ज़िंदगी की बाधाओं को किया पार: अविनाश साबले का स्टीपलचेज़ रनर बनने से लेकर ओलंपिक तक का सफ़र

इस आर्मी मैन ने 2016 में क्रॉस कंट्री से लंबी दूरी की दौड़ लगाई और चार बार राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा। इसी के साथ उन्होंने अपने पहले ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया।

ज्यादातर एथलीट कम उम्र में करियर शुरू करते हैं। वहां बच्चें कड़ी मेहनत करते हैं और कई प्रतियोगिता के लिए ट्रैवल करते हुए अपने बचपन का बलिदान दे देते हैं। ये सभी इसलिए ऐसा करते हैं ताकि 4 साल में एक बार होने वाले ओलंपिक में हिस्सा लेकर मेडल जीत सकें। वहीं अविनाश साबले (Avinash Sable) का सफर महज़ कुछ सालों पहले ही शुरू हुआ है।

उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए कहा, "आज मैं जो कुछ भी हूं, वह इंडियन आर्मी की वजह से हूं। मेरा कोई भी स्पोर्ट बैकग्राउंड नहीं था।"

महाराष्ट्र में बीड जिले से तालुल्क रखने वाले भारतीय स्टीपलचेज धावक सीमित साधनों के साथ बड़े हुए। उनके माता-पिता दोनों ही किसान थे और वे काफी मुश्किल हालातों को पार करते हुए यहां पहुंचे। यहां तक कि उन्हें स्कूल जाने के लिए हर दिन छह किलोमीटर का सफर तय पड़ता था।

अविनाश साबले ने कम उम्र में ही आर्मी में जाने का फैसला कर लिया था, ताकि वह अपने परिवार की मदद कर सके। 12वीं कक्षा खत्म करने के बाद वह 5 महार रेजिमेंट का हिस्सा बनें, इसके बाद उनकी तैनाती सियाचिन और राजस्थान में हुई

ये युवा सियाचिन जैसी सर्दी वाली जगह पर भी दो साल रहा, जहां तापमान माइनस में रहता है, वहीं राजस्थान के रेगिस्तान में उनकी तैनाती हुई, जहां गर्मी 50 डिग्री तक पहुंच जाती है।

स्टीपलचेज में रखा कदम

यह साल 2015 था, जब अविनाश साबले स्पोर्ट्स रनिंग में नई कला सीख रहे थे। इसके बाद उन्होंने आर्मी एथलीट्स प्रोग्राम में हिस्सा लिया। इसके बाद उनका चयन क्रॉस कंट्ररी कॉम्पिटिशन में हो गया, जहां पर सभी ने उनकी प्रतिभा देखी।

इस भारतीय एथलीट ने केवल एक साल की ट्रेनिंग ली लेकिन इसके बावजूद वह उस टीम का हिस्सा थे जिसने प्रतियोगिता जीती। वहीं व्यक्तिगत राष्ट्रीय क्रॉस कंट्री चैम्पियनशिप में वह पांचवें स्थान पर रहे।

इसके बाद अविनाश को चोट लग गई, जिसके कारण वह ट्रेनिंग नहीं कर पाए और उनका वजन काफी बढ़ गया। आर्मी ने कुछ लोगों ने उन्हें बीता हुआ बता दिया था लेकिन उनकी चाहत ने उन्हें फिर खड़ा किया।

24 साल के इस खिलाड़ी ने इसके बाद 15 किलो से भी ज्यादा वजन कम किया और दोबारा रनिंग करना शुरू कर दिया। 2017 में एक रेस के दौरान आर्मी कोच अमरीश कुमार ने उनकी प्रबलता को नोटिस किया और उन्हें स्टीपलचेज कैटेगिरी के लिए आमंत्रित किया।

अमरीश कुमार ने स्क्रॉल.इन से बातचीत करते हुए कहा, उनके पास एक ग्रामीण क्षेत्र से आने के कारण ताकत और धीरज था। वह क्रॉस-कंट्री में बहुत अच्छा था और जब मैंने प्रशिक्षण में उसकी छलांग देखी, तो हमने उन्हें स्टीपलचेज़ में स्थानांतरित करने का फैसला किया।" अब बिना किसी संकोच के कह सकते हैं कि उनका ये फैसला बिल्कुल सही रहा।

