत्तियों के बावजूद पूजा रानी ने अपने सपने को नहीं छोड़ा और आज वह खेलों के महाकुंभ में जगह बना चुकी हैं

लेखक सैयद हुसैन ·

एशियन बॉक्सिंग क्वालिफ़ायर्स में धमाकेदार प्रदर्शन के साथ पूजा रानी (Pooja Rani) टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिला मुक्केबाज़ बन गईं थीं। उन्होंने क्वार्टरफ़ाइनल बाउट में थाईलैंड की पोर्ननीपा चुटी (Pornnipa Chutee) को शिकस्त दी थी। हरियाणा के भिवानी की रहने वाली इस महिला मुक्केबाज़ के प्रदर्शन को देखकर ज़्यादा हैरानी नहीं होती, क्योंकि वह जहां से आती हैं उस मिट्टी से कई मुक्केबाज़ों ने भारत का नाम रोशन किया है।

भिवानी को ‘मिनी क्यूबा’ के तौर पर भी देखा जाता है, जहां से कविता चहल (Kavita Chahal), जितेन्दर कुमार (Jitender Kumar) और ओलंपिक पदक विजेता विजेन्दर सिंह (Vijender Singh) जैसे दिग्गज मुक्केबाज़ आते हैं।

एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में पदक समारोह में पूजा रानी

रिंग में उतरने से पहले पिता की नाराज़गी दूर की

हालाँकि, शहर के दूसरे घरों की ही तरह पूजा के पिता भी अपनी बेटी को मुक्केबाज़ी रिंग में उतरते हुए नहीं देखना चाहते थे। लेकिन लंबी चौड़ी कद काठी वाली पूजा का सपना हमेशा से ही रिंग में उतरना था। और उन्हें पहली बार मुक्केबाज़ी में मौक़ा भी एक संयोग की तरह मिला। कॉलेज के दिनों में इंटर-कॉलेज प्रतियोगिता में पहली बार पूजा रिंग में उतरी थीं और वहां उन्होंने रजत पदक जीत लिया था, इसी के बाद से पूजा का लगाव मुक्केबाज़ी में बढ़ गया था।

लेकिन वह जानती थीं कि उनके पिता को ये बात पता चली तो वह कभी भी नहीं मानेंगे, इसलिए उन्होंने मुक्केबाज़ी को एक राज़ रखा। और उन्होंने बिना पिता जी को बताए कैप्टेन हवा सिंह बॉक्सिंग एकेडमी ज्वाइन कर ली थी। उस वक़्त उनके पिता हरियाणा पुलिस में कार्यरत थे, वह इसलिए पूजा को बॉक्सिंग से दूर रखना चाहते थे कि उनकी बेटी को चोट आ सकती है।

पूजा रानी अपने करियर को लेकर बिल्कुल आश्वस्त थीं और जमकर ट्रेनिंग कर रहीं थीं, कई बार जब उन्हें अभ्यास के दौरान चोट आ जाती थी तो वह दोस्त के यहां रुक जाया करतीं थीं और घर नहीं आती थीं।

12वें साउथ एशियन गेम्स में पूजा रानी ने स्वर्ण पदक पर जमाया था कब्ज़ा

आख़िरकार जब उनके पिता को इसका पता चला तो उन्होंने 6 महीनों तक पूजा को बॉक्सिंग सीखने से रोक दिया था। पूजा के कोच संजय कुमार श्योरॉण (Sanjay Kumar Sheoran) ने भी कई बार उनके पिता को समझाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने नहीं सुना। लेकिन मुक्केबाज़ी को लेकर पूजा की प्रतिबद्धता और जुनून ने उनको पिता को भी अपना फ़ैसला बदलने पर मजबूर कर दिया, और वह इतना बदल गए कि फिर पूजा का साथ देने लगे।

पूजा की ज़िंदगी का निर्णायक मोड़ 2009 में आया, जब उन्होंने नेशनल यूथ बॉक्सिंग चैंपियनशिप में रजत पदक हासिल किया था। इसके बाद तो फिर उनके परिवार का रवैया भी उनके प्रति बदल गया था।उसके बाद से पूजा ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा, 2012 एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में उन्होंने रजत पदक जीता, 2014 एशियन गेम्स में कांस्य पदक पर कब्ज़ा भी जमाया। 2014 में पूजा ने कॉमनवेल्थ गेम्स में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया और 12वें साउथ एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। 2019 एशियन चैंपियनशिप में भी पूजा रानी ने स्वर्ण पदक हासिल किया था।

दीवाली के पटाखों ने पूजा रानी को दिए गहरे ज़ख़्म

जब पूजा के करियर में सबकुछ अच्छा जा रहा था तभी उनकी क़िस्मत में बुरा वक़्त भी आया। 2016 के दीवाली में पटाख़ा जलाते समय पूजा ने अपना दायां हाथ बहुत बुरी तरह से जला लिया था। ज़ख़्म इतना गहरा था कि इसे ठीक होने में 6 महीने लग गए, ये पूजा के करियर के सबसे मुश्किल दौर में से एक था।

हाथ ठीक होने के बाद भी पूजा की फ़िटनेस ऐसी नहीं थी कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वह पहले जैसा प्रदर्शन कर सकें, एक बार तो उनको लगने लगा था कि कहीं उनका करियर यहीं समाप्त न हो जाए।

लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कड़ी मेहनत करते हुए पूजा पहले से भी ज़्यादा बेहतरीन अंदाज़ में रिंग में लौटीं। 2019 एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में पूजा रानी ने स्वर्ण पदक पर अपना नाम लिखवाया। फ़ाइनल बाउट में उन्होंने उस वक़्त की मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन वैंग लीना (Wang Lina) को पराजित किया था।

पिछले साल ही पूजा ने इसके बाद ओलंपिक टेस्ट इवेंट में ऑस्ट्रेलिया की कैटलिन पार्कर (Caitlin Parker) को भी मात दी थी। 6 बार की राष्ट्रीय चैंपियन के लिए इसके बाद भी कई ऐसे इवेंट थें, जहां क़ामयाबी ने उनके क़दम नहीं चुमे थे। जिनमें से एक और शायद सबसे बड़े इवेंट के लिए उन्होंने हाल ही में क्वालिफ़ाई कर लिया है, टोक्यो ओलंपिक में जगह बनाने वाली पूजा रियो 2016 में क्वालिफ़ाई नहीं कर पाईं थीं।

मिशन टोक्यो

अपने पहले ओलंपिक में जगह पक्की करने वाली पूजा रानी की नज़र अब देश को खेलों के महाकुंभ में पदक दिलाने पर होगी। चौथी वरीयता हासिल इस भारतीय मिडिलवेट मुक्केबाज़ ने ठीक उसी दिन टोक्यो गेम्स के लिए क्वालिफ़ाई किया था, जब विकास कृष्ण (Vikas Krishan) को भी टिकट हासिल हुआ था।

अब जब कोरोना वायरस (COVID-19) की वजह से टोक्यो गेम्स एक साल के लिए स्थगित हो गया है तो तीन बार की एशियन चैंपियन पूजा रानी इस अतिरिक्त वक़्त का फ़ायदा उठाने के लिए बेताब हैं। कुछ लोगों को भले ही ये लगता हो कि टोक्यो गेम्स के लिए क्वालिफ़ाई करना ही एक बड़ी क़ामयाबी की ही तरह है, लेकिन पूजा रानी ये नहीं मानतीं।

उनकी नज़र ओलंपिक पदक के साथ देश को गौरवान्वित करते हुए ख़ुद को साबित करने पर है।