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माई ग्रेटेस्ट गेम: ओलंपिक गेम्स में क्वालिफाई करने के लिए सविता पुनिया चट्टान की तरह खेली थी

2015 वर्ल्ड हॉकी लीग सेमीफाइनल के दौरान भारतीय महिला हॉकी टीम की गोलकीपर ने जापान के खिलाफ बेहतरीन खेल दिखाया था और इस वजह से टीम ने 36 साल बाद ओलंपिक गेम्स के लिए क्वालिफाई भी किया था।

लेखक जतिन ऋषि राज ·

जहां भारतीय मेंस हॉकी ने ओलंपिक गेम्स में 8 गोल्ड, 2 ब्रॉन्ज़ और 1 सिल्वर मेडल के साथ अपना दबदबा छोड़ा हुआ है तो वहीं भारतीय वुमेंस हॉकी टीम ने 2016 रियो तक महज़ एक बार ओलंपिक में शिरकत की थी।

मोस्को में हुए 1980 ओलंपिक गेम्स के बाद 2015 वर्ल्ड हॉकी लीग सेमीफाइनल तक का सफर तय करने के बाद भारतीय हॉकी महिला टीम के पास रियो गेम्स में जगह बनाने के मौके बहुत कम थे।

उन्होंने सभी को गलत साबित करते हुए अपने कारवां को आगे बढ़ाया। वर्ल्ड हॉकी लीग सेमीफाइनल भले ही भारतीय महिला टीम के पक्ष में नहीं रही हो लेकिन जापान के खिलाफ हुए मुकाबले को जीत कर इस टीम ने रियो गेम्स में जगह बना ली थी।

जापान के खिलाफ हुए मुकाबले में भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तन रानी रामपाल (Rani Rampal) ने एक गोल मारा था और उस दिन भारत ने 1-0 से जीत की देहलीज़ भी लगी थी।

उस दिन असल मायनों में किसी खिलाड़ी ने वाह वाही लूटी थी तो वह भारतीय हॉकी टीम की गोलकीपर सविता पुनिया (Savita Punia) थीं। इन्होंने एक नहीं दो नहीं बल्कि 6 बार जापानी टीम को गोल मारने से रोका और भारतीय टीम के हौंसले ऊंचे रखे। सविता आज टीम की उपकप्तान हैं और अपने करियर में उस मुकाबले को एक ख़ास जगह देती हैं।

एंटवर्प को बनाया मौका

साल 2015 में भारतीय टीम ने एंटवर्प में हुए हॉकी लीग सेमीफाइनल के लिए क्वालिफाई कर लिया था। उस लीग में 10 टीमों ने हिस्सा लिया था और टॉप 4 टीमें के पास रियो गेम्स के लिए क्वालिफाई करने का मौका था।

उस समय भारतीय टीम युवा खिलाड़ियों से लैस थी और इस टीम को न्यू ज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम और पोलैंड के साथ ग्रुप B में रखा था।

अपने पहले दो मुकाबलों में टीम इंडिया को बेल्जियम और न्यू ज़ीलैंड के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा और उसके बाद मौका मिलते ही उन्होंने पोलैंड को 3-1 से हराकर अपने कारवां को आगे बढ़ाया और अपने हौसले बुलंद रखे। इसके बाद ग्रुप स्तर के आखिरी मैच में ऑस्ट्रेलिया ने भारतीय टीम की हार को राह दिखाई थी।

पोलैंड के खिलाफ जीत ने इस टीम को क्वार्टरफाइनल तक को पहुंचा दिया लेकिन उसके बाद नीदरलैंड ने भारतीय टीम को 7-0 से पस्त कर अपने होने का प्रमाण पेश किया।

उस समय लग रहा था कि भारत का ओलंपिक सपना अधूरा ही रह जाएगा और भारतीय टीम ओलंपिक में जगह बनाने में नाकामयाब हो जाएगी। तब तक साउथ कोरिया और ऑस्ट्रेलिया अपनी-अपनी कॉन्टिनेंटल चैंपियनशिप जीत कर रियो गेम्स के लिए क्वालिफाई कर चुके थे।

ऐसे में इंडियन वुमेंस हॉकी टीम अगर पांचवे और छठे स्थान पर भी अपने कारवां को ले जाते हैं तो भी वह रियो का टिकट ले सकते थे।