रैंकों के माध्यम से वृद्धि

2017 के फेडरेशन कप में पांचवें स्थान पर रहे, अविनाश साबले तुरंत ही सबकी नजर में आ गए। फिर बाद में चेन्नई में ओपन नेशनल में स्टीपलचेज राष्ट्रीय रिकॉर्ड से वह केवल नौ सेकंड दूर रह गए थे, हालांकि जल्दी ही उन्होंने ये कमी भी दूर कर दी।

भारतीय आर्मी में हवलदार अविनाश ने ईएसपीएन से बातचीत के दौरान बताया, "स्टीपलचेज़ एक बहुत ही सामरिक दौड़ है। इसलिए ज्यादातर बार, मुझे बताया गया था कि भारत में इस रिकॉर्ड को तोड़ना संभव नहीं है क्योंकि कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो भारत में इस तरह की गति निर्धारित कर सके। इसलिए मुझे अपने लिए भी गति निर्धारित करनी पड़ी।"

अपने आलोचकों को कई बार गलत साबित करने के बाद एक बार फिर उन पर सवाल उठने लगे। साल 2018 की शुरुआत के दौरान उन्हें ट्रेनिंग के समय टखने में चोट लग गई, जिसके बाद वह एशियन गेम्स मे क्वालिफाई करने में असफल रहे।

हालांकि, बहुत ही जल्दी उन्होंने वापसी की और इस बार उनका सपना हकीकत में तब्दील हो गया। साल 2018 में भुबनेश्वर में हुए ओपन नेशनल्स में अविनाश साबले ने 3000 मीटर की दूरी 8:29.88 में पूरी की और इसके साथ ही 30 साल पुराना रिकॉर्ड भी तोड़ दिया।

ओलंपिक का सफर

इसके बाद अविनाश को कुछ परेशानी का भी सामना करना पड़ा। रूसी कोच निकोलाई सेंसारेव के कठोर तरीके उनकी शैली के अनुरूप नहीं थे और उन्होंने कुछ समय के लिए हार मान ली।

इसके बाद उन्होंने अपने फैसले को बदलते हुए सेंसारेव से दूरी बना ली और एक बार फिर अपने परिचित अमरीश कुमार के पास आ गए। इसके बाद इन कोच और खिलाड़ी ने जोड़ी ने कड़ी ट्रेनिंग की, यही नहीं अपनी गति बढ़ाने के लिए उन्होंने कई तरह के माहौल में ट्रेनिंग की।

इसका असर ये हुआ कि पिछले साल की शुरुआत में पटियाला में फेडरेशन कप में दूसरी बार राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया। वह अपने पिछले रिकॉर्ड की तुलना में लगभग एक सेकंड तेज 8: 28.94 का समय निकालने में सफल हुए। इसी का साथ उन्होंने ने दोहा में हुई आईएएएफ वर्ल्ड चैंपियनशिप (IAAF World Championships) में हिस्सा लिया।

इसी के साथ अविनाश साबले भारतीय एथलीट्स फोल्कलोर का हिस्सा बन गए। इस खिलाड़ी ने दो बार खुद का ही रिकॉर्ड तोड़ा। हीट में, वह अपने राष्ट्रीय रिकॉर्ड समय की तुलना में तीन सेकंड तेजी से भागे लेकिन यह विवाद के साथ आया।

दरअसल शुरुआत में फाइनल के लिए क्वालीफाई नहीं किया था, लेकिन एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एएफआई) ने सफलतापूर्वक एक साथी धावक द्वारा उनकी बाधा की अपील की जिससे उन्हें अंतिम चरण में प्रवेश करने की अनुमति मिली।

आर्मी मैन ने फाइनल में 8: 21.37 के समय के साथ एक बार फिर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बेहतर किया और टोक्यो ओलंपिक में पहली बार हिस्सा लेने का अवसर प्राप्त किया।

अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर अविनाश साबले 1952 में गुर्जर सिंह के बाद से स्टीपलचेज में क्वालीफाई करने वाले पहले भारतीय बन गए।

इसी के साथ उन्होंने अपने लक्ष्य की तरफ पहला कदम बढ़ा दिया है। अब ये उन पर निर्भर करता है कि अतिरिक्त समय का वह कैसे फायदा उठाते हैं और हम यही उम्मीद करते हैं कि वह दुनिया के सबसे बड़े मंच पर मेडल जीत देश का नाम रोशन करें।

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