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लंदन 2012 में ब्रॉन्ज़ पर निशाना लगाकर गगन नारंग ने बीजिंग की निराशा को किया दूर

भारतीय निशानेबाज़ ने बीजिंग की निराशा को दूर किया और लंदन 2012 के फाइनल राउंड में देश के लिए शूटिंग में पदक की एकमात्र उम्मीद बने।

लेखक रितेश जायसवाल ·

गगन नारंग (Gagan Narang) 2008 के बीजिंग ओलंपिक खेलों में पदक हासिल करने से चूक गए, जो उनके लिए एक कड़वी गोली के समान रहा। वह काफी अच्छी फॉर्म में चल रहे थे और जब बीजिंग में हुए ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों के फाइनल में भी वह जगह नहीं बना पाए तो काफी निराश हुए।

यह भारतीय निशानेबाज़ ओलंपिक में हिस्सा लेने से पहले शानदार फॉर्म में थे। 2016 के राष्ट्रमंडल खेलों में चार स्वर्ण पदकों के साथ उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ चुका था।

बीजिंग में नहीं बन पाए हीरो

गगन नारंग ने 2006 में एयर राइफल वर्ल्ड कप में स्वर्ण पदक जीतकर बीजिंग ओलंपिक खेलों में अपनी जगह पक्की की। इतना ही नहीं, उन्होंने जर्मनी में एक प्री-ओलंपिक इवेंट में एयर राइफल में 704.3 अंको के स्कोर के साथ एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाया हैं। इसके बाद हैदराबाद का यह शूटर 2008 की शुरूआत में चीन में हुए विश्व कप में स्वर्ण जीतने के बाद 2008 आईएसएसएफ वर्ल्ड कप फाइनल के लिए भी क्वालिफाई करने में सफल हुए।

इसलिए, आप समझ सकते हैं कि उनके दिल को इस हार से कितना बड़ा झटका लगा होगा। वो फाइनल राउंड में जगह बना पाने से चूक गए। हालांकि उन्होंने 600 में 595 अंक हासिल किए थे।

"ये मुश्किल था," उन्होंने स्वीकार किया। "मैंने अपने 42वें शॉट में 8.9 की शूट किया और 8.9 और 9 के बीच का अंतर न के बराबर था।"

निराशा से निपटना प्रत्येक एथलीट के करियर का एक अभिन्न हिस्सा है, गगन नारंग ने खुद को सबसे अधिक प्रभावित पाया, क्योंकि उन्होंने हमवतन अभिनव बिंद्रा (Abhinav Bindra) को इतिहास बनाते देखा। कहने के लिए कुछ तो अच्छा हुआ।

बंदूक उठाने वाले गगन नारंग के लिए इतिहास रचना सब कुछ था। जिसका सपना गगन नारंग ने गुब्बारे की शूटिंग के दौरान दो साल के एक बच्चे के रूप में देखा था, वो बाद में दिल टूटने का कारण बन गया।

गगन नारंग ने खुलासा किया कि, “मैं सदमे और नकारात्मकता की स्थिति में था। जब मैं घर वापस आया, तो मैंने बंदूक को नहीं छुआ और मुझे बहुत मुश्किल स्थिति का सामना करना पड़ा।”

"मैं कुछ दिनों तक सही से सो नहीं सका और मैं अपनी नींद में जाग जाता था।"

बीजिंग गेम्स में गगन नारंग फाइनल राउंड में पहुंचने से बहुत कम अंतर से चूके 

जेम्स बॉन्ड और उनकी वाल्थर राइफल के बड़े प्रशंसक रहे हैं। जिस तरह बॉन्ड का किरदार अपनी असफलताओं से सीख लेकर उन्हें जीत में बदलने के जज़्बे से आगे बढ़ता है, ठीक उसी तरह गगन नारंग ने भी निराशा के इस पन्ने को अपनी किताब से बाहर करने की ठान ली थी। बीजिंग 2008 से लौटने के एक सप्ताह बाद ही उन्होंने इस निराशा से उबरने के लिए अपने प्रयास शुरू कर दिए।

लंदन 2012 का सफर

2008 में ISSF वर्ल्ड कप फ़ाइनल में स्वर्ण के साथ एक्शन में उनकी वापसी ने 600 के परफेक्ट स्कोर के साथ फाइनल में 703.5 का नया विश्व रिकॉर्ड बनाया।

