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नंगे पैर से खेलकर ध्यानचंद ने बर्लिन 1936 ओलंपिक में दिखाया था अपना जादू

बर्लिन ओलंपिक से पहले टीम में आत्मविश्वास की कमी थी, लेकिन भारतीय टीम ने 1936 में अपना तीसरा सीधा ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया।

लेखक विवेक कुमार सिंह ·

1928 और 1932 के ओलंपिक में जीत के बावजूद, 1936 के ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम को हॉकी के खेल में अपना प्रभूत्व जमाना बाकी था।

माना जाता है कि 1932 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक खेलों में ख़राब मैदान पर खेलने के बावजूद अपना दूसरा स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम को बहुत सुधार देखने को मिले।

हालांकि यूरोपीय देश ग्रेट डिप्रेशन के कारण लॉस एंजिल्स 1932 से दूर रहे, तब से चार साल बाद यानी 1936 तक कई गुना सुधार देखने को मिला।

ऐसे में भारत को अपने ताज़ की रक्षा करने की कोशिश करना आसान काम नहीं था। 

हालाँकि, इस बार जादूगर ध्यानचंद (DhyanC hand) के नेतृत्व में भारतीय हॉकी टीम एक साल से 48-मैच जीतकर, जीत की रथ पर सवार थी।

लेकिन 1936 के बर्लिन ओलंपिक के करीब भारतीय टीम को एक टीम से हार का सामना करना पड़ा।

ध्यानचंद की चिंता बढ़ गई 

ओलंपिक के लिए जाने से ठीक पहले, भारतीय टीम को दिल्ली इलेवन से 4-1 से हार का सामना करना पड़ा, जिससे उसकी तैयारियों पर कई सवाल उठाए गए।

1936 के ओलंपिक में हॉकी के जादूगर ध्यानचंद (नीचे से दाएं) को भारतीय टीम की क्षमता पर संदेह हो गया था।

ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा लक्ष्य में लिखा है, '' मैंने कभी भी दिल्ली को हॉकी खेलने वाले सेंटर के रूप में नहीं माना, लेकिन इस दिन वो बेहतरीन खेले और हमें पूरी तरह से मात दी।''

“जब हम अंत में बंबई से रवाना हुए, उससे पहले हम अन्य सेंटर्स का दौरा कर रहे थे, इस हार ने मुझे चिंता में डाल दिया। पहली बार, मैं ओलंपिक टीम की कप्तानी कर रहा था; मैं परेशान था कि कहीं भारत मेरी अगुवाई में खिताब न गवां दे।”

इस डर के साथ ध्यानचंद और भारतीय हॉकी टीम बर्लिन के लिए रवाना हो गई।

एक लंबी और थका देने वाली यात्रा के बाद भारतीय हॉकी टीम हंगरी के खिलाफ अपने पहले गेम से दो सप्ताह पहले बर्लिन में उतरी थी। 

लेकिन भारतीय हॉकी टीम की फॉर्म अभी भी एक चिंता का विषय बनी हुई थी, क्योंकि ओलंपिक के माहौल में जमने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने जर्मन XI के खिलाफ अपना शुरुआती वॉर्म-अप गेम 4-1 से गंवा दिया। 

ओलंपिक - भारत की ओलंपिक इतिहास की पुस्तक, इंडिया स्टोरी, में वार्म-अप मैच के बारे में लिखा गया कि, "हालांकि, दिल्ली से मिली हार को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता था, लेकिन बर्लिन में जर्मन ब्लिट्जक्रेग के खिलाफ मिली हार ज्यादा गंभीर थी।"

"वो अब जानते थे कि वो अजय नहीं रहे और यूरोपीय टीमों को इस बारे में पता चल गया था। इसने टीम के लिए वेक-अप कॉल के रूप में काम किया।” 

ये हार भारतीय टीम के लिए अच्छा नहीं हुआ।

भारतीय हॉकी टीम ने 1936 के बर्लिन ओलंपिक में जीत दर्ज की।

अनुशासन का सख्ति से हुआ पालन

मैनेजमेंट ने अली दारा (Ali Dara) को आगे बढ़ाने का प्रयास करके टीम को मजबूत बनाने में मदद की, जो ध्यानचंद के साथ बर्लिन में पहला मैच खेल चुके थे। लेकिन भारतीय खिलाड़ी को एकजुट होने में बहुत देर हो गई।

इस बीच, जर्मनी में टीम ने दिन में दो बार कठोर अभ्यास और प्रशिक्षण सत्र से गुजरने के बाद अपने स्वाभाविक खेल को खेलने के फैसला किया।

टीम ने अनुशासन के एक सख्त कोड का भी पालन किया जिसमें बिस्तर, भोजन और आराम के लिए निश्चित समय शामिल था।

इन सत्रों ने जल्द ही परिणाम भी दिखाना शुरू कर दिया। खेलों के करीब आने के साथ ही भारतीय हॉकी टीम ने शेष छह वार्म-अप मैचों को जीतकर अपना खोया हुआ आत्मविश्वास भी पा लिया।

