फ़ीचर

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं: जानिए उन कोचों की दास्तां जिन्होंने चैंपियंस को तराशा

पुलेला गोपीचंद सतपाल सिंह और बाकी भारतीय कोचों को टीचर्स डे के अवसर पर सलाम। एक एथलीट के जगमगाते करियर के पीछे की लौ कहलाते हैं वो।

लेखक जतिन ऋषि राज ·

भारत में खेल और खिलाड़ियों को बहुत सम्मान दिया जाता है। बहुत से ऐसे ओलंपियन हैं जिन्होंने ओलंपिक इतिहास में भारतीय तिरंगे को कुछ नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है, लेकिन उनके वहां तक का सफ़र केवल उस खिलाड़ी ने ही नहीं तय किया बल्कि उनके पीछे न जाने कितने लोगों ने मेहनत की है।

हर खिलाड़ी के पीछे एक टीम होती है जिनमें डाईटीशियन, फिटनेस इंस्ट्रकटर और कोच होते हैं। आज हम बात करेंगे उन 10 कोचों की जिन्होंने पीछे से भारतीय खेल और खिलाड़ियों जैसे कि पीवी सिंधु, (PV Sindhu) सुशील कुमार (Sushil Kumar) नुमा दिग्गजों को एक बड़े मुकाम तक पहुंचाने के पीछे के पीछे उनके कोचों का बहुत बड़ा हाथ रहा है।

पुलेला गोपीचंद

भारतीय बैडमिंटन के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी और सबसे सफल कोच पुलेला गोपीचंद (Pullela Gopichand) ने इस खेल को बहुत प्रसिद्धि दी है। पीवी सिंधु (PV Sindhu), साइना नेहवाल (Saina Nehwal) जैसे खिलाड़ियों ने गोपीचंद से खेल के गुर सीखे हैं और आज सभी देशवासी उनकी उपलब्धियों से वाकिफ हैं।

अपने शानदार करियर के बाद गोपीचंद ने अपनी सभी सेविंग को बैडमिंटन अकादमी में लगा दी और खेल छोड़ने के बाद भी भारत की सेवा में लगे रहे। हैदराबाद की इस अकादमी को खड़ा करने के लिए पुलेला गोपीचंद ने अपना घर तक गिरवी रख दिया और यही वजह है कि खेल के लिए उनका जुनून देखते ही बनता है।या

गोपीचंद को डिसिप्लिन के लिए जाना जाता है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि रियो ओलंपिक गेम्स के दौरान उन्होंने दिग्गज पीवी सिंधु को उनका फोन तक इस्तेमाल करने नहीं दिया।

इतना ही नहीं करियर के एक मोड़ किदांबी श्रीक (Srikanth Kidambi) ने भी गोपीचंद से खेल के गुर सीखे हैं और यह कहना गलत नहीं होगा की पुलेला गोपीचंद खेल से तो रिटायर हो गए हैं लेकिन भारतीय बैडमिंटन में आज भी उनका योगदान पहले जैसा ही है।

जीएस संधू

पिछले कुछ सालों में भारतीय बॉक्सिंग ने एक नया नाम हासिल किया है और इसका श्रेय गुरबक्श सिंह संधू (Gurbaksh Singh Sandhu) को जाता है। गुरबक्श सिंह संधू ने आसमान तब छुआ जब उनके शिष्य विजेंदर सिंह (Vijender Singh) ने ओलंपिक गेम्स 2008 ब्रॉन्ज़ मेडल हासिल किया।

संधू ने भारतीय बोक्सेरों वीडियो असिस्टेंस के द्वारा खेल के दांव पेच सिखाए उन्हें कड़ी मेहनत करने का पथ भी दिखाया।

इतना ही नहीं उन्होंने भारतीय मुक्केबाज़ों की तकनीक में भी परिवर्तन कराए और उन्हें अपरकट जैसी चीज़ों को कंट्रोल में प्रयोग करने की सलाह दी। भारतीय मुक्केबाज़ों की सफलता में ऐसी और भी कई चीज़ें रहीं जिस वजह से मुकाबले में वह अंक बटोरते रहे और सफलता हासिल करते रहें।

विजेंदर सिंह ओलंपिक मेडल जीतने वाले पहले भारतीय बॉक्सर बनें 

जसपाल राणा

शूटिंग एक ऐसा खेल है जिसे भारत ने हमेशा से पसंद किया है लेकिन पिछले साल रियो डी जनेरियो में ISSF वर्ल्ड कप में मिली सफलता के बाद तो मानों भारतीय शूटरों का मनोबल सातवें आसमान पर है।

इस समय भारतीय शूटरों की लिस्ट में मनु भाकर (Manu Bhaker), सौरभ चौधरी (Saurabh Chaudhary) और अनीश भनवाल (Anish Bhanwala) जैसे खिलाड़ियों का नाम सबसे उपर है और वह इंटरनेशनल स्तर पर भी अपने कौशल का प्रमाण पेश कर चुके हैं।