क्वार्टरफाइनल में इटली और भारत को हार का सामना करना पड़ा था और अब यह दोनों टीमें आपस में टकराने जा रही थी। इस मुकाबले को भारत ने पेनल्टी की मदद से जीत लिया और पांचवे स्थान के लिए जापान के खिलाफ दो-दो हाथ करने के लिए तैयार थी।

ओलंपिक चैनल से बात करते हे सविता पुनिया ने उन पलों को याद किया और कहा “ग्रुप स्तर पर हम उम्मीद खो चुके थे लेकिन इटली के खिलाफ मिले मौके ने ओलंपिक का टिकट हासिल करने का मौका दे दिया था। इटली के खिलाफ जीत के बाद मैं टीम की शारीरिक भाषा में बदलाव देख सकती थी।”

“हम जानते थे कि हमे जापान के लिए अपना सब कुछ देना है और वह वो टीम थी जिनके खिलाफ पहले हम कड़ा मुकाबला खेल चुके थे। हमारा ध्यान उसी मुकाबले पर था और हम एक दूसरे को कह रहे थे कि कल का दिन हमारा है।”

रियो 2016 का टिकट लेने के लिए सविता पुनिया ने जापान के लिए अदा किया बेहतरीन किरदार।

मुकाबले की शुरुआत बेहद दिलचस्प तरीके से हुई। पहला क्वार्टर ख़त्म होने से ठीक पहले भारतीय टीम ने गोल मारा और बढ़त अपने हाथ में रखी। लेफ्ट फ्लैंक से स्ट्राइकर वंदना कटारिया (Vandana Katariya) ने शानदार शॉट मारा लेकिन जापानी कीपर ने गेंद को गोल के पार नहीं जाने दिया।

इसके बाद कप्तान रानी रामपाल ने रीबाउंड मारा और मुकाबले का पहले गोल करके भारत को 1-0 की बढ़त हासिल करवाई।

अब जापान की टीम किसी भी स्कोर को बराबर करने में जुट गई थी। उन्होंने काउंटरअटैक शुरू किया, विंग्स पर खेल खेला और पेनल्टी कॉर्नर का इस्तेमाल करना चाहा। नाज़ुक मौकों को बुनते हुए सविता पुनिया ने जापानी खिलाड़ियों की गेंद को गोल के पार नहीं जाने दिया और उनसे बेहद कड़े सवाल पूछे।

मुकाबले के अंत में पुनिया ने जापान के बनाए 6 मौकों पर पानी फेरा और अपनी टीम को जीत की राह दिखाई।

पुनिया ने आगे कहा “तब तक मैंने बैकअप गोलकीपर के तौर पर बेंच पर बहुत समय बिताया था और बस टीम के लिए मुकाबले जीतने शुरू ही किए थे। मैं उस मुकाबले को कभी नहीं भूल सकती क्योंकि मैं उस दिन जोन में थी।”

“उस समय मेरा आत्मविश्वास चरम पर था और मुझे लगता था कि मैं किसी भी टीम के खिलाफ खेल सकती हूं।

उस जीत न केवल मनोबल उंचे रखे बल्कि 36 साल बाद भारतीय महिला हॉकी टीम को ओलंपिक का टिकट भी दिया।

सविता पुनिया ने आगे अलफ़ाज़ साझा करते हुए कहा “मैं लोगों के चेहरों पर ख़ुशी देख सकती थी जो कि बहुत से खोई हुई थी। एक साल पहले 2014 एशियन गेम्स के दौरान हम डायरेक्ट क्वालिफिकेशन से चूक गए थे (भारत ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था, और क्व्लैफाई करने के लिए गोल्ड की आवश्यकता थी) तो उसके आबाद जब हमने क्वालिफाई किया तो हम संतुष्ट हो गए थे।

चाहे भारतीय वुमेंस हॉकी टीम के लिए रियो गेम्स का कारवां बेहद खुशनुमा न रहा हो लेकिन अब टोक्यो 2020 में उस संस्करण की सीख ज़रूर काम आएगी।

उस ओलंपिक गेम्स के बाद भारतीय हॉकी टीम ने लाजवाब प्रदर्शन दिखाया है और अब उनसे पहले ओलंपिक मेडल की उम्मीद भी की जा
है।