अभिषेक वर्मा: जिसे तक़दीर ने बनाया एक बेहतरीन शूटर

इंजीनियर से बने वकील और फिर वकील से बने शूटर। इसके बावजूद आज भी वह इसे अपना एक शौक बताते हैं, जो संयोग से उनका करियर बन गया।

भारतीय निशानेबाज़ अभिषेक वर्मा (Abhishek Verma) ने अपने जीवन और करियर के बारे में कभी भी ऐसा नहीं सोचा था, लेकिन उनकी तक़दीर में जो लिखा था वह होकर रहा। वर्मा अपनी तय रणनीति के अनुसार आगे बढ़े; उन्हें बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी की डिग्री पूरी करने के बाद कानून की डिग्री हासिल करने का सपना देखा था।

इसी बीच उनकी पढ़ाई के दौरान ही हरियाणा के इस मूल निवासी को किसी से सुनने को मिला कि हिसार में एक नई शूटिंग रेंज खोली जा रही है। एक्शन फिल्मों के दीवाने वर्मा ने तुरंत फैसला कर लिया कि वह अब वहां जाएंगे।

यह वह समय था जब उनकी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ लिया। यह खेल उन्हें भा गया और जल्द ही वह राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगे।

हालांकि, वर्मा ने 2017 में अपनी कानून की डिग्री के साथ ही इस खेल को जारी रखा। 28 साल की उम्र में उन्होंने शूटिंग के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू किया। ESPN से उन्होंने कहा, “अगर उस समय आपने मुझसे कहा होता कि मैं सिर्फ नेशनल्स में पदक जीत सकता हूं तो मैं रोमांचित हो जाता।”

उसके ठीक ढाई साल बाद अभिषेक वर्मा दो वर्ल्ड कप गोल्ड मेडल, एक एशियन गेम्स ब्रॉन्ज़, टोक्यो ओलंपिक में एक कोटा स्थान और अंतरराष्ट्रीय खेल शूटिंग महासंघ (ISSF) के मुताबिक वह दुनिया में दूसरे सर्वश्रेष्ठ 10मीटर एयर पिस्टल शूटर बनकर उभरे।

जल्द ही पहुंचे टॉप पर 

जब उन्होंने आखिरकार शूटिंग पर अपना पूरा ध्यान देना का मन बना लिया तो इंजीनियर के बाद वकील बने इस होनहार ने गुड़गांव के एकलव्य शूटिंग अकादमी में दाखिला ले लिया। उनकी प्रतिभा हर किसी को प्रभावित कर रही थी और अभिषेक वर्मा ने जल्द ही स्टेट और नेशनल लेवल पर सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। यही नहीं, उन्होंने एक साल बाद ही 2018 में भारतीय शूटिंग के लिए सेलेक्शन ट्रायल में भी अपनी जगह बना ली।

यह सब उसने कर दिखाया था जो शूटिंग को सिर्फ अपना एक शौक़ मानता था। क्योंकि वह वैसे तो साइबरक्राइम में विशेषज्ञता हासिल कर लॉ में अपना करियर बनाना चाहते थे।

हालांकि, वह उस वर्ष राष्ट्रमंडल खेलों के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाए। लेकिन उन्हें बहुत लम्बा इंतज़ार नहीं करना पड़ा और कुछ ही महीनों बाद एशियाई खेलों के लिए उन्हें भारतीय निशानेबाजों के दल में शामिल कर लिया गया।

अभिषेक वर्मा के लिए इस अभियान की शुरुआत अच्छी नहीं रही। वह 10 मीटर एयर पिस्टल टीम स्पर्धा के क्वालिफिकेशन राउंड में ही मनु भाकर के साथ बाहर हो गए, लेकिन उनका पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट उनके लिए जल्द ही बेहतर साबित होने वाला था।

इंडिविज़ुअल 10 मीटर एयर पिस्टल मेंस इवेंट में भारतीय निशानेबाज़ ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। उन्हें विश्वास था कि वह और भी बेहतर कर सकते थे। फर्स्टपोस्ट से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि सब कुछ ठीक चल रहा है और अपने गार्ड को नीचे जाने दिया। मैं तनावमुक्त होकर और पीछे हो गया। इसके बाद मेरे अगले दो शॉट खराब लगे और मैं तीसरे स्थान पर पहुंच गया।”

फिर भी यह उनकी एक बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि वह भारतीय शूटिंग टीम के साथ पहली बार किसी विदेशी दौरे पर गए थे। लेकिन हमवतन सौरभ चौधरी के गोल्ड मेडल जीतने की वजह से वर्मा की यह उपलब्धि उस वक्त बहुत सुर्खियां नहीं बटोर पाई।

शानदार रहा साल 2019

अपने पहले अंतरराष्ट्रीय पदक के बाद अभिषेक वर्मा वास्तव में पूरी तरह से निखरकर सामने आए। उन्होंने उसके बाद दो ISSF वर्ल्ड कप गोल्ड मेडल (बीजिंग और रियो डी जनेरियो) जीते। इतिहास में वह ऐसा करने वाले केवल आठवें भारतीय निशानेबाज़ हैं।

