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टोक्यो 1964: जानिए कैसे भारतीय हॉकी टीम ने पाकिस्तान को धूल चटाकर गोल्ड जीता

1960 के रोम ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में पाकिस्तान से हारकर ख़िताब गंवाने के बाद भारतीय हॉकी टीम ने टोक्यो 1964 में अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वियों को शिकस्त देकर ताज़ एक बार फिर देश के सिर पर सजाया था।

लेखक रितेश जायसवाल ·

हॉकी खेल के शुरुआती वर्षों में सभी पर हावी रहने वाली भारतीय हॉकी टीम के लिए वो एक ऐसा स्वर्णिम दौर था, जिसमें देश ने ओलंपिक में लगातार छह स्वर्ण पदक जीते। लेकिन 1960 के फाइनल में पड़ोसी देश और कट्टर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान से हमें हार का सामना करना पड़ा था।

अपने खोए हुए ताज को हासिल करने के लिए दृढ़ संकल्पित भारतीय हॉकी टीम ने यह सुनिश्चित किया कि चार साल बाद ओलंपिक खिताब हर हाल में देश वापस लौटे।

1964 के टोक्यो ओलंपिक टीम के प्रमुख सदस्यों में से एक हरबिंदर सिंह (Harbinder Singh) ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “1960 में हार के बाद बहुत दबाव था। देश में खेल के लिए इतना जुनून था कि गोल्ड से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं था। ऐसा इसलिए भी था, क्योंकि 1962 के एशियाई खेलों के फाइनल में भी पाकिस्तान ने भारत को हरा दिया था।”

1964 खेलों के लिए टीम का चयन नई दिल्ली में राष्ट्रीय चैंपियनशिप के साथ शुरू हुआ। कोच हबल मुखर्जी के नेतृत्व में जालंधर में एक महीने तक चलने वाले शिविर में 77 खिलाड़ियों को चुना गया। लेकिन इसमें से अंतिम सूची तय करना कई लोगों के लिए एक मुश्किल काम बन गया था।

पूर्व भारतीय फारवर्ड हरबिंदर सिंह ने आगे कहा, “हम उन दिनों पोजिशनल हॉकी खेलते थे और चयनकर्ताओं के लिए खिलाड़ियों की संख्या को कम करना बहुत कठिन था। 77 का शुरुआती समूह पहले 55 और उसके बाद 36 तक कम हो गया था। 18 खिलाड़ियों के अंतिम दल को तीन दिवसीय चयन परीक्षण के बाद तय किया जाना था, लेकिन प्रतियोगिता कुछ इस तरह की थी कि टीम को अंतिम रूप देने से पहले चौथे दिन का भी सामना करना था।"

इसके अलावा टीम के अंदर आपसी असहमति और क्षेत्रवाद से लड़कर उसे भी दुरुस्त करना अभी बाकी था, टोक्यो 1964 के लिए भारतीय हॉकी टीम को सही तरीके से तैयार करना बहुत जरूरी था।

ओलंपिक खेलों से पहले न्यूजीलैंड और मलेशिया के लिए भारतीय टीम के किए गए तैयारी दौरे ने दावे को मजबूत कर दिया, क्योंकि जीत ने ओलंपिक के लिए काफी आत्मविश्वास जगा दिया।

टोक्यो ओलंपिक: भारत में हॉकी के विकास का दौर

1964 के ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के लिए बहुत कुछ आसान हो गया था। एशिया में पहली बार चलाए जा रहे अभियान के चलते हॉकी का खेल यूरोप और दक्षिण पूर्व एशिया में खुद को स्थापित कर चुका था।

इसी बीच विलियम गुड्स-कुलेन, किशन लाल और रिचर्ड कार जैसे पूर्व दिग्गज भारतीय हॉकी खिलाड़ियों ने अन्य टीमों के साथ कोचिंग की भूमिका निभाई। भारतीय लोगों के आगे बढ़ने के साथ भारतीय टीम में अपनी जगह न बना पाने वाले कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को ‘दूसरे’ राष्ट्र की टीमों में शामिल होने का मौका मिलने लगा, जिससे प्रतियोगिता और भी रोमांचक हो गया।

इस दौर में भारत में हॉकी का भी काफी विकास हुआ। खिलाड़ियों ने हॉकी स्टिक के साथ अपनी कुशल कलात्मकता को छोड़कर अपने अधिकतर गोल के लिए शॉर्ट कॉर्नर पर निर्भर न रहते हुए शारीरिक खेल को अपना मुख्य आधार बनाया।

इस परिवर्तन से भारत को यूरोपियों को आगे बढ़ने से रोकने में मदद मिली, लेकिन इसने उनके विरोधियों को उन्हें चुनौती देने के पर्याप्त अवसर भी दिए। और जिस तरह से भारतीय हॉकी टीम अपना बदला लेने के लिए टोक्यो 1964 पहुंची थी, वो सभी को पता था।

कप्तान चरणजीत सिंह के नेतृत्व में भारत ने शुरुआती ग्रुप मैच में बेल्जियम के खिलाफ 2-0 से जीत दर्ज की और इसके बाद ओलंपिक खेलों में उसने अपने पहले ड्रॉ का सामना किया।

जर्मनी के खिलाफ भारतीय हॉकी टीम 20 वें मिनट के बाद पीछे हो गई और यहां तक कि ग्रुप-स्टेज में ही हार की दुर्लभ संभावना नज़र आने लगी। लेकिन चार साल पहले रोम में अपने डेब्यू ओलंपिक में बहुतों को प्रभावित करने वाले पृथ्वीपाल सिंह ने यह सुनिश्चित किया कि उनकी टीम एक पेनल्टी कार्नर के साथ वापसी कर सके।