भारतीय जूनियर पिस्टल को जसपाल राणा (Jaspal Rana) का नाम 2012 में खूब सुर्ख़ियों में आया। जूनियर स्तर पर शूटिंग के गुर सिखाने वाले कोच जसपाल राणा के शिष्य (भाकर और चौधरी) जब 18 साल के हुए और उन्होंने दुनिया भर में अपना नाम रोशन किया तो उसका श्रेय जसपाल रना को ही मिला क्योंकि उस कोच ने ही इन खिलाड़ियों के बेस को मज़बूत किया था।

Asian Games gold medallist Jaspal Rana has helped Indian shooting prosper.

सतपाल सिंह

हरियाणा, पंजाब दो ऐसी जगह हैं जहां कुश्ती को बेहद प्यार मिला है और लगभग हर गाँव से एक न एक पहलवान तो निकला ही है। कौशल है, मेहनत है और संकल्प भी लेकिन फिर भी आधारिक संरचना खराब होने के कारण भारतीय रेसलर वह कमाल नहीं कर पा रहे थे जिसके लिए वह जाने जाते थे।

1982 के एशियन गेम्स के गोल्ड मेडल विजेता सतपाल सिंह (Satpal Singh) ने उस हर सम्स्य का हल पहलवानों को दिया जो उनके और उनकी सफलता के बीच कड़ी थी। उन्होंने दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में रेसलिंग ट्रेनिंग सेंटर की स्थापना कर इस खेल और इससे जुड़े खिलाड़ियों को मानों एक नया जीवन दिया और यही एक बड़ा कारण है कि भारतीय पहलवानों की इज्ज़त पूरी दुनिया में की जाती है।

दो बार ओलंपिक गेम्स में मेडल जीतने वाले सुशील कुमार (Sushil Kumar) लंदन गेम्स में ब्रॉन्ज़ हासिल करने योगेश्वर दत्त (Yogeshwar Dutt) ने भी कुश्ती का कौशल सतपाल सिंह से ही सीखा है।

Indian wrestler Sushil Kumar’s Olympic medal came under coach Satpal Singh.

पूर्णिमा महतो

जब भारतीय आर्चरी की बात की जाती है तो दीपिका कुमारी (Deepika Kumari) का नाम ज़रूर आता है। आर्चरी वर्ल्ड कप में इस खिलाड़ी के नाम 3 गोल्ड और 3 सिल्वर मेडल हैं और इन्होने 2012 लंदन गेम्स और 2016 रियो ओलंपिक गेम्स में भारत का नाम ऊंचा किया है।दीपिका कुमारी के करियर में उनकी कोच पूर्णिमा महतो (Purnima Mahato) का बहुत बड़ा योगदान है और इस गुरु शिष्या की जोड़ी साल 2006 में ही बन गई थी जब कुमारी ने प्रो में कदम रखने की ठानी थी।

पूर्णिमा महतो ने एक कोच होने के नाते कुमारी की तकनीक पर काम किया और उन्हें मुकाबले के दौरान सही व्यवहार करना सिखाया। ग़ौरतलब है कि पूर्णिमा महतो को 2013 में द्रोणाचार्य अवार्ड से भी सम्मानित किया गया और यह उनकी मेहनत का सबसे बड़ा फल भी साबित हुआ

Purnima Mahato oversaw the success of Indian archer Deepika Kumari.

ओएम नाम्बियार

पीटी उषा आज भारत की सबसे साफत एथलीटों में से एक हैं। एशियन अमिन जीते हुए गोल्ड मेडल और ओलंपिक गेम्स में शानदार प्रदर्ष कर उन्होंने यह मकाम हासिल किया है लेकिन उनकी इस सफलता के हिम्मत है ओएम नाम्बियार की।

ओएम नाम्बियार ही थे जिन्होंने पीटी उषा के कौशल को पहचाना और उसे निखारा। 400 मीटर में कैसे दौड़ना है, वह इस कोच हर वह काम किया जो एक एथलीट को सर्वश्रेठ बनाता है और यही वजह है कि उन्हें द्रोणाचार्य अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।

Indian athlete PT Usha was groomed by coach O M Nambiar. Photo: Facebook/PT Usha.

