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इंडियन वॉलीबॉल टीम: बड़े नामों से लैस और एशियन गेम्स में मिली सफलताएं

भारतीय वॉलीबॉल टीम ने एशियन गेम्स में तीन मेडल हासिल कर अपने नाम का लोहा मनवाया है।

लेखक जतिन ऋषि राज ·

भारत में खेल को सराहा जाता है और देखते ही देखते खेल से जुडी सभी चीज़ें इस मुल्क में इज्ज़त कमाने लगती हैं। वॉलीबॉल का खेल भी भारत के कई राज्यों में खेला जाता है और अपनी पहचान बनाए हुए इस खेल को भारत में 70 साल हो गए हैं।

हालांकि भारत इस खेल के माध्यम से कभी भी ओलंपिक गेम्स में प्रवेश करने में सफल नहीं हुआ है लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर ज़रूर कुछ महारत हासिल हुई हैं।

वॉलीबॉल का भारतीय इतिहास

वॉलीबॉल भारत में शौकिया तौर पर तो खेला जाता था लेकिन स्वतंत्रता से पहले 1936 में इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन (Indian Olympic Association IOA) ने पहली इंटरस्टेट चैंपियनशिप कराई। इसके बाद 1951 में इस खेल का ढांचा तैयार किया गया और इसे नाम दिया गया वॉलीबॉल फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (Volleyball Federation of India VFI)।

इसके अगले ही साला यानी 1952 में सीनियर नेशनल चैंपियनशिप (Senior National Championship) की पहली प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इसके बाद कई युवाओं ने इस खेल में रूचि दिखाई और भारत को नया कौशल देखने को मिला और इस तरह बनी भारतीय वॉलीबॉल टीम।

एशियन गेम्स में भारत की सफलता

भारतीय वॉलीबॉल टीम का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेज़ी से हुआ जब उन्होंने 1955 एशियन चैंपियनशिप का खिताब हासिल कर लिया। यहां से इस टीम का कारवां बढ़ता ही चला गया और इसके बाद भारत ने 1958 एशियन गेम्स पर भी अपने नाम की मुहर लगा दी।

वॉलीबॉल पहली बार उसी संस्करण में शामिल किया गया था, और भारतीय पुरुष वॉलीबॉल टीम ने दिग्गज गुरुदेव सिंह के नेतृत्व में कांस्य पदक जीतने में क़ामयाब रही थी।

भारतीय वॉलीबॉल टीम ने हांगकांग और फिलिपींस को 3 सीधे सेटों से मात दी लेकिन ईरान और जापान को पछाड़ने में असफल रहे। इसके बाद जकार्ता में हुए 1962 एशियन गेम्स में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए दिग्गज खिलाड़ी नृपजीत सिंह बेदी (Nripjit Singh Bedi) और ए पलानीसामी (A Palaniswamy) को अर्जुन आवर्ड से भी सम्मानित किया गया। गौरतलब है कि उस समय भारतीय वॉलीबॉल टीम के कप्तान थे टीपी पद्मनाभन नायर (TP Padmanabhan Nair)।

भारतीय वॉलीबॉल टीम के दिग्गज तस्वीर साभार: जिम्मी जॉर्ज फाउंडेशान/फेसबुक 

देखते ही देखते इस खेल में भारत की पकड़ मज़बूत होती जा रही थी और इस संस्करण की शुरुआत ही भारत ने लगातार 4 जीत के साथ की। जिसमे दो जीत बर्मा के खिलाफ, एक कम्बोडिया और एक पाकिस्तान के खिलाफ आई थी। इस बार फिर भारत की अपने कड़े प्रतिद्वंदी जापान से टक्कर हुई लेकिन इस बार फिर भारत को 12-15 से हार का मुंह देखना पड़ा था।

भारतीय खिलाड़ियों की रगों में जोश और खेल में तकनीक झलक रही थी। इंडोनेशिया और कोरिया को मात देने के बाद इस टीम के हाथ सिल्वर मेडल आया। इसके बाद ढलान देखने को मिली और 1966 और 1974 एशियन गेम्स में चौथे और पांचवें पायदान पर अपने कारवां का अंत किया और 1970 के संस्करण का भारत हिस्सा नहीं था।

नई दिल्ली में हुई 1978 एशियन गेम्स में भी भारतीय वॉलीबॉल टीम का स्थान 7वें नंबर पर रहा।

1978 और अपने घर में हुए 1982 एशियन गेम्स में एक बार फिर भारत के प्रदर्शन में सुधार हुआ, हालाँकि बेहद क़रीबी अतंर से वह पदक से चूक गए और चौथे स्थान पर प्रतियोगिता ख़त्म की।