स्पेन के खिलाफ यह मुक़ाबला 1-1 के परिणाम के साथ ड्रॉ रहा। इसके बाद भारत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार चार जीत दर्ज करते हुए अंक तालिका की शीर्ष टीमों में शुमार होते हुए सेमीफाइनल में पहुंच गया।

डिफेंडर पृथ्वीपाल सिंह 11 गोल करते हुए अपनी शीर्ष फार्म में थे, जबकि हरबिंदर सिंह और जोगिंदर सिंह की फॉरवर्ड लाइन विपक्षी डिफेंडरों को आतंकित कर रही थी।

सेमीफाइनल में लगातार हो रही बारिश भी उन्हें धीमा नहीं कर सकी और भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 3-1 से करारी शिकस्त दी।

इसका जीत का मतलब यह था कि अब भारतीय हॉकी टीम के पास ओलंपिक खिताब को फिर से जीतने का सुनहरा मौका था। मज़ेदार बात यह थी कि इस बार फिर फाइनल में भारत का सामना पाकिस्तान से होना था।

हॉकी गोल्ड मुक़ाबला - भारत बनाम पाकिस्तान

भारत बनाम पाकिस्तान एक ऐसा मैच है जिसके लिए दुनियाभर के हॉकी प्रशंसक काफी उत्सुक नज़र आते हैं। और टोक्यो 1964 में भी हाल कुछ वैसा ही था। प्रतियोगिता में आगे बढ़ने के साथ ही भारत मज़बूत होता जा रहा था।

हालांकि ऑस्ट्रेलिया, ग्रेट ब्रिटेन और मेजबान जापान पर आसान जीत से भले ही भारतीय हॉकी टीम के आत्मविश्वास को बढ़ते हुए देखा गया था, लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती से उनका सामना होना अभी बाकी था।

टोक्यो 1964 ओलंपिक फाइनल में पहुंचने के दौरान पाकिस्तान ने अपने सभी मैच जीते थे।

राजनीतिक मोर्चे पर तनाव बढ़ने के साथ ही ओलंपिक फाइनल के 10 महीने बाद दूसरा भारत-पाक युद्ध छिड़ गया था, इस वजह से कोमाज़वा हॉकी मैदान पर मैच एक खेल से कहीं अधिक था।

भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले इस हॉकी मैच में दोनों ही टीमों के होनहार खिलाड़ियों के हुनर और उनकी कला को देखना वास्तव में बहुत ही रोमांचक और आनंददायी था।

लेकिन टोक्यो 1964 में फाइनल काफी अलग था।

हरबिंदर सिंह ने समझाते हुए कहा, “दोनों टीमों के बीच संबंध बहुत सौहार्दपूर्ण नहीं थे। हम बात करने की शर्तों पर नहीं थे। भारत के खिलाफ पाकिस्तान ने एक बहुत ही गंदा खेल खेला था। उन दिनों कोई टेलीविज़न कैमरा और वीडियो रेफरल नहीं थे, और अंपायरों के लिए सभी बेईमानी और उल्लंघन को स्पॉट करना बहुत मुश्किल था।"

एक समय पर मैच इतना तनावपूर्ण हो गया कि अंपायर को बीच में ही हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने दोनों टीमों को लाइन में खड़ा करके सही से 'व्यवहार' करने को कहा।

हाफ टाइम तक कोई भी गोल नहीं हुआ। भारत ने दूसरे हाफ में पहले गोल के लिए कोशिश की और जल्द ही हाफ टाइम के पांच मिनट बाद एक पेनाल्टी कॉर्नर मिल गया।

हालांकि पृथ्वीपाल सिंह ने स्ट्राइक सर्कल के ऊपर से एक जोरदार प्रहार किया, लेकिन उनके शॉट ने पाकिस्तानी कप्तान मंज़ूर हुसैन के पैर को गोल में ढ़केल दिया, जिससे भारत को पेनल्टी स्ट्रोक लेने का मौका मिला।

इस बार मोहिंदर लाल ने भारतीय टीम को बढ़त दिलाने के लिए इस मौके को भुनाने में कोई गलती नहीं की।

हालांकि, उस वक्त की मौजूदा चैंपियन पाकिस्तान ने गर्जना करते हुए वापसी की और गोल करने के मौके बनाए, लेकिन वो सिर्फ मौके ही बनकर रह गए। क्योंकि चट्टान की तरह खड़े भारतीय गोलकीपर शंकर लक्ष्मण पूरी शिद्दत से मुस्तैद थे, उन्होंने दो पेनाल्टी बचाए और मैन ऑफ द मैच पुरस्कार अपने नाम किया।

भारत ने 12 दिनों में कुल नौ मैच खेले, जिसमें से सात जीते और दो ड्रा रहे। स्वर्ण पदक को हासिल करने वाली इस जबरदस्त जीत का जश्न भारत ने एक पारंपरिक भांगड़ा डांस के साथ मनाया, जिसने रोमांच को चरम पर पहुंचा दिया।

अब जब भारत अगले साल एक और ओलंपिक रोमांच के लिए टोक्यो वापस लौटने की तैयारी कर रहा है, तो ऐसे में 1964 के ओलंपिक खेलों की यादें टीम के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं होंगी।