शांत दिमाग़ वाले विजय कुमार ने भारत को दिलाया था ओलंपिक में पहला पिस्टल पदक

2012 के लंदन खेलों में भारतीय निशानेबाज विजय कुमार का रजत पदक पिस्टल स्पर्धा में भारत का पहला ओलंपिक पदक था।

लंदन 2012 में विजय कुमार (Vijay Kumar) के रजत पदक जीतने के पहले ही भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शूटिंग का हब कहा जाने लगा था। क्योंकि उनसे पहले पिछले दो ओलंपिक में राजवर्धन सिंह राठौर (Rajyavardhan Singh Rathore) और अभिनव बिंद्रा (Abhinav Bindra) ओलंपिक में भारत को पदक दिला चुके थे।

जबकि बीजिंग 2008 में गगन नारंग (Gagang Narang) भी ओलंपिक पदक जीतते जीतते रह गए थे, लेकिन लंदन 2012 में उन्होंने मौक़े को ज़ाया नहीं करते हुए देश के नाम उस ओलंपिक का पहला पदक दिला दिया था। गगन के पदक जीतने के बाद विजय कुमार ख़ुद पर दबाव महसूस करने लगे थे, लेकिन उन्होंने भी रजत के साथ देश का नाम रोशन किया।

भारत के इस शूटर ने अहम मौक़े पर संयम बरक़रार रखा और आख़िरी चार सेकंड्स में सबकुछ भूलते हुए निशाना केवल लक्ष्य पर ही लगाया। विजय 25 मीटर रैपिड फ़ायर पिस्टल में बहुत क़रीब से स्वर्ण पदक से ज़रूर चूक गए थे लेकिन देश के लिए रजत पदक जीत गए। इतना ही नहीं उन्होंने ओलंपिक इतिहास में भारत के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन में अपना अहम योगदान दिया।

कम उम्र में ही हो गया था शूटिंग से प्यार

पूर्व आर्मी जवान के सुपुत्र, विजय कुमार के लिए शूटिंग में प्यार बेहद कम उम्र से ही झलकने लगा था। लेकिन उन्होंने पहली बार इसमें हाथ तब आज़माया जब वह ख़ुद 2011 में भारतीय आर्मी का हिस्सा बने।

विजय कुमार को कुछ साल बाद आर्मी मार्कस्मैनशिप यूनिट में भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने रूसी कोच पावेल स्मिरनोव की देख-रेख में ट्रेनिंग शुरू की।

मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे सेना में अपने समय के दौरान शूटिंग करने का मौका मिला और मुझे खेल में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए उनका समर्थन मिला, जिसकी बदौलत मैं यहां तर पहुंच पाया - विजय कुमार

विजय कुमार ने भी अपनी प्रतिभा के साथ इंसाफ़ करते हुए 2006 कॉमनवेल्थ गेम्स में दो स्वर्ण पदक जीता और फिर उसी साल 25 मीटर पिस्टल में एशियन गेम्स में भी कांस्य पदक पर कब्ज़ा जमाया।

विजय कुमार को बहुत कम उम्र में ही हो गया था शूटिंग से प्यार। 
विजय कुमार को बहुत कम उम्र में ही हो गया था शूटिंग से प्यार। विजय कुमार को बहुत कम उम्र में ही हो गया था शूटिंग से प्यार। 

2007 में हुई एशियन चैंपियनशिप में वह दूसरे स्थान पर रहे और 2008 में होने वाले बीजिंग ओलंपिक के लिए तैयारी शुरू कर दी।

हालांकि विजय कुमार को चिकन पॉक्स से जूझना पड़ा और उनके ओलंपिक डेब्यू पर असमंजस के बादल मंडराने लगे।

विजय कुमार ने कहा कि, "मैं लगभग दो महीने तक शूटिंग नहीं कर सका और जब मैं रेंज में लौटा, तो मेरे फिटनेस में कमी थी। ओलंपिक में हार को पचाना मुश्किल था।”

ठीक होने के बाद, भारतीय निशानेबाज विजय कुमार ने 2009 में ISSF वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर एक मजबूत वापसी की।

2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में, उन्होंने तीन स्वर्ण पदक जीते, जिसमें रैपिड फायर और सेंटर फायर पिस्टल सिंगल्स इवेंट शामिल थे।

एशियाई खेलों में कांस्य और 2011 ISSF विश्व निशानेबाजी चैंपियनशिप में रजत ने ये सुनिश्चित किया कि विजय कुमार का ओलंपिक वर्ष बहुत अच्छा जाने वाला है।

उन्होंने लंदन में 2012 के लिए भारतीय निशानेबाजों की टीम बनाई थी, लेकिन सबसे कठिन समय अभी आना बाकि था।

लंदन में सपना हुआ साकार

25 मीटर पिस्टल में विजय कुमार को महारत हासिल हो गई थी, क्योंकि अब तक उनके सारे अंतर्राष्ट्रीय पदक इसी श्रेणी में आए थे।

