ओलंपिक स्वर्ण पदक की भूख मैरी कॉम को आगे बढ़ने के लिए कर रही है प्रेरित

छह बार की विश्व चैंपियन के दृढ़ संकल्प और सफलता की भूख ने भारत के भविष्य के मुक्केबाज़ों के लिए एक शानदार रूपरेखा तय करने का काम किया है।

कोई चलता है पदचिह्नों पर, कोई पदचिह्न बनाता है... ऐसे सूरमा हमेशा दुनिया के लिए मिसाल बन जाते हैं। एमसी मैरी कॉम (MC Mary Kom) की बॉक्सिंग में सफलता की दास्तां भी कुछ ऐसी ही है। खुद को सबसे बेहतर बनाने का उनका जुनून और सफलता हासिल करने की भूख उन्हें समय की बहती रेत की तरह ही कभी न रुकने के लिए प्रेरित करती है।

सीधे शब्दों में कहें तो एक खेल के महान खिलाड़ी और लगातार जीत हासिल करने वाले विजेता का संघर्ष अद्भुत, अविश्वसनीय और अकल्पनीय होता है। ऐसे में कई वर्षों तक खुद को बेहतर साबित करने में सफल रहने वाले खिलाड़ी ही दुनिया की नज़रों में महान कहलाते हैं।

छह बार की विश्व चैंपियन और भारत की शीर्ष मुक्केबाज़ एमसी मैरी कॉम ने ओलंपिक चैनल के साथ एक विशेष बातचीत में अपनी कई वर्षों की सफलता का राज़ बताया। उन्होंने सीधे शब्दों में पहले कहा कि यह जीत हासिल करने के लिए उनकी भूख है, जो उन्हें आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करती है।

मैरी कॉम ने लंदन 2012 में जीता ब्रॉन्ज़ मेडल
मैरी कॉम ने लंदन 2012 में जीता ब्रॉन्ज़ मेडलमैरी कॉम ने लंदन 2012 में जीता ब्रॉन्ज़ मेडल

जीत की भूख बनाती है सफल

लंदन ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता ने कहा, "भारत की लड़कियों में अपार क्षमता है और हमारे पास बहुत सारे प्रतिभाशाली युवा मुक्केबाज़ हैं। हालांकि, मैंने जो देखा है वह यह है कि एक पदक के बाद वह सभी संतुष्ट हो जाते हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारे अंदर जीत की भूख हमेशा जिंदा रहनी चाहिए। संतुष्ट होने से मेरा मतलब है कि सभी का रुख या कहें नज़रिया बदल जाता है।”

सफलताओं के बावजूद यह रवैया ही शायद किसी को महान खिलाड़ी बनने से रोकता है, लेकिन यह रिकॉर्ड आठ बार वर्ल्ड चैंपियनशिप की पदक विजेता को आखिर क्या प्रेरित करता है?

इस सवाल पर उन्होंने कहा, ''ओलंपिक गोल्ड हासिल करने की भूख मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। एक बार अगर मैंने उसे जीत लिया तो मुझे लगता है कि शायद मैं संतुष्ट हो जाऊंगी।”

मैरी कॉम ने यह भी बताया कि उनकी अंतिम सीमा क्या है। उन्होंने कहा, "मैं 20 साल से लड़ रही हूं और एक लड़की होने के नाते यह एक आसान काम नहीं है। मुझे खुशी है कि मैं अभी भी किसी बड़ी चोट के बिना अपना सफर जारी रखने में सफल रही हूं।”.

लंदन 2012 में ओलंपिक कांस्य बना गेमचेंजर

जहां वह एक ओर यह स्वीकार करती हैं कि कड़ी मेहनत, समर्पण और आत्म-विश्वास ने उन्हें सफलता के इस शिखर तक पहुंचाया है तो वहीं दूसरी ओर लंदन में हासिल किया गया ओलंपिक कांस्य पदक भी कई बार की इस विश्व चैंपियन के लिए असली गेमचेंजर साबित हुआ था।

