एक्सक्लूसिव: खेल से जुड़े माता-पिता ने बनाया जीव मिल्खा सिंह के करियर को सफल 

यह भारतीय गोल्फर अपने माता-पिता मिल्खा सिंह और निर्मल कौर को अपनी सफलता का श्रेय देता है। उन्होंने ही उसे एक एथलीट और सफल गोल्फर के रूप में ढालने का काम किया।

भारत के सबसे बड़े धावक और फ्लाइंग सिंह के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह (Milkha Singh) और भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम की पूर्व कप्तान निर्मल कौर (Nirmal Kaur) के घर जन्मे जीव मिल्खा सिंह (Jeev Milkha Singh) ने इस खेल विरासत को आगे बढ़ाने का काम किया।

इस चंडीगढ़ निवासी ने बचपन के दिनों में कई खेलों में अपने हाथ आजमाए। अपने मूड के मुताबिक उन्होंने कभी क्रिकेट तो कभी फुटलॉब तो कभी हॉकी खेला। नौ वर्ष की आयु में गोल्फ के खेल ने उनका ध्यान आकर्षित किया और अंत में उन्होंने इसी खेल को अपने करियर के तौर पर चुना।

जैसे उन्होंने अपने पिता से जीवन के कई महत्वपूर्ण सबक सीखें, ठीक वैसे ही इस खेल को भी शुरुआत में उन्हीं से सीखा।

जीव मिल्खा सिंह ने ओलंपिक चैनल को दिए गए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कहा, “पिताजी किसी आधिकारिक समारोह के लिए यूके गए थे और वहां उन्हें एक गोल्फ सेट भेंट किया गया। वापस आने के बाद उन्होंने इसे सीखना शुरू कर दिया और मुझे सुझाव दिया कि मैं भी इसमें हाथ आजमाऊं।”

उन्होंने आगे कहा, “चंडीगढ़ गोल्फ क्लब हमारे घर से करीब आधा किलोमीटर की दूरी पर था और जब मैं वहां गया, तो मैंने अपनी उम्र के अन्य बच्चों को भी खेलते हुए देखा। मैं उनका दोस्त बन गया और धीरे-धीरे इस खेल से प्यार हो गया। फिर तो मुझे जब भी मौका मिलता, मैं कोर्स पर पहुंच जाता।”

70 और 80 के दशक में युवाओं के बीच गोल्फ इतना लोकप्रिय खेल नहीं होने की वजह से जीव मिल्खा सिंह को जूनियर किट नहीं मिल सकी। इसलिए उनके माता-पिता ने इस जुनून को और आगे बढ़ाने के लिए उनकी सहायता की।

भारतीय गोल्फर ने याद करते हुए कहा, “पिताजी स्पोर्ट्स क्लब में कुछ लोगों को जानते थे और उन्होंने मेरी लम्बाई के मुताबिक कुछ लोहे की रॉड को कटवा दिया। इसलिए यह थोड़ा भारी था लेकिन मेरे लिए सही था। फिर इस पर ग्रिप चढ़ाई गई, ताकि मैं स्टिक को स्विंग कर सकूं।”

इसके बाद जीव मिल्खा सिंह के करियर में तेजी से वृद्धि हुई। हालांकि, उनके पास तब भी पुरुषों के गोल्फ क्लब को संभालने के लिए ऊपरी शरीर में ताकत नहीं थी और इसलिए उन्हें महिलाओं के सेट को इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह थोड़ा हल्का था और इसी की वजह से उनका खेल जारी रह सका।

अंततः यह भारतीय गोल्फर अध्ययन के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका चला गया, जहां उन्होंने कॉलेज सर्किट में सभी को प्रभावित किया। इसी ने उन्हें इस खेल को एक प्रोफेशनल करियर के तौर पर अपनाने के लिए तैयार किया।

इसके बाद उन्हें जरूरत थी तो अपने माता-पिता को राज़ी करने की।

माता-पिता से मिला सहयोग

मिल्खा सिंह और निर्मल कौर ने जीव मिल्खा सिंह के करियर की राह को आसान करने का काम किया। चाहे वह खेल हो या शिक्षा, उन्होंने हमेशा हर चीज़ के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया।

इसलिए जब 22 साल की उम्र में अमेरिका के अपने कॉलेज में रहते हुए उन्होंने गोल्फ को अपने करियर के तौर पर चुनने का फैसला किया तो उनके माता-पिता ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए केवल एक ही सवाल पूछा।