गगन नारंग ने कहा कि, 'मैंने इस बार एक भी अंक नहीं छोड़ा और मुझे एक सही स्कोर हासिल करना था। जिसने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्ररित किया।"

उन्होंने 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में स्वर्ण के साथ-साथ आईएसएसएफ विश्व कप 2009 में 50 मीटर राइफल 3 पोजिशन में कांस्य पदक जीता।

आने वाले सालों में वो ISSF वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप के स्वर्ण पदक विजेता बने और 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में चार और स्वर्ण पदक और एशियाई खेलों में दो रजत पदक अपने नाम किया।

गगन नारंग के प्रयासों को भारत सरकार ने भी सराहना की, जहां 2011 में उन्हें देश के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

हालांकि, इन सभी सफलताओं के बावजूद, बीजिंग 2008 की निराशा अभी भी उनके भीतर जल जल रही थी।

2008 के ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता और हमवतन अभिनव बिंद्रा के लंदन ओलंपिक 2012 में अंतिम दौर से पहले बाहर हो जाने के बाद गगन पर दबाव बढ़ गया था।

चार साल पहले किस्मत में जो उलटफेर हुआ था, उसमें गगन नारंग ने खुद को सुर्खियों में पाया था, जैसा कि अभिनव बिंद्रा ने देखा था।

जो 100 करोड़ लोल अभिनव बिंद्रा से पदक जीतने की उम्मीद कर रहे थे, अब उन सबकी नज़रे गगन नारंग पर जा टिकी।

उन्होंने ओलंपिक चैनल से कहां कि, “उम्मीदों से बहुत ज्याद दबाव था। मैं ये नहीं कहूंगा कि दबाव बुरा है; मेरे खयाल से इसने मुझे बेहतर प्रदर्शन करने में मदद की। लेकिन जब मैं बीजिंग में फाइनल में शूटिंग के दौरान हार गया था, उसके बाद से मुझ पर दबाव वास्तव में बन रहा था।”

“मुझे ड्राइंग बोर्ड पर वापस जाना था और अपने ओलंपिक सफर को फिर से शुरू करना था। हर स्तर पर, मैंने अपने कौशल को बेहतर किया।”

बीजिंग की निराशा को दूर करने के अपने दृढ़ संकल्प के साथ इस बार गगन नारंग को ओलंपिक पदक जीतने से कोई नहीं रोक सकता था। फाइनल में उन्होंने जबरदस्त प्रदर्शन किया और हर राउंड के शॉट लेने के साथ ही लोगों की धड़कने ऊपर-नीचे होने लगीं। शीर्ष तीन नीशानेबाज़ों के हर शॉट के बाद अंकों में बदलाव के चलते रैंकिंग बदल रही थी। शूटिंग का रोमांच अपने चरम पर था।

ओलंपिक सपने को किया पूरा

हालांकि, गगन नारंग की टक्कर चीन के वांग ताओ के साथ चल रही थी, जो फाइनल में उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे थे। अंततः रोमानिया के एलिन जॉर्ज मोल्दोवेनु (Alin George Moldoveanu) और इटली के निकोलो अरियानी (Niccolo Campriani) के पीछे रहते हुए उन्होंने कांस्य पदक जीत़ा। यह 2012 के ओलंपिक में भारत का पहला पदक था और गगन नारंग के लिए एक बड़ी जीत थी।

ओलंपिक कांस्य पदक विजेता बनने के बाद उन्होंने कहा, "यह एकमात्र ‘पदक’ है जो मेरे पदकों के संग्रह में अभी तक नहीं था, और अब मैं इसे वहां पर रख सकता हूं।"

गगन नारंग ने पहले से ही ढेर सारी पदकों और ट्रॉफी को अपने कैबिनेट में रखा है और राष्ट्रीय खेल आइकन हैं, जो अपूर्वी चंदेला (Apurvi Chandela) जैसे भविष्य के सितारों के लिए प्रेरणा हैं और 'गगन नारंग स्पोर्ट्स प्रमोशन' के माध्यम से एलावेनिल वलारिवन (Elavenil Valarivan) जैसे प्रभावशाली युवा देश के शूटिंग भविष्य को सुनहरा बनाने का सपना दिखाती हैं।

हालांकि, कुछ भी कभी भी उस प्रतिष्ठित पदक की जगह नहीं ले सकता था, इसलिए नहीं कि उन्होंने भारत को शूटिंग में पदक दिलाया हो, बल्कि इसलिए क्योंकि इस पदक ने उनके सपने को पूरा कर दिया था।