फ़ीचर

कुंजारानी देवी - भारत की पहली वेटलिफ्टिंग सुपरस्टार  

कुंजारानी देवी भारोत्तोलन के खेल से संबंध रखती हैं। विश्व चैंपियनशिप में सात रजत पदक और एशियन गेम्स में दो कांस्य पदक ने उन्हें भारत की सबसे सफल महिला वेटलिफ्टर बना दिया था।

लेखक रितेश जायसवाल ·

आज की पीढ़ी के अधिकांश सोशल मीडिया प्रेमियों के लिए भारतीय भारोत्तोलन के बारे में बातचीत कर्णम मल्लेश्वरी (Karnam Malleswari) से शुरू होती है। भारत की ‘आयरन लेडी’ ने देश की लड़कियों के अंदर उम्मीद जगाने का काम किया और 2000 में सिडनी ओलंपिक में अपने ऐतिहासिक कांस्य पदक के साथ भारतीय वेटलिफ्टिंग (भारोत्तोलन) की रूपरेखा तैयार की। इसीलिए आज कर्णम मल्लेश्वरी को देश के कई खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्त्रोत के रूप में जाना जाता है।

हालांकि, वह भी किसी ऐसी शख्सियत से प्रेरित थीं जो यकीनन भारतीय भारोत्तोलन की पहली सुपरस्टार रहीं। जी हां, उनका नाम है कुंजारानी देवी (Kunjarani Devi)।

यह बात बहुत कम ही लोग जानते हैं कि कुंजारानी देवी भारोत्तोलन के खेल से संबंध रखती हैं। इसी वजह से लोग अक्सर यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि कुंजारानी देवी किस खेल से संबंध रखती हैं।

आपको बता दें, मणिपुर की इस पूर्व भारोत्तोलक का कद भले ही 5 फुट 3 इंच का रहा हो, लेकिन उनकी उपलब्धियां उनके कद से कहीं अधिक और ऊपर रही हैं। 52 साल की इस एथलीट को अद्भुत ताकत और साहस की वजह से हरक्यूलिस भी कहा जाता है।

संयोग से, खेल में कुंजरानी की दिलचस्पी एक अन्य दिग्गज भारतीय खिलाड़ी की वजह से जागी।

पीटी उषा से हुईं प्रेरित

यह एक बड़ा और सही तथ्य है कि 1982 के एशियन गेम्स ने पीटी उषा (PT Usha) को प्रसिद्धि दिलाने का काम किया था।

भारतीय ट्रैक क्वीन ने नई दिल्ली में अपने घर में दो रजत पदक जीते, जिससे पूरे देश में पीटी उषा के नाम की चर्चा होने लगी। लेकिन उस वक्त 14 वर्षीय कुंजारानी देवी के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण पल साबित हुआ।

कुंजारानी देवी ने ओलंपिक चैनल से कहा,

"उस इवेंट ने मुझे ऐसा महसूस कराया कि मैं भी खेल में शानदार प्रदर्शन कर सकती हूं। उसके बाद मैंने बहुत सारे खेल खेलना शुरू कर दिए, फिर चाहे वह हॉकी हो, फुटबॉल हो या ट्रैक पर दौड़ना हो।"

हालांकि, उनके इस अजीब से निर्णय की वजह से वह किसी एक खेल में भी सफलता का शिखर नहीं छू पा रही थीं। तभी उन्हें पावरलिफ्टिंग के बारे में पता चला। कुंजरानी के छोटे कद और उनके जुनून ने उन्हें इस खेल के लिए एक आदर्श उम्मीदवार बना दिया।

कुंजारानी देवी ने अपनी करीबी दोस्त अनीता चानू के साथ अपनी पसंद के खेल के तौर पर पावरलिफ्टिंग में अपनी शुरुआत की और जल्द ही उनकी प्रतिभा रंग लाने लगी। उन्होंने इस खेल में अपने क़दम रखने के कुछ ही महीनों में राष्ट्रीय पावरलिफ्टिंग रिकॉर्ड को तोड़ दिया।

कुंजारानी देवी भारोत्तोलन के खेल से सम्बंधित हैं।

हालांकि एक छोटा सा मुद्दा हमेशा उन्हें खटकता रहा। कुंजारानी ने एक दिन ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेने का सपना देखा था, लेकिन अफसोस की बात यह थी कि पावरलिफ्टिंग ओलंपिक का हिस्सा नहीं था।