मैरी कॉम ने इस पर कहा, “यह बहुत मायने रखता है। एक ओलंपिक पदक ने मेरी ज़िंदगी बदल दी। दो और तीन बार की विश्व चैंपियनशिप भी सही थी, लेकिन मैं जीवन में कुछ नहीं कर सकी। यह एक अच्छी पहचान थी, लेकिन देखा जाए तो महिलाओं की मुक्केबाज़ी भी लोकप्रिय नहीं थी। महिलाओं की मुक्केबाज़ी को ओलंपिक, एएसआईएडी और राष्ट्रमंडल खेलों में शामिल किए जाने के बाद एक बड़ा बदलाव देखने को मिला।”

उन्होंने आगे कहा, “मेरे अब बहुत सारे दोस्त हैं और मुझे मुक्केबाज़ी में जो भी चाहिए लोग बताते रहते हैं। मैं सीधे किसी मंत्री से बात कर सकती हूं और चीजें तुरंत मुहैया कराई जा सकती हैं। ओलंपिक कांस्य ने मेरे जीवन को बदल दिया और युवा मुक्केबाज़ आज मेरे द्वारा हासिल किए गए पदक का लाभ उठा रहे हैं।”

अब 37 साल की उम्र में टोक्यो 2020 ओलंपिक गोल्ड मैरी कॉम के लिए उनका आखिरी लक्ष्य होगा। यह बॉक्सिंग स्टार वुमेंस फेदरवेट श्रेणी में मुकाबला करती है। ओलंपिक के लिए टिकट हासिल करने के अपने प्रयास में उन्होंने अपनी प्रतिद्वंदी को आसानी से हराकर साबित कर दिया कि वह अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

मैरी कॉम ने कहा, "मुझे भगवान को फोन करके पूछने की ज़रूरत है (क्या मैं ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीत जाऊंगी)। सही मायने में इस प्रश्न का उत्तर देना मुश्किल है। यह एक सपना है जिसके लिए मैं लड़ रही हूं। मैं केवल प्रयास कर सकती हूं।”.

मैरी कॉम का जुनून

भले ही यह भारतीय मुक्केबाज़ टोक्यो 2020 में जो भी सफलता हासिल करे, लेकिन उनकी जीत की चाहत में कोई कमी नहीं आई है। वह आज भी उतनी ही गर्मजोशी के साथ आगे बढ़ने का हौसला रखती हैं। अमेच्योर बॉक्सिंग में वह पहले ही फाइनल में अपनी जगह बनाने में सफल रह चुकी हैं।

ओलंपिक गोल्ड मेडल के अलावा भी उनके जीतने के लिए बहुत कुछ बाकी है। अब सवाल उठता है कि मैरी कॉम युग के सूरज ढ़लने के बाद भारत में महिलाओं की मुक्केबाज़ी का भविष्य क्या है?

उन्होंने इसपर सलाह देते हुए उन्होंने कहा, “मैं भगवान नहीं हूं और मुझे नहीं पता कि आगे क्या होगा। लेकिन जैसा कि मैंने आपको बताया। मैं चाहती हूं कि युवा मुक्केबाज़ों का रवैया ठीक हो। यह किसी भी करियर में उनके लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लोगों को हमेशा जमीन से जुड़े हुए और सरल स्वभाव का होने की जरूरत है। इस तरह से वह और अधिक सफलता हासिल कर सकते हैं।”

एक पदक जीतना एक मुक्केबाज़ के लिए संतोषजनक हो सकता है लेकिन इससे करियर समाप्त नही हो जाता है। मैं अमीर और गरीब दोनों का सम्मान करती हूं, लेकिन मेरे देश के कई मुक्केबाज एक बार जीतते हैं और फिर सोचने लगते हैं कि मैं ‘बॉस’ हूं।”

पिछले दो दशकों में अपने सफलता के मंत्र पर उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा, “जब आप शुरूआत करते हैं तो कोई भी आपको नहीं जानता है और जब आप कुछ हासिल कर लें तो आपको विनम्र रहना चाहिए।”

सच यह है कि तीन भारतीय महिला मुक्केबाज़ों ने मैरी कॉम के साथ 2020 ओलंपिक का टिकट हासिल किया है। यह एक बेहतर भविष्य के लिए आस जगाने वाले परिणाम हैं।

ओलंपिक में नतीज़ों से परे भारत में महिलाओं की मुक्केबाज़ी के लिए दीर्घकालिक चुनौती होने के बावजूद वर्तमान और भविष्य के बॉक्सिंग सितारों को यह समझना होगा कि मैरी की विजेता बनने की मानसिकता को कैसे विकसित और एकीकृत किया जाए।

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