बलबीर सिंह सीनियर के लिए क्यों खास था 1948 लंदन ओलंपिक में जीता गया स्वर्ण पदक

आजादी के बाद पहले ओलंपिक स्वर्ण ने टीम के जश्न को और बढ़ा दिया, ये वो मौका था जिसने देश को विश्वास दिलाने में मदद की।

भारतीय हॉकी के दिग्गज खिलाड़ी बलबीर सिंह दोसांज (Balbir SIngh Dosanjh) का सोमवार सुबह निधन हो गया। वो अस्पताल में दो सप्ताह से भर्ती थे। बलबीर सिंह ने तीन ओलंपिक - 1948, 1952 और 1952 में भाग लिया और सभी में स्वर्ण पदक जीता।

1948 में आयोजित लंदन ओलंपिक में उन्होंने पहली बार भाग लिया था और इस ओलंपिक को वो सबसे खास मानते हैं। हालांकि 1956 की टीम ने 38 गोल किए और उन्हें ‘द इनविजनल’ नाम दिया गया।

लेकिन 1948 ओंलपिक में जीता गया स्वर्ण उनके जीवन में अलग ही महत्व रखता है, न केवल इसलिए कि ये स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत का पहला स्वर्ण था, बल्कि खेलों वाले साल में सभी ऑफ-फील्ड घटनाएं इसकी वजह थी।

देश के बंटवारे के बाद का दौर

बलबीर सिंह सीनियर का जन्म बंटवारे से पहले पंजाब में हुआ था और वो लाहौर के सिख नेशनल कॉलेज से पढ़ाई की, जो अब एक पाकिस्तान में स्थित है।

उसके बाद वो अमृतसर के खालसा कॉलेज में चले गए, जो अभी भारत का हिस्सा है। लेकिन फिर भी वो पंजाब राज्य की टीम के लिए खेलते रहे। ये हिस्सा भी विभाजित हो गया था, जब स्वतंत्रता आंदोलन के बाद भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ था।

देश भर में हो रहे सामुदायिक दंगों के बावजूद 1946 में पंजाब अभी तक सामुदायिक दंगों से बचा हुआ था। इसने पूरे राज्य में जोश भर दिया था, लेकिन सबसे बुरी स्थिति अभी आनी बाकी थी।

अप्रैल 1947 में बलबीर सिंह सीनियर और पंजाब के कप्तान एएस दारा लगातार दूसरे साल राष्ट्रीय खिताब जीतने के बाद लाहौर लौटे थे, ये स्ट्राइकर दोनों अवसरों पर शीर्ष स्कोरर थे और सब कुछ सामान्य लग रहा था।

लेकिन उन्हें कुछ अजीब महसूस हो रहा था। उन्होंने एक इंटरव्यू में ईएसपीएन को बताया था, ''उन्हें (दारा) बधाई देने वाले लोगों को कई बार रोक दिया, उन्हें पता था कि ऐसा क्यों हो रहा है। किसी भी मौके पर उन्होंने मेरा परिचय नहीं कराया। मुझे पड़ोस के गेट के बाहर इंतजार करने के लिए कहा गया था।”

“ये एक अजीब एहसास था। वे शायद पहले से ही विभाजन के बारे में सोच रहे थे। मुझे इसके बारे में पता नहीं।"

1948 के लंदन ओलंपिक में बलबीर सिंह सीनियर। फोटो: भारतीय खेल प्राधिकरण / ट्विटर
1948 के लंदन ओलंपिक में बलबीर सिंह सीनियर। फोटो: भारतीय खेल प्राधिकरण / ट्विटर1948 के लंदन ओलंपिक में बलबीर सिंह सीनियर। फोटो: भारतीय खेल प्राधिकरण / ट्विटर

वो जल्द ही अपनी पत्नी के साथ भारत के पंजाब के लुधियाना चले गए। कुछ लोगों ने बहुत कुछ खोया। बलबीर सिंह सीनियर ने अपने पंजाब के कई साथियों को खो दिया, जिन्होंने पाकिस्तान में रहने का फैसला किया।