इसने कुंजारानी देवी को एक बार फिर से अपने खेल को बदलने पर मजबूर कर दिया।

नेशनल गेम्स में बनाई अपनी पहचान

1985 में भारत में राष्ट्रीय खेलों का पहला संस्करण आयोजित किया गया। इसे ओलंपिक खेलों के जैसे ही आयोजित किया गया था, जिसकी वजह से इसमें भारोत्तोलन के लिए पुरुषों और महिलाओं दोनों के इवेंट रखे गए थे। हालांकि, ओलंपिक खेलों में महिलाओं के लिए भारोत्तोलन को साल 2000 में जोड़ा गया।

कुंजारानी देवी ने इसे अपने ओलंपिक सपने को साकार करने के एक अवसर के रूप में देखा और पावरलिफ्टिंग से वेटलिफ्टिंग में जाने का फैसला किया। यह एक साधारण निर्णय नहीं था।

कुंजारानी ने समझाते हुए बताया, “पावरलिफ्टिंग के तीन फॉर्मेट (स्क्वॉट्स, बेंच प्रेस और डेडलिफ्ट्स) थे, जबकि वेटलिफ्टिंग में केवल स्नैच और क्लीन एंड जर्क था। इसके अलावा पॉवरलिफ्टिंग में आपकी ताकत पर बहुत जोर दिया जाता है, जबकि भारोत्तोलन में आपकी तकनीक को अधिक महत्व दिया जाता है।”

हालांकि, पूर्व भारतीय भारोत्तोलक ने खेल को आसानी ने बदल दिया और इस बदलाव के बाद उन्होंने राष्ट्रीय खेलों में तीन स्वर्ण पदक जीते।

कुंजरानी ने कहा, "इतने सारे खेल खेले होने की वजह से मुझे इस बदलाव को स्वीकार करने में मदद मिली। मैंने पहले ही हॉकी, फुटबॉल और एथलेटिक्स के बाद पॉवरलिफ्टिंग में आई थी, इसलिए वेटलिफ्टिंग में जाना कोई नई बात नहीं थी।"

खेल पत्रिकाओं में चीनी और रूसी भारोत्तोलकों के बारे में पढ़ना एक और वजह थी जिसने उन्हें अधिक दृढ़ संकल्पित बनाने का काम किया।

भारतीय वेटलिफ्टर ने याद करते हुए कहा, “मैं साफतौर पर देख सकती थी कि जो भार मैं उठा पा रही थी उससे विश्व रिकॉर्ड बहुत दूर नहीं था। मेरे कोच हमेशा मुझे कहते थे कि अगर मैं कड़ी मेहनत करती रही तो भारत का प्रतिनिधित्व करने का मेरा सपना जल्द ही साकार होगा।”

कुंजारानी देवी को यह मौका जल्द ही मिल गया।

कई सिल्वर मेडल और चीनी चुनौती

कुंजारानी देवी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन करने का पहला मौका 1989 में इंग्लैंड के मैनचेस्टर में वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप के तौर पर मिला था।

भारत के बाहर पहली बार किसी प्रतियोगिता के लिए जा रही इस युवा एथलीट के लिए भले ही यह मंच नया और डराने वाला रहा हो, लेकिन कुंजारानी अपनी क्षमता की वजह से पूरी तरह आश्वस्त थीं। इससे उन्हें नया इतिहास रचने में काफी मदद मिली।

44 किग्रा के फाइनल में भाग लेते हुए कुंजरानी देवी ने स्नैच में 132.5 किग्रा-57.5 किग्रा और क्लीन एंड जर्क में 75 किग्रा उठाते हुए विश्व वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में भारत के लिए पहली बार पोडियम स्थान पर पहुंचने के साथ ही सिल्वर मेडल हासिल किया।

यह रजत पदक एक अभूतपूर्व उपलब्धि तो थी ही लेकिन व्यक्तिगत कारणों की वजह से भी यह कुंजारानी के लिए काफी महत्वपूर्ण था।

कुंजारानी ने खुलासा किया, “उस पदक ने आखिरकार घर में सभी लोगों को आश्वस्त कर दिया कि यह मेरे लिए एक अच्छा करियर हो सकता है। इससे पहले मेरा परिवार मेरे साथ तो देता था, लेकिन मैं यह सकती हूं कि वे उलझन में थे। इसके बाद मुझे सरकार से नौकरी का प्रस्ताव मिला, जिसने मुझे वित्तीय स्थिरता भी दी।"

उस दिन उनकी प्रतिद्वंद्वी, चीन की जिंग फेन ने स्वर्ण जीतने के लिए एक विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए 165 किग्रा भार उठाया। भारतीय के लिए चीनी वेटलिफ्टर चुनौती बनकर सिर्फ एक बार नहीं बल्कि कई बार सामने आई।

