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ओलंपिक पल जिन्होंने खेलों में भारतीय महिलाओं का चेहरा बदल दिया

कर्णम मल्लेश्वरी सिडनी 2000 में ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं, उनकी उपलब्धि ने ही सही दिशा में एक बदलाव को जन्म दिया।

लेखक विवेक कुमार सिंह ·

भारतीय भारोत्तोलन चैंपियन कर्णम मल्लेश्वरी (Karnam Malleswari) के लिए, 2000 का सिडनी ओलंपिक हमेशा एक सपना रहा होगा, जो आखिरकार सच हुआ।

पहली बार ओलंपिक कार्यक्रम में शामिल, महिलाओं की भारोत्तोलन में न केवल भारत ने सिडनी खेलों में अपना एकमात्र पदक जीता, बल्कि मल्लेश्वरी ओलंपिक पोडियम पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट बनीं

उस उपलब्धि के 20 साल हो चुके हैं। लेकिन आज भी, सिडनी 2000 में पदक जीतने वाली मल्लेश्वरी को याद किया जाता है। वास्तव में, कई लोगों के लिए, ये एक ऐसा क्षण था, जिसने खेलों में महिलाओं के प्रति भारतीय समाज के दृष्टिकोण को बदल दिया।

भारतीय लॉंग जंप की दिग्गज एथलीट अंजू बॉबी जॉर्ज (Anju Bobby George) ने ओलंपिक चैनल को बताया, "हालांकि हमें इस तरह का बदलाव, शुरूआत के अस्सी के दशक से आने के संकेत थे। कर्णम ने सिडनी खेलों में अपना पदक जीता था जिसके बाद हमने काफी बदलाव देखे।"

“पहले हमारे पास पीटी उषा (PT Usha), शाइनी विल्सन (Shiny Wilson) और कुंजरानी देवी (Kunjarani Devi) जैसे एथलीट थे। इन लोगों ने अच्छा प्रदर्शन किया और अपनी एक विरासत बनाई, लेकिन 2000 के बाद ही हमने भारतीय खेलों में महिलाओं की प्रतिभा को देखा है।

अंजू ने कहा, “यदि आप प्रत्येक ओलंपिक (सिडनी 2000 के बाद से) को देखते हैं, तो आपके पास सिर्फ एक महिला एथलीट नहीं थी, प्रत्येक ओलंपिक में आपके पास नईं एथलीट आई हैं। 2004 के एथेंस ओलंपिक में मैं थी, फिर मैरी कॉम (Mary Kom), साइना नेहवाल (Saina Nehwal और पीवी सिंधु (PV Sindhu) जैसी दिग्गज एथलीटों ने उस जगह की भरपाई की ... हमारे पास हमेशा भारतीय टीम में महिला चेहरा रही है।"

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"रियो 2016 ओलंपिक में कांस्य पदक हासिल करके साक्षी मलिक ने भारतीय महिला पहल...

सिडनी खेलों में भारतीय महिला भारोत्तोलक के शानदार प्रदर्शन से प्रेरित होकर, आने वाले वर्षों में कई युवा लड़कियों ने उनको फॉलो किया और विभिन्न खेलों में देश का नाम रोशन किया।

मल्लेश्वरी के इस प्रदर्शन के बाद महिला एथलीटों के रास्ते में आने वाली सामाजिक और आर्थिक रुकावटे दूर हुईं। इस बदलाव ने ही साइना नेहवाल, गीता फोगाट (Geeta Phogat) और अन्य नए सुपरस्टार को जन्म दिया।

पूर्व लॉंग जंपर के अनुसार, यह बदलाव काफी हद तक इसलिए संभव हुआ है क्योंकि उन्होंने हर चुनौती को स्वीकार किया था। अंजू बॉबी जॉर्ज ने कहा, "हमारे देश में महिलाएं बहुत साहसी हैं।"

“वो किसी चुनौती से दूर नहीं भागती हैं। ये सबसे बड़ी बात है जो, दूसरों से अलग बनाती हैं। साक्षी मलिक (Sakshi Malik) को रियो 2016 में कांस्य पदक जीतते हुए देखो। उन्होंने हार नहीं मानी।”