तत्कालीन 24 वर्षीय पंजाब पुलिस के एक अधिकारी ने लुधियाना में बहुत सारे हिंसक अत्याचारों का सामना किया।

एक बुरी घटना के बाद बलबीर सिंह सीनियर और उनकी टीम अपनी पोस्टिंग पर लौट आई, और जब इन्होंने अपने लोगों से अपने हथियार रखने के लिए कहा, तो उनमें से एक ने गलती से एक गोली चलाई, जो कि अधिकारी की पगड़ी से होकर गुजरी थी।

यह एक बुरा दौर था, लेकिन बलबीर सिंह सीनियर को जल्द ही इन सब से छुटकारा मिलने वाला था।

जॉन बेनेट की कहानी

भारतीय हॉकी टीम की तरफ से 1948 के ओलंपिक के लिए जाने वाले बलबीर सिंह को लंदन में उतरने पर पहले ही आशंकाओं ने घेर लिया।

हॉकी संघ के तत्कालीन प्रमुख नवल टाटा ने टीम को पहले ही लंदन के लिए रवाना किया था, ताकि उनके पास अभ्यास करने के लिए पर्याप्त समय हो। हीथ्रो हवाई अड्डे पर सर जॉन बेनेट ने टीम का स्वागत किया था।

ये वही थे, जिन्होंने बलबीर सिंह सीनियर को पंजाब पुलिस के लिए खेलने के लिए मजबूर करने के लिए कुछ साल पहले गिरफ्तार किया था, उस समय उन्होंने अंग्रेजों के प्रति वफादारी के कारण ये ऑफर ठुकरा दिया था।

बलबीर सिंह ने कहा, "जब मैंने उन्हें देखा, तो मैं चिंतित था" लेकिन वो डर निराधार निकला। उन्होंने कहा, "मुझे देखकर बहुत अच्छा लगा। वो मुस्कुराए और फिर उन्होंने मुझे गले लगाया।"

बलबीर सिंह सीनियर ने उनकी एक बाद याद करते हुए कहा, "उन्होंने मुझसे कहा, 'बलबीर, इंग्लैंड के मैदान बहुत बड़े हैं। इसलिए आपको गेंद के साथ कड़ी मेहनत करनी होगी। ये भारत की तरह कठिन नहीं हैं। इसलिए आप यहां गेंद को उस तरह नहीं मार सकते।' उन्होंने मुझे अपने साथियों को ये बात बताने के लिए कहा।"

सबसे गौरवशाली उपलब्धि के साथ दिग्गज खिलाड़ी। फोटो: बलबीर सिंह सीनियर/ट्विटर
सबसे गौरवशाली उपलब्धि के साथ दिग्गज खिलाड़ी। फोटो: बलबीर सिंह सीनियर/ट्विटरसबसे गौरवशाली उपलब्धि के साथ दिग्गज खिलाड़ी। फोटो: बलबीर सिंह सीनियर/ट्विटर

सेंटर-फॉरवर्ड ने अपने ओलम्पिक डेब्यू में 8 गोल किए, जहां अर्जेंटीना के खिलाफ छह और फिर ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ फाइनल में वेम्बली स्टेडियम में 25,000 दर्शकों के सामने दो गोल किए।

ये उनके जीवन का सबसे गौरवपूर्ण पल था और इसके साथ, उन्होंने न केवल अपने सपने को पूरा किया, बल्कि अपने स्वतंत्रता सेनानी पिता दलीप सिंह को भी सही साबित किया।

उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया था कि, “जब मैं बच्चा था, जब मैं अपने पिता से पूछता था कि स्वतंत्रता का क्या मतलब है और हम इससे आजाद होकर क्या करेंगे। उन्होंने जवाब दिया कि स्वतंत्रता हमें हमेशा के लिए अपनी पहचान, तीरंगा और गौरव दिलाएगी।”

आंखों से आँसू बहने लगते थे, जब भी बलबीर सिंह सीनियर अपने समय की कहानी सुनाते थे।

क्या आपको यह आर्टिकल पसंद आया? इसे अपने दोस्तों के साथ साझा करें!