लेकिन पदक का ये इंतज़ार जल्दी ही ख़त्म हो गया।

भारतीय वॉलीबॉल टीम के कोहिनूर

सियोल में आयोजित 1996 एशियन गेम्स में भारतीय टीम ने लाजवाब प्रदर्शन किया और सभी का मन मोह लिया। सिरिल वल्लूर (Cyril Valloor), की अगुवाई में टीम में जीई श्रीधरन (GE Sridharan), के उदयकुमार (K Udayakumar) जैसे खिलाड़ी भी थे और इन सभी ने अपने कौशल का प्रमाण पेश किया। अब्दुल बासित (Abdul Basith), दलेल सिंह (Dalel Singh) और पीवी रमाना (PV Ramana) (भारतीय बैडमिंटन स्टार पीवी सिंधु के पिता) जैसे सूरमाओं से लैस इस टीम ने दर्शकों के दिलों में जगह बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यह सभी खिलाड़ी अर्जुन अवार्ड विजेता हैं और इन सब में सबसे ख़ास रहे जिम्मी जॉर्ज (Jimmy George) जिन्हें अवार्ड के साथ-साथ दुनिया का प्यार भी मिला था।था।

लेट जिम्मी जॉर्ज अभी भी भारतीय वॉलीबॉल के सर्वश्रेष्ठ कप्तानों में से एक रहे हैं। तस्वीर साभार: जिम्मी जॉर्ज फाउंडेशान/फेसबुक 

इस खिलाड़ी ने भारतीय वॉलीबॉल में लगभग 10 साल तक राज किया और कई उपलब्धियां हासिल की और साथ ही इटली के बेस्ट क्लब की ओर से भी क़ाबिल-ए-तारीफ़ खेल दिखाया। 6’2 के लंबे कद के जिम्मी जॉर्ज की कूद सबसे लचीली हुआ करती थी और हवा में बाकिओं से कुछ समय ज़्यादा रुकने की काबिलियत की वजह से उनका प्रदर्शन भी सबसे बेहतर होता था।

पूर्व खिलाड़ी रामना रॉव और वॉलीबॉल फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के पूर्व उपाध्यक्ष ने द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए बताया “जिसे असल में जंप कहते हैं वह जंप उनके पास थी – ग्राउंड से लगभग एक मीटर ऊपर। 70 और 80 के दशक में भारत में वैसा करना असामान्य था और आज भी है।”

शारीरिक ताकत और मानसिक संकल्प से जिम्मी जॉर्ज खेल के एक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनते जा रहे थे। जीई श्रीधरन ने एक बार जिम्मी जॉर्ज के लिए कहा था कि, “उनकी जंप के आलावा उनकी मानसिक ताकत उन्हें बाकी भारतीय खिलाड़ियों से अलग करती थी। जिमी खेल में आने से पहले मेडीटेशन किया करते थे। जब वह कोर्ट पर आते थे तब हम बस उनकी निकलती उर्जा को देखा करते थे। जब वे कूदते थे तब उनका मस्तिष्क और उनका शरीर एक समान होता था और दूसरे का साथ देता था।”

हर खिलाड़ी के कौशल को मिलकर यह टीम बनी थी और इस टीम ने इस बार के एशियन गेम्स की शुरुआत हांगकांग,बहरीन, साउदी अरेबिया और इंडोनेशिया को मात देते हुए की थी। अपने घर में खेलती साउथ कोरिया भारतीय वॉलीबॉल टीम पर हावी हो गई और उन्हें पस्त कर दिया। हालांकि भारत ने अपने कड़े प्रतिद्वंदी जापान को धराशाई कर दिया था। इस मुकाबले में भी जिमी जोर्ज का खेल देखते ही बना था।

श्रीधरन ने आगे अलफ़ाज़ साझा करते हुए कहा “उन्होंने लगभग हमे 20 बार कहा होगा कि हमे जीतना है। उन्होंने पहले या दूसरे पॉइंट से ही आक्रामकता दिखानी शुरू कर दी और गेंद को मांगना शुरू कर दिया था। उस दिन उन्होंने गेंद को बहुत आक्रामकता से इस्तेमाल किया और कुछ गलत पास पर भी अंक बटोरे। हालांकि वे खिताबी जीत से तो दूर रह गए लेकिन इस टीम के हाथ ब्रॉन्ज़ मेडल ज़रूर आया।

भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम

1952 में पुरुष और महिला सीनियर नेशनल चैंपियनशिप की टीमे बनी थी लेकिन महिलाओं की टीम ज़्यादा नज़रे बटोरने में सफल न हो पाई। भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम को शुरुआती सालों में इंटरनेशनल स्तर पर नहीं उतारा गया था, जिस वजह से उनकी रैंकिंग ने वर्ल्ड चैंपियनशिप पर वर्ल्ड कप खेलने की अनुमति नहीं दी थी।

इंडियन वुमेंस वॉलीबॉल टीम ने 1977-78 तक गति पकड़नी शुरू की और दीप्ति मलिक (Dipti Malik) जैसे खिलाड़ियों का अच्छा योगदान आना शुरू हुआ। इस खिलाड़ी ने अगुवाई करते हुए इंडियन रेलवे से सीधा इस टीम को सीनियर चैंपियनशिप के पड़ाव तक ले जाकर खड़ा कर दिया।

दीप्ती मलिक ने भारतीय महिला वॉलीबॉल की तस्वीर बदली है। तस्वीर साभार: जिम्मी जॉर्ज फाउंडेशान/फेसबुक 