लंदन 2012 में भी इस शूटर ने बेहतरीन अंदाज़ में आग़ाज़ किया और प्रारंभिक राउंड में उन्होंने 600 में 585 अंक हासिल किए थे। लेकिन अगर फ़ाइनल में वह अच्छा प्रदर्शन नहीं करते तो इस स्कोर का कोई मतलब नहीं रह जाता।

दरअसल, इंटरनेशनल स्पोर्टस शूटिंग फ़ेड़रेशन (ISSF) ने नियम बदलते हुए ये कर दिया था कि फ़ाइनल स्टेज में लिए गए अंक ही फ़ाइनल टैली में जोड़े जाएंगे। जबकि इससे पहले प्रारंभिक राउंड के स्कोर को भी फ़ाइनल टैली में जोड़ा जाता था

ये बदलाव एलेक्सी क्लिमोव (Alexei Klimov) के लिए घातक रहा और वह प्रारंभिक राउंड में 592 अंक हासिल करने के बावजूद पदक वाले मुक़ाबले से बाहर हो गए थे। लेकिन यहां पर विजय कुमार ने अपने ऊपर दबाव नहीं हावी होने दिया और अच्छे प्रदर्शन के साथ पदक की दावेदारी में बने रहे।

मैंने पिछले डेढ़ साल से इस पल के लिए ट्रेनिंग ली थी, जब से नियम बदले गए। यह मेरी ताकत थी और मुझे पता था कि मैं इस जगह तक पहुंचा सकता हूं। - विजय कुमार

फ़ाइनल राउंड में विजय ने क्यूबा के लीरस पुपो (Leirus Pupo) के ख़िलाफ़ अपना सर्वश्रेष्ठ तो दिया लेकिन क्यूबियाई शूटर ने इतनी बढ़त हासिल कर ली थी कि विजय यहां से सभी के सभी पर्फ़ेक्ट स्कोर भी करते तो स्वर्ण पदक नहीं जीत पाते।

लेकिन विजय इससे हतोत्साहित नहीं हुए और संयम के साथ निशाना लगाते हुए रजत पदक पर कब्ज़ा जमा लिया था, और वह भी अपने पहले ही ओलंपिक में शामिल होते हुए। विजय के लिए ये एक सपने का साकार होने जैसा था, जो उन्होंने ज़िंदगी भर देखा था।

लंदन 2012 25m रैपिड फायर पिस्टल पोडियम (L-R): रनर-अप विजय कुमार, विजेता लेयर्स प्यूपा, तीसरा स्थान डिंग फेंग 
लंदन 2012 25m रैपिड फायर पिस्टल पोडियम (L-R): रनर-अप विजय कुमार, विजेता लेयर्स प्यूपा, तीसरा स्थान डिंग फेंग लंदन 2012 25m रैपिड फायर पिस्टल पोडियम (L-R): रनर-अप विजय कुमार, विजेता लेयर्स प्यूपा, तीसरा स्थान डिंग फेंग 

सातवें राउंड में विजय कुमार ने सिल्वर पर कब्जा करने के लिए चीन के फेंग के तीन की तुलना में चार का स्कोर किया और पुपो को अंतिम राउंड में दो से पीछे कर दिया। क्यूबा के शूटर ने फाइनल में चार स्कोर के साथ अपना गोल्ड सुनिश्चित कर लिया। जहां विजय कुमार को सिल्वर से संतोष करना पड़ा।

हालाँकि, उनके पहले खेल ओलंपिक पदक ने एक आजीवन सपने को साकार किया। लेकिन पोडियम पर उनका शांत रूप देखकर कोई नहीं कह सकता था कि उन्होंने अभी क्या हासिल किया है।

वो अपने पदक जीतने के जश्न को अपने पूरे परिवार के साथ मनाना चाह रहे थे।

भारतीय शूटर ने इस ऐतिहासिक जीत को लेकर कहा कि, ‘’इससे पहले भी मैंने कई पदक जीते थे, लेकिन ये कुछ ऐसा था जो हमेशा से मेरी ख़्वाहिश थी। ओलंपिक पदक जीतने से बढ़कर और कुछ नहीं है।‘’

विजय कुमार की ज़िंदगी इस पदक जीतने के बाद भी बेहद साधारण रही, उन्हें सुबेदार मेजर बना दिया गया था। इसी पद पर से उन्हें 2017 में भारतीय आर्मी से सेवानृवति मिली, जिसके बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और अब उनके पास बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन की स्नातक डिग्री है।

हालांकि आगे आने वाले सालों में विजय कुमार ने एक साधारण ज़िंदगी जीना ही मुनासिब समझा, लेकिन देश हमेशा उनके द्वारा ओलंपिक में पहला पिस्टल पदक जीतने के लिए उनपर गर्व करता है और दूसरों के लिए विजय अब एक प्रेरणास्रोत हैं।

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