ग्रुप ए में हंगरी, संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान को धूल चटाने के बाद, भारतीय टीम ने हॉकी टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में जगह बना ली।

ध्यानचंद के छोटे भाई रूप सिंह (Roop Singh) और महमूद जाफ़र (Mahmood Jaffer) भारतीय हॉकी टीम के ग्रुप स्टेज के स्टार खिलाड़ी थे, जिन्होंने आक्रामक हॉकी खेलकर टीमों के खिलाड़ी बड़ी जीत दर्ज की।

उन्होंने हंगरी के खिलाफ 4-0 से जीत दर्ज की, और संयुक्त राज्य अमेरिका को 7-0 से हराया, जिसमें कप्तान ध्यानचंद, रूप सिंह और महमूद जाफर के 2-2 गोल शामिल थे। जबकि अर्नेस्ट गुड्सिर-कुलेन (Ernest Goodsir-Cullen) ने एक गोल किया।

जापान के खिलाफ, अपने अंतिम ग्रुप मैच में, भारतीय टीम ने अधिकांश समय तक गेम पर अपना दबदबा बना के रखा और अपने स्टिकवर्क का अच्छा उपयोग करके 9-0 की जीत दर्ज कर सेमीफाइनल में प्रवेश किया, जहां एक फ्रांस की टीम उनका इंतजार कर रही थी।

भारतीय हॉकी टीम ने 1936 बर्लिन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी पहली हैट्रिक पूरी की। फोटो: Olympic Archives

बिना दात के नंगे पैर खेले ध्यानचंद

लेकिन इतने शानदार प्रदर्शन के बावजूद, कई लोगों का मानना ​​था कि भारतीय टीम स्वर्ण पदक जीतने में कामयाब नहीं हो पाएगी। काफी हद तक मेजबान जर्मनी को स्वर्ण पदक का दावेदार माना जा रहा था, क्योंकि पिछले वर्षों में उनकी हॉकी टीम ने शानदार प्रदर्शन किया था।

जहां भारत ने ग्रुप ए के अपना सभी मैचों की जीतकर आसानी से सेमीफाइनल में प्रवेश किया, तो वहीं दूसरी ओर जर्मनी ज्यादा आक्रामक हो गई और ग्रुप बी से आगे बढ़ने बढ़ने में सफल रही। 

भारतीय अखबार स्टेट्समैन ने जापान पर भारतीय टीम की जीत के बाद लिखा था कि जर्मनी ने शानदार हॉकी खेली है और अगर भारतीयों को जीतना है तो आज के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करना होगा। 

खबरों को नज़रअंदाज करते हुए भारतीय हॉकी टीम का विजय रथ आगे बढ़ता रहा, जहां भारतीय हॉकी टीम ने सेमीफाइनल में फ्रांस पर 10-0 की जीत के साथ ओलंपिक के फाइनल में जगह बना ली। इस मैच में ध्यानचंद ने चार गोल किए।

फाइनल में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जहां टीम ने सीटी बजने के बाद बमुश्किल की जर्मनों को कोई मौका दिया।

अपनी कप्तानी में स्वर्ण पदक देश को दिलाने वाले ध्यानचंद स्टार खिलाड़ी थे, उन्होंने फाइनल में छह गोल किए थे। जर्मन गोलकीपर टिटो वार्नहोल्ट्ज़ के साथ टकराने के बाद उनके दाँत भी टूट गए थे।

ध्यानचंद इलाज के बाद मैदान पर लौटे और कहा जाता है कि दूसरे हाफ में उन्होंने तेजी से दौड़ने के लिए अपने जूते उतार दिए।

भारत ने ओलंपिक में ओलंपिक स्वर्ण पदकों की अपनी पहली हैट्रिक पूरी की। फाइन में जर्मनी को 8-1 से हराकर जीत हासिल की। हॉकी के जादूगर कैप्टन ध्यानचंद टूर्नामेंट के शीर्ष गोल-स्कोरर रहे। भारतीय हॉकी टीम ने पाँच मैचों में कुल 38 गोल किए और सिर्फ एक गोल होने दिया। 

टीम के मैनेजर स्वामी जगन नाथ ने कहा, "ध्यानचंद ने उस समय दुनिया के सर्वश्रेष्ठ और महान कप्तान की तरह प्रदर्शन किया।" 

"हॉकी खिलाड़ियों द्वारा बहुत सम्मान, स्नेह और प्रशंसा मिलने के बावजूद वो ऐसे खिलाड़ी थे जिसके इर्द-गिर्द पूरी टीम घूमती थी।" 

टीम ने इस स्थान तक पहुंचने और इतिहास रचने के लिए कठिन परिश्रम किया था। 

ये ध्यानचंद का तीसरा और अंतिम ओलंपिक था, और यह तत्कालीन 31 वर्षीय जादूगर के लिए ये रोमांचक भी था।