बीजिंग में, 30 वर्षीय यह निशानेबाज़ 2008 के ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता पेंग वेई और ओलेह ओमेलचुक को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष पर रहा। इसी के साथ उन्होंने टोक्यो ओलंपिक के लिए कोटा स्थान भी हासिल किया। देखा जाए तो उनका रियो का प्रदर्शन अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा है।

हालांकि, बीजिंग में 585 अंक उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ रहा और रियो में क्वालिफाइंग दौर में वह केवल 582 अंक ही हासिल कर सके। उन्होंने बाद के प्रदर्शन को अपनी बेहतर उपलब्धि बताई। ESPN से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि मैंने कभी क्वालिफ़ाइंग में इससे अच्छी शूटिंग की है। मेरी तकनीक एकदम सही थी। मैं बिना किसी दबाव और पूरे ध्यान के साथ अपने हर एक शॉट को शूट करने में सक्षम था।”

फाइनल में उन्होंने इस्माएल केल्स (Ismael Keles) के ऊपर एक बड़ी बढ़त हासिल की, लेकिन जल्द ही वह 0.1 अंक पीछे चले गए। क्योंकि वर्मा ने एक अंडरपार 9.6 अंक का शॉट लगाया। हालांकि, अपने अंतिम शॉट के लिए भारतीय शूटर ने पूरी एकाग्रता के साथ अपने मन को शांत और शरीर को स्थिर करते हुए शानदार शॉट लगाया और 10.7 अंक हासिल किए। इस शॉट ने उनके प्रतिद्वंदी को वापसी का कोई मौका नहीं दिया।

इस साल सौरभ चौधरी ने उन्हें कड़ी टक्कर दी और 16 वर्षीय ने नई दिल्ली और म्यूनिख में अन्य दो वर्ल्ड कप पर भी कब्ज़ा कर लिया।

दोनों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा विकसित होने की वजह से कोई भी यह आसानी से सोच सकता है कि उनके बीच में बहुत दूरी होगी, लेकिन यह बिल्कुल उसके विपरीत है।

किसी भी टूर्नामेंट के दौरान यह जोड़ी आमतौर पर रूममेट होती है और इन दोनों के बीच बहुत अच्छी दोस्ती है। स्पोर्टस्टार को उन्होंने बताया, “हम परिवार की तरह हैं। हम जहां भी जाते हैं, साथ-साथ जाते हैं। सामान खरीदते समय भी हम साथ रहते हैं। शाम के समय, हम अभ्यास करते हैं और साथ-साथ ट्रेनिंग भी करते हैं।”

वर्तमान में ISSF की 10 मीटर एयर पिस्टल पुरुषों की रैंकिंग में अभिषेक दूसरे स्थान पर हैं, जबकि सौरभ चौथे स्थान पर हैं। अब ऐसे में इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उनकी बीच की प्रतियोगिता कितनी करीबी है।

अभिषेक वर्मा ने 28 वर्ष की उम्र में शूटिंग पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया। फोटो साभार: ISSF
अभिषेक वर्मा ने 28 वर्ष की उम्र में शूटिंग पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया। फोटो साभार: ISSFअभिषेक वर्मा ने 28 वर्ष की उम्र में शूटिंग पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया। फोटो साभार: ISSF

ओलंपिक मेडल पर होगी नज़र

बीते दो साल अभिषेक वर्मा के लिए काफी अच्छे रहे हैं, क्योंकि वह हर साल एक स्तर ऊपर उठते रहे हैं। ऐसे में टोक्यो 2020 में एक ओलंपिक पदक जीतकर वह अपनी इस तरक्की को एक नया मुक़ाम दे सकते हैं।

हालांकि, परिस्थितियों ने टोक्यो ओलंपिक को साल 2021 में आयोजित करने के लिए मजबूर कर दिया है और यह भारतीय निशानेबाज़ इस देरी के कारण से भंलीभांति अवगत हैं। उन्होंने प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) से कहा, “शिखर पर पहुंचना और फिर उस जगह को बरकरार रखना, मेरी एकाग्रता और फोकस के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण होने वाला है। हालांकि, यह हमें और समय देता है, एक साल बहुत लम्बा समय होता है”।

निश्चित रूप से वर्मा के मामले में - 'आकस्मिक शूटर' कहना सही होगा। उनके छोटे से शूटिंग करियर के मद्देनज़र एक साल का समय वाकई काफी लम्बा है। अब उन्हें इस खेल में खुद को पूरी तरह से समर्पित किए हुए तीन साल हो गए हैं, ऐसे में उनका तेज़ी से तरक्की करना और शौक़िया खेल को अपना पेशेवर करियर बनाना अगले साल होने वाले ओलंपिक खेलों में एक अच्छा अंत और एक नई शुरुआत दे सकता है।

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