जीव मिल्खा सिंह ने कहा, "उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या तुम्हें अपने फैसले पर यकीन है। मैंने उनसे कहा कि प्रोफेशनल गोल्फर बनना मेरा जुनून और सपना है। फिर उन्होंने मुझे बस कड़ी मेहनत करने की सलाह दी और कभी भी पीछे मुड़कर न देखने की सलाह दी। उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया कि वे हमेशा मेरे साथ रहेंगे और मेरा पूरा समर्थन करेंगे।”

खुद खेल से जुड़े होने की वजह से मिल्खा सिंह और निर्मल कौर दोनों को ही पता था कि एक एथलीट को अपने करियर में आने वाले कई उतार-चढ़ावों से गुजरना होता है। कई मायनों में जीव मिल्खा सिंह के लिए यह फायदेमंद साबित हुआ, क्योंकि उनके पास हौसला अफ़ज़ाई करने वाले माता-पिता थे।

भारतीय गोल्फर ने समझाते हुए कहा, “जब भी मैं सलाह के लिए उनके पास जाता था, वे मुझे उन तरीकों के बारे में सिखाते थे, जो उन्होंने खुद अपने करियर के दौरान सीखी थीं। उन्होंने मुझे सिखाया कि जरूरी नहीं कि आप खेल में हमेशा जीत हासिल कर सकते हैं।”

“आपको इसकी प्रक्रिया में विश्वास करना चाहिए और नियमित रूप से इस पर काम करते रहना चाहिए। तभी आप बेहतर करने की आदत को अपने अंदर ला सकते हैं और इस पर गर्व कर सकते हैं।”

इसी ज्ञान के साथ गोल्फ के लिए अपने जुनून को लेकर आगे बढ़ने वाले जीव मिल्खा सिंह 1998 में यूरोपीय दौरे में प्रवेश करने वाले पहले भारतीय गोल्फर बन गए।

उन्होंने 2006 में वोल्वो चाइना ओपन में अपना पहला खिताब जीता। उसके बाद उसी वर्ष वोल्वो मास्टर्स टूर्नामेंट जीता और पीजीए टूर, जापान गोल्फ टूर में भी हिस्सा लिया। जहां वह चार बार विजेता रहे। इसके साथ ही एशियन टूर में उन्होंने छह खिताब जीते।

इन सभी सफलताओं के बाद जीव मिल्खा सिंह ने 2012 में स्कॉटिश ओपन जीता। यह अभी तक का उनका आखिरी यूरोपीय टूर खिताब है, जहां उन्होंने फ्रांसेस्को मोलिनारी (Francesco Molinari) को प्ले-ऑफ में हराया था। यह उनके लिए अभी तक की पसंदीदा जीत बनी हुई है।

50 की उम्र में पहुंचने के करीब अब भारतीय गोल्फर के सामने एक नई चुनौती है।

तीसरी पीढ़ी के एथलीट को तैयार करने की जिम्मेदारी?

2007 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किए गए जीव मिल्खा सिंह खुद एक नौ साल के बच्चे हरजाई सिंह (Harjai Singh) के पिता हैं।

उनका बेटा भी अपने परिवार की तरह खेल को खूब पसंद करता है। वह भी अपने पिता की तरह सीज़नल खेलों में हिस्सा लेता है और पिछले साल मलेशिया में किड्स गोल्फ चैंपियनशिप में कांस्य जीता, जहां जीव मिल्खा सिंह उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए मौजूद रहे।

मिल्खा सिंह के घर में पलने और बढ़ने की वजह से भारतीय गोल्फर अपने बच्चे में भी स्वतंत्रता और आज़ादी की भावना को विकसित करना चाहते हैं।

जीव मिल्खा सिंह ने कहा, "एक अभिभावक के रूप में मेरा काम उसे इस तरह से तैयार करना है कि वह खुद को अच्छी तरह से आगे बढ़ा सकें और एक अच्छा इंसान बनें। जानवरों और इंसानों की मदद करे।”

अब सवाल यह उठता है कि क्या हरजाई सिंह अपने पिता के कदमों पर चलेंगे। भारतीय गोल्फर ने इसका भी जवाब दिया।

जीव मिल्खा सिंह ने अपनी बात को खत्म करते हुए कहा, “मैं केवल उसका मार्गदर्शक बनना चाहता हूं। उसका जुनून गोल्फ, क्रिकेट, संगीत या पढ़ाई हो सकता है, लेकिन यह चुनाव उनका होगा। एक अभिभावक के रूप में मैं उन्हें अच्छे और सकारात्मक सुझाव दे सकता हूं।

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