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दीपक पूनिया: हरियाणा के दंगल से मिला है भारत को एक बेहतरीन पहलवान

दो बार के ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार का मानना है कि दीपक पूनिया अपने करियर में अभी तक सही दिशा में जा रहे हैं।

लेखक विवेक कुमार सिंह ·

भारतीय कुश्ती (Indian wrestling) के नए स्टार दीपक पूनिया (Deepak Punia) ने पहली बार जॉर्जिया के बिलिसी में 2016 कैडेट विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में खिताब जीतकर अपनी प्रतिभा की झलक दिखाई थी। लेकिन 2019 के सीज़न तक इस युवा खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय मंच अपनी झलक दिखानी बाक़ी थी।

घरेलू सर्किट में बेहतरीन प्रदर्शन के दम पर दीपक पूनिया 2019 विश्व कुश्ती चैंपियनशिप (जूनियर) में उतरे, जहां वो 18 सालों बाद स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय पहलवान (Indian wrestler) बन गए।

दीपक पूनिया (86 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग) अपने सर्वश्रेष्ठ लय में थे, जहां उन्होंने फाइनल में रूस के एलिक शेबज़ुखोव (Alik Shebzukhov) को हराया।

ये खिताबी जीत दीपक के लिए और अधिक इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि फाइनल से पहले दीपक कंधे की चोट से जूझ रहे थे। पूनिया को सेमीफाइनल में ये चोट लगी थी। फाइनल मुक़ाबले में शेबज़ुखोव ने हारने से पहले भारतीय पहलवान को कांटे की टक्कर दी।

पुनिया ने अपनी जीत के बाद स्क्रॉल डॉट कॉम को बताया, "जूनियर में मैं चैंपियन बन चुका हूं, अब मैं सीनियर वर्ल्ड चैंपियन बनना चाहता हूं।"

विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक

आश्चर्य की बात ये है कि सुशील कुमार (Sushil Kumar) के मार्गदर्शन में छत्रसाल स्टेडियम में प्रशिक्षण लेने वाला ये युवा पहलवान एक महीने बाद ही अपने सपने को साकार करने के करीब पहुंच गया।

कजाकिस्तान के नूर-सुल्तान में आयोजित 2019 विश्व कुश्ती चैंपियनशिप (2019 World Wrestling Championships) में दीपक पूनिया ने 86 किलोग्राम फ्रीस्टाइल डिवीजन के फाइनल में जगह बनाई। फाइनल तक पूनिया को आसान ड्रॉ मिले थे। हालांकि, भारतीय पहलवान गोल्ड जीतने से एक कदम दूर रह गए, जब पैर की चोट उनके और गोल्ड मेडल के बीच आ गई।

भले ही दीपक पूनिया टोक्यो ओलंपिक के लिए कोटा स्थान और रजत पदक के साथ घर लौटे आए, लेकिन उन्हें एक चीज का मलाल था कि उन्हें ईरान के सबसे बेहतरीन पहलवान ओलंपिक और विश्व चैंपियन हसन याज़दानी (Hassan Yazdani) से लड़ने का मौका नहीं मिला।

पूनिया ने बाद में कहा, “वो एक बेहतरीन पहलवान हैं। उनकी जितनी तारीफ की जाए, वो कम है और हम उनका सम्मान करते हैं। मैंने यू-ट्यूब पर उनके वीडियो देखे हैं और हमेशा उसे कॉपी करने की कोशिश की है।”

विश्व चैंपियनशिप के रजत पदक विजेता ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया, “मैंने कुछ तो सीखा होगा। वो एक ओलंपिक चैंपियन भी हैं, इसलिए प्रतिस्पर्धा करना अच्छा अनुभव होता। लेकिन तब, मेरी चोट के बढ़ने का खतरा था” 

सबसे आश्चर्य करने वाली बात ये थी कि उन्हें 2019 के लिए यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग (United World Wrestling) ने 'जूनियर रेसलर ऑफ द ईयर' चुना।

दीपक पूनिया की सामान्य शुरुआत 

हरियाणा के झज्जर जिले के छारा गाँव में एक सामान्य परिवार से आने वाले दीपक पूनिया अपने गाँव में और आसपास स्थानीय कीचड़ कुश्ती को देखते हुए बड़े हुए।

उनके पिता और दादा अपने समय के स्थानीय पहलवान थे, इसलिए ये कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि दीपक को चार साल की उम्र से ही अखाड़े में उतार दिया गया। 

शुरू में अपने चचेरे भाई और स्थानीय सर्किट में जाने-माने पहलवान सुनील कुमार (Sunil Kumar) के साथ कई दौरों पर जाने वाले दीपक पूनिया ने भी अपने परिवार को पहलवानी के जरिए कुछ आय कमाकर देने के रास्ते पर चल पड़े।