इस जीत के बाद खिलाड़ियों को रेलवे में ही नौकरी मिल गई और इस वजह वह पूरा समय खेल को दे सकते थे। आर्थिक स्थिति सुरक्षित होने के बाद सभी खिलाड़ियों के ज़हन में केवल खेल और देश रह गया था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि रेलवे ने डोमेस्टिक प्रतियोगिताओं में अपना दबदबा बनाया हुआ था और कुल 33 खिताब अपने नाम भी किए और 8 बार दूसरे स्थान पर रहे।

1975 में वुमेंस एशियन चैंपियनशिप की शुरुआत से भारतीय महिला टीम को भी अपने आंकलन का मौका मिला। हालांकि महिला टीम इस प्रतियोगिता का हिस्सा दूसरे संस्करण में बनीं और उस समय उन्होंने 7वें नंबर पर अपने कारवां का अंत किया। इस वजह से भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम को अपने पहले एशियन गेम्स (1982) में जाने की अनुमति भी मिली।

इसके बाद साउथ एशियन फेडरेशन गेम्स (South Asian Federation SAF) Games 1984 के डेब्यू में इस टीम ने 4 गोल्ड और 1 सिल्वर मेडल हासिल कर अपनी क़ाबिलियत का प्रमाण पेश किया। इतना ही नहीं इंडियन वुमेंस वॉलीबॉल टीम ने 2016 और 2019 साउथ एशियन गेम्स के संस्करण में भी गोल्ड मेडल की प्राप्ति की।

यह दौर भारतीय वॉलीबॉल के लिए समस्या लाता जा रहा था। कभी फेडरेशन के साथ मुठभेड़ का असर तो कभी जिम्मी जॉर्ज की मौत का असर इस खेल पर पड़ा और धीरे-धीरे इसने अपनी पकड़ कच्ची कर दी। उसी दौर में भारतीय क्रिकेट को एक नया नाम मिलता जा रहा था इर भारत में वह खेल अपनी पकड़ बना रहा था। भारतीय महिला और पुरुष वॉलीबॉल टीमों ने साउथ एशियन फेडरेशन गेम्स में तीन-तीन मेडल जीत अभी भी इस खेल को जिंदा रखे हुए थे, लेकिन वह ज़्यादा दिनों तक नहीं टिका। इसके बाद 2002 और 2006 में पुरुष टीम के हलके प्रदर्शन की वजह से इस खेल में काफी गिरावट देखी गई।

वही वुमेंस टीम का भी प्रदर्शन गिरता जा रहा था और उन्होंने 2010 एशियन गेम्स के लिए केवल क्वालिफाई ही किया था। इसके बाद पुरुष टीम ने 2010 और 2014 के संस्करण में वापसी की और इस बार खिलाड़ी बदल चुके थे। कप्तान सिननाडु प्रभागरन (Sinnadu Prabhagaran) के साथ और मोहन उक्रापांडियन (Mohan Ukkrapandian) जैसे बेहतरीन खिलाड़ी भी इस टीम का हिस्सा हैं।

मोहन उक्रापांडियन ने भारतीय वॉलीबॉल को बहुत कुछ दिया है। तस्वीर साभार: फेसबुक/ मोहन उक्रापांडियन

साल 2014 में इंडियन मेंस वॉलीबॉल टीम की रैंक 34 थी और तब लग रहा था की यह खेल एक बार फिर सुर्खियां बटोर सकता है, तो इसे एक बार फिर विवादों ने घेर लिया। VFI के आंतरिक विवादों को मद्देनज़र रखते हुए इंटरनेशनल वॉलीबॉल फेडरेशन International Volleyball Federation FIVB) ने इस टीम को दो साल यानी 2018 तक बैन कर दिया। इसका मतलब यह था कि यह भारतीय टीम दो साल तक बाकी लीगों का हिस्सा नहीं बन सकती नतीजन नए फॉर्मेट, तकनीक से इन खिलाड़ियों को अभी वंचित रहना था। वहीं 2018 एशियन गेम्स में कोच जीई श्रीधरन ने इस टीम को 12वें स्थान पर ला खड़ा किया।

एक बार दोबारा इस भारतीय वॉलीबॉल के कोर्ट में सूरज उगा और प्रो वॉलीबॉल लीग (Pro Volleyball League) के आ जाने से इस खेल का महत्व और भी बढ़ गया है। यह भी एक फ्रंचाईज़ी टूर्नामेंट है और इसमें 2008 ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता डेविड ली (David Lee) जैसे दिग्गज भी शामिल हैं।

पिछले साल मोहन उक्रापांडियन ने सपोर्टस्टार से बातचीत के दौरान कहा था “जब हम तैयारी करते थे या खेलते थे उसकी तुलना में यह एक बड़ा बदलाव लाया है। साथ ही टीवी के बड़े किरदार से ओलंपिक की दिशा आसान हो जाएगी।”

ओलंपिक क्वालिफिकेशन में मिली हार से भारतीय मेंस वॉलीबॉल टीम टोक्यो 2020 मिशन में फेल हो गई है और वे अगले साल के ओलंपिक गेम्स का हिस्सा नहीं होंगे।