कुंजारानी देवी ने 1989 से 1997 तक विश्व चैंपियनशिप में अविश्वसनीय सात रजत पदक जीते, केवल 1993 के संस्करण में वह अंतिम पलों में चोटिल होने की वजह से कोई भी पदक जीतने से चूक गईं।

भारतीय भारोत्तोलक ने 1990 और 1994 के एशियाई खेलों में दो कांस्य पदक जीते और हर बार कुंजारानी देवी को चीनी वेटलिफ्टर के आगे हारते हुए देखा गया।

कुंजारानी देवी ने इस मुद्दे पर बात करते हुए कहा, “सच कहूं तो उनकी तैयारी हमसे बेहतर थी। मेरा लक्ष्य हमेशा चीनी खिलाड़ियों को कड़ी टक्कर देना होता था। भारत ने एक नए खेल के तौर पर भारोत्तोलन में अपने कदम रखे थे, जबकि उनके पास पहले से ही सभी प्रणालियां मौजूद थीं और यही उनकी सफलता का बड़ा सच था।”

राष्ट्रमंडल खेलों की गौरव गाथा

1997 के बाद कुंजारानी देवी का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा। वह विश्व चैंपियनशिप या एशियाई खेलों में पोडियम तक नहीं पहुंच पा रही थीं। 2000 में पहली बार ओलंपिक खेलों में महिलाओं के लिए भारोत्तोलन को शामिल किए जाने पर भी वह अपने ओलंपिक सपने को साकार नहीं कर सकीं।

कभी हार नहीं मानने वाली कुंजारानी देवी 2002 में एक बार फिर पूरे जोश के साथ वापसी करती हैं और इस बार उन्हें पहला विश्व चैंपियनशिप रजत पदक जीतते हुए देखा गया। इसके बाद 2002 में ही कॉमनवेल्थ गेम्स में मैनचेस्टर में भारतीय भारोत्तोलक ने 48 किग्रा में क्लीन, जर्क और स्नैच में तीन स्वर्ण पदक जीते।

कुंजारानी ने कहा, “मैं हर एक दिन अपने आप को बेहतर करना चाहती था और अपने खेल को हर बीते हुए दिन के साथ ही बेहतर बनाना चाहता थी। इससे ही मुझे स्वर्ण पदक जीतने में मदद मिली।”

कुंजारानी देवी ने 2002 के राष्ट्रमंडल खेलों में तीन स्वर्ण पदक जीते।

दो साल बाद उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण सपने को साकार करने में सफलता हासिल की। कुंजरानी देवी 2004 के एथेंस ओलंपिक में भारतीय भारोत्तोलक दल का हिस्सा बनीं।

वह अंततः 48 किग्रा वर्ग में चौथे स्थान पर रहीं, क्योंकि थाईलैंड की ऐरी विराटहॉर्न ने कांस्य जीतने के लिए 200 किलोग्राम भार उठाया। वहीं, कुंजारानी केवल 190 किलोग्राम ही उठा सकीं।

इसपर उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि ओलंपिक पदक मिलना ही नहीं था।”

जीत की खुशी में कुंजारानी देवी

ओलंपिक की असफलता से कुंजारानी देवी 2006 में ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में उबर सकीं, जहां वह 36 साल की उम्र में अपने राष्ट्रमंडल खेलों के खिताब का बचाव करने में सफल रहीं।

अपने पहले और आखिरी पदक के बीच कुंजारानी देवी का करियर कुल 17 साल का रहा, जो इस पावर स्पोर्ट में एक महिला के लिए महान उपलब्धि थी।

कुंजारानी देवी को 1990 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया और फिर 1996 में भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न को उन्होंने लिएंडर पेस के साथ साझा किया। कुंजारानी को 2011 में नागरिक सम्मान पद्म श्री से भी नवाजा गया।

उनके इस सफर ने मणिपुर को एक बड़ा मंच प्रदान करने का काम किया, जिसकी बदौलत प्रसिद्ध एमसी मैरीकॉम और भारोत्तोलक मीराबाई चानू जैसी महिला एथलीट उभरकर सामने आईं, जिन्होंने कुंजारानी को अपनी प्रेरणा के रूप में देखा।

अब यह भी जान लीजिए कि टोक्यो ओलंपिक में मीराबाई चानू की संभावनाओं के बारे में कुंजारानी देवी क्या सोचती हैं?

कुंजारानी देवी ने अपनी बात को समाप्त करते हुए कहा, "मैं चाहती हूं कि वह उस ओलंपिक पदक को जीतें, जो मैं हासिल नहीं कर सकी। मैंने उससे पहले बात की है और उसे प्रशिक्षित किया है, इसलिए मुझे पता है कि वह क्या करने में सक्षम है। मेरा आशीर्वाद हमेशा उसके साथ रहेगा।”