एक दूधवाले के लिए पैसे का स्थिर स्रोत मददगार साबित हुआ, जिनके लिए ये काम बहुत मुश्किल होता था। हालांकि, सुनील कुमार का मानना ​​था कि दीपक को अपनी क्षमता का एहसास कराने के लिए दंगल सर्किट पर्याप्त नहीं था। 

इसी बात को ध्यान में रखते हुए दीपक पूनिया अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिए छत्रसाल स्टेडियम के प्रसिद्ध कुश्ती अकादमी में शामिल होने के लिए 2015 में नई दिल्ली आ गए। 

सुशील कुमार के मार्गदर्शन का प्रभाव 

छत्रसाल स्टेडियम एक तरह से सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त (Yogeshwer Dutt) का घर माना जाता था, ऐसे में वहां जाना दीपक पूनिया के लिए किसी वरदान से कम नहीं था। साथ में अनुभवी कोचों के संरक्षण में अपने कौशल को निखारने और सुशील कुमार से सीखने का मौका भी मिला।

सुशील कुमार उनकी कुश्ती पर ध्यान तो रखते ही थे, साथ ही ये भी सुनिश्चित किया कि इस पहलवान को कोई स्पोंसर मिल जाए। दीपक पूनिया, सुशील कुमार को गुरुजी कहते हैं। दो बार के ओलंपिक पदक विजेता ने दीपक को भारतीय सेना में सिपाही का पद पोस्टिंग (एंट्री-लेवल) लेने से रोका और उन्हें अपने कुश्ती कौशल को बेहतर करने की सलाह दी।

दीपक ने अपना पूरा ध्यान खेल पर लगाना शुरू कर दिया, जिसने उन्हें एक बेहतरीन डिफेंस वाला पहलवान बना दिया। धीरे-धीरे पूनिया ने डिफेंस की वो दीवार लगाने का तरीका सीख लिया, जिसे रेसलिंग में बहुत कम देखने को मिलता है।

हालाँकि दीपक पूनिया की कुश्ती लड़ने का ढंग बजरंग पुनिया से मिलता-जुलता है, लेकिन दोनों किसी भी तरह से किसी रिश्ते में नहीं आते हैं। दीपक का छारा गाँव बजरंग के खुदन गाँव से लगभग 30 किमी दूर है। 

दीपक पूनिया का डिफेंस देखा जाए तो, हो सकता है कि वो एक नेचुरल पहलवान न लगे, लेकिन अपने प्रतिद्वंद्वियों को पटकने की क्षमता अपार है। लेकिन दीपक की अपनी ताकत को सही करने की निरंतर कोशिश ने उनके कुश्ती कैरियर को अब तक बेहतर ही किया है। 

उनके पूर्व कोच व्लादिमीर मेस्टरविरीविल्ली ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा, “आपको चार चीजें चाहिए - दिमाग, शक्ति, भाग्य और मैट पर लचीलापन। दीपक के पास ये सब है। वो एक अनुशासित पहलवान हैं - वो लगातार एक नई तकनीक सीखने के लिए मैट पर उतरते हैं, और जब तक सीख नहीं लेते तब तक वो हार नहीं मानते।”

दीपक पूनिया का ओलंपिक सपना 

विश्व चैंपियनशिप स्तर पर खुद को साबित करने के बाद दीपक पूनिया अब ओलंपिक खेलों के सबसे बड़े स्तर पर भारत को पदक दिलाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

दीपक पूनिया अपने खेल से इतना जुड़ चुके हैं, कि जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी से निपटने के लिए घरों में बंद थी, तब ओलंपिक की अपनी तैयारियों को जारी रखने के लिए पहलवान ने नरेला के एक अखाड़े में अभ्यास करने लगे।

नई दिल्ली में हुए एशियाई चैंपियनशिप के पदक धारी ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा, "मैंने लॉकडाउन में ट्रेनिंग करना नहीं छोड़ा। मैं सामान्य समय की तरह अपने रुटीन को जारी रखा हुआ था।“

दीपक पूनिया ने कहा, “मैंने कुछ एरिया में बहुत काम किया है। मैं दोस्तों के साथ बाहर नहीं गया था। मैं अपने ट्रेनिंग पर ध्यान केंद्रित कर रहा था। मैं सुशील भाई साहब के संपर्क में भी था, मेरा मुख्य लक्ष्य ओलंपिक है।” 

इंडिविजुअल वर्ल्ड कप में उनका प्रदर्शन ज्यादा अच्छा नहीं रहा, लेकिन अगर उनके करियर के दौरान अगर उनके जीत की भूख देखी जाए, तो ये कहा जा सकता है कि ओलंपिक साल में कुश्ती शुरू होने पर दीपक पूनिया फिर से अपनी उसी लय तो हासिल कर लेंगे।