बिश्वेश्वर नंदी

जब भारतीय एथलीट दीपा कर्माकर (Dipa Karmakar) ने रियो गेम्स में प्रोदुनोवा मूव का इस्तेमाल कर वाह वाई लूटी तो उसका श्रेय उनके कोच बिश्वेश्वर नंदी (Bishweshwar Nandi) को जाता है।

खुद एक अव्वल दर्जे के जिमनास्ट बिश्वेश्वर नंदी ने अपनी शिष्य दीपा कर्माकर को उस खतरनाक मूव का स्किल सिखाया और उसे करने के लिए प्रेरित किया।

हालांकि नंदी की पत्नी ने दीपा के कौशल को पहचाना था लेकिन उसके बाद नंदी ने उसे निखारा और दीपा के सपनों को साकार करने में जुट गए। किताब ‘दीपा कर्माकर: स्माल वंडर’ की लिखाई में बिश्वेश्वर नंदी का भी योगदान। इस समय यह कोच शिष्या की जोड़ी

Indian gymnast Dipa Karmakar has perfected her vault under Bishweshwar Nandi.

निहार आमीन

एशियन गेम समें ब्रॉन्ज़ मेडल विजेता वीरधवल खड़े (Virdhawal Khade) और संदीप सेजवाल (Sandeep Sejwal) भारतीय स्विमिंग के सबसे ज़्यादा चमकने वाले खिलाड़ी हैं और इन दोनों में एक नाम सामान्य है और वह है उनके कोच निहार आमीन (Nihar Ameen) का।

यूएसए स्विमिंग में सबसे सफल देशों में से एक हैं और भारत के निहार आमीन ने उस ज़मीन पर भी असिस्टेंट कह की भूमिका निभाई हुई है। वह का तजुर्बा लेकर निहार ने भारतीय तैराकों को वह सब सिखाया जो उनकी जीत के लिए बेहद ज़रूरी था।

ओलंपिक गेम्स में स्विमिंग के दो इवेंट (एथेंस 2004 में 50 और 100 मीटर) में क्वालिफाई करने वाली पहली भारतीशिखा टंडन (Shikha Tandon) के जीवन में भी निहार आमीन ने बेहद ख़ास भूमिका निभाई है।

‘प्रकाश पदुकोने सेंटर ऑफ़ एक्सिलेंस’ में एक कोच की भूमिका निभा रहे निहार आमीन अब भारत के लिए बेहतरीन तैराक ढूंढने में व्यस्त हैं।य

Indian swimmer Virdhawal Khade can thank coach Nihar Ameen for his success.

सैय्यद अब्दुल रहीम

हैदराबाद के सैय्यद अब्दुल रहीम (Syed Abdul Rahim) को रहीम साहब के नाम से भी जाना जाता है। यह नाम भारतीय फुटबॉल इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ है और इस कोच ने बहुत से खिलाड़ियों को फुटबॉल के गुणों से अवगत कराया है।

एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल तक की राह दिखाना ही नहीं बल्किपीके बनर्जी (PK Banerjee), तुलसीदास बालाराम (Tulsidas Balaram) जैसे खिलाड़ियों को दिग्गज बनाने का श्रेय सैय्यद अब्दुल रहीम को जाता है1956 ओलंपिक गेम्स में भारतीय फुटबॉल टीम ने सेमी-फाइनल तक का सफर तय किया था और उस समय भी सैय्यद अब्दुल रहीम इस टीम के साथ जुड़े हुए था

रहीम का देहांत 1963 में कैंसर से हुआ और यह नुक्साब भारतीय खेल जगत के लिए हमेशा दुखदाई रहेगा।।

Syed Abdul Rahim (front row centre) is called the architect of modern Indian football. Photo: Twitter/AIFF.

गौरव खन्ना

गौरव खन्ना (Gaurav Khanna) एक ऐसा नाम है जो एक खिलाड़ी के तौर पर तो ज़्यादा आगे नहीं जा सके लेकिन एक कोच बनकर उन्होंने बहुत सफलता हासिल की है। पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी गौरव खन्ना ने पैरा बैडमिंटन खिलाड़ियों को खेल के गुर सिखाए हैं इसी वजह से उन्हें को 2020 द्रोणाचार्य अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है।

गौर तलब है कि गौरव भारतीय डेफ बैडमिंटन टीम के हेड कोच हैं उन खिलैद्यों के सफलता के पीछे भी इन्ही का हाथ है। इतना ही नहीं उन्होंने एशियन खन्ना एशियन डेफ बैडमिंटन टीम को भी खेल की तकनीकों और गणों से अवगत करा चुके हैं।

गौरव खन्ना ने प्रमोद बह्गत, पारुल परमेर और मनोज कुमार जैसे चैंपियन शटलर्स बनाए हैं।

2015 में गौरव खन्ना ने पैरा बैडमिंटन टीम की कमान संभाली ओर तब से लेकर अब तक वह उन खिलाड़ियों को 300 मेडल जितवा चुके हैं जिसमें वर्ल्ड चैंपियनशिप का गोल्ड मेडल भी शरोहित भाकर (Rohit Bhaker), मनोज सरकार (Manoj Sarkar), पारुल परमार (Parul Parmer) और प्रमोद भगत (Pramod Bhagat) जैसे खिलाड़ियों ने अर्जुन अवार्ड भी जीते हैं।