भारतीय महिला एथलीट आगे बढ़ रही हैं

जबकि विपरीत परिस्थितियों में उनका साहस और दृढ़ संकल्प किसी से छिपा नहीं है। भारत में पहली पूर्णकालिक महिला खिलाड़ियों में से एक, शारदा उग्रा (Sharda Ugra), का मानना ​​है कि ऐसी बहुत सारी कहानियां हैं जिसे बताने लगे तो समय कम पड़ जाएगा। उन्होंने कहा, “महिलाएँ हमेशा से खेल में रही हैं। ये पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है।”

“जो कुछ सालों में बदला गया है, वो ये है कि अब उनकी बात सुनी जा रही है। जिस पल आप किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता प्राप्त करते हैं, तब ये कहना अच्छा लगता है कि, देखिए मैं क्या कर सकती हूं? ’यह एक बड़ा परिवर्तन है।

उन्होंने कहा, "आप लोगों के पास सानिया मिर्जा और साइना जैसी खिलाड़ी होनी चाहिए। जो खुद के अंदर आत्मविश्वास पैदा करती हैं।

राष्ट्रमंडल खेलों में महिला एथलीटों की दिखी शक्ति

21 वीं सदी के शुरुआती वर्षों में खेल में भारतीय महिलाओं की संख्या काफी बढ़ती हुई देखी गई है। नई दिल्ली 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स तक ऐसा नहीं था।

मेजबानी के दौरान लगभग हर इवेंट में प्रतिस्पर्धा करना, 2010 राष्ट्रमंडल खेल एक निर्णायक पल था, क्योंकि भारतीय महिला एथलीटों ने इस आयोजन में भारत के 101 पदकों में से लगभग आधे पदक जीते।

भारत ने 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी की, जिसमें 101 पदकों के साथ अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया।

गीता फोगाट, राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला हैं। उन्होंने कहा, "2010 के राष्ट्रमंडल खेलों ने भारत में खेलों के लिए चाल बदल दी।"

“हमने कई महिला इवेंट्स में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाग लिया और जीता और देश ने उस पर ध्यान दिया। आप लगभग हर दिन अखबारों के पिछले पन्ने पर एक (महिला) चैंपियन को देखते होंगे। इसी ने भविष्य की सफलता का मार्ग प्रशस्त किया है।”

“यह सफलता राज्य और केंद्र सरकार द्वारा नौकरी के अवसरों के बाद मिली। इसलिए, जब आपको पता चलता है कि आप एक ऐसे खेल को खेल रहे हैं, जिसे आप प्यार करते हैं, तो लोग इसे गंभीरता से लेते हैं।"

एक बेटी के सपने में सहयोग

शारदा उग्रा के अनुसार, इस तरह की मान्यता ने खेल को पेशे के रूप में देखने वाली कई महिलाओं को प्रोत्साहित करने में मदद की है।

“यह एक बहुत बड़ा बदलाव है। मिसाल के तौर पर महिला हॉकी टीम को देख लीजिए। भले ही वो अभी दुनिया भर में धूम नहीं मचा पा रही हैं, लेकिन वो सुधार कर रही हैं। वो आपको अच्छे परिणाम दे रही हैं।”

“मेरा मानना ​​है कि कोई भी पेशेवर खेल आजीविका का विषय हैं। जब आपकी आजीविका की संभावना बढ़ जाती है - जो इन लड़कियों के लिए है - तो आप इसमें और अधिक महिलाओं को आगे बढ़ते हुए देख सकते हैं।

"अगर उन्हें लगता है कि वो उसमें अपना करियर बना सकती हैं, तो उनके माता-पिता अपनी बेटी के सपने का समर्थन करने लगते हैं।"

ये बदलाव भारतीय समाज के बदलते दृष्टिकोण के कारण काफी हद तक संभव हो पाया है।

अंजू बॉबी ने कहा, “आज, खेल में करियर को किसी अन्य पेशे के बराबर माना जाता है। माता-पिता का खेलों के प्रति खुली मानसिकता होने से बहुत मदद मिलती है।”