फ़ीचर | बॉक्सिंग

मैरी कॉम और उनके करियर को एक आख़िरी ओलंपिक सफलता की तलाश

इस दिग्गज मुक्केबाज़ की ओलंपिक रिंग से अपने शानदार करियर को अलविदा कहने पर नज़र होगी। 

लेखक रितेश जायसवाल ·

मैंगते चंग्नेइजैंग मैरी कॉम (MC Mary Kom) ने एशियाई/ओशिनिया ओलंपिक क्वालिफ़ायर में ओलंपिक टिकट हासिल कर सभी देशवासियों की उम्मीदों को जगा दिया है। जॉर्डन के अम्मान में आयोजित हुए इस क्वालिफायर के सेमीफाइनल में पहुंचकर मैरी कॉम ने 2020 ओलंपिक में अपनी जगह पक्की कर ली है। इतिहास में भारत की सबसे सफल मुक्केबाज़ बनने के साथ ही मैरी सभी पुरानी परम्पराओं और बाधाओं को तोड़ते हुए आगे बढ़ी हैं। अब यह देखना बेहद रोमांचक होगा कि वह टोक्यो 2020 में पोडियम स्थान हासिल कर सकेंगी या नहीं? मैरी कॉम की कहानी देश की युवा पीढ़ी को प्रेरित करती है और खुद लोगों के लिए एक मिसाल हैं।

बॉक्सिंग का नाम सुनते ही हर किसी के दिमाग में मैरी कॉम का नाम ज़ुबां पर आना स्वाभाविक है। अब ऐसे में हर किसी के अंतर्मन में कई सवाल हिचकोले लेने लगते हैं; मसलन - मैरी कॉम का पूरा नाम क्या है? मैरी कॉम का जन्म कब हुआ था? मैरी कॉम की कहानी क्या है? मैरी कॉम कहां की हैं? मैरी कॉम को कौन से पुरस्कार मिले हैं? मैरी कॉम की आत्मकथा कौन सी है? मैरी कॉम मूवी कब बनी? मैरी कॉम मूवी में किस अभिनेत्री ने अभिनय किया? ऐसे न जाने कितने ही सवालों से आप जूझते होंगे। आइए मैंगते चंग्नेइजैंग मैरी कॉम जीवनी पर एक नज़र डालते हैं...

मैरी कॉम बनाम निकहत ज़रीन

मैरी कॉम का ओलंपिक क्वालिफ़ायर्स में पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा। इस प्रतियोगिता में जगह बनाने के लिए उन्हें इंडियन नेशनल ट्रायल्स में निकहत ज़रीन (Nikhat Zareen) से मुक़ाबला करना पड़ा। जहां मैरी कॉम ने निकहत को शानदार शिकस्त दी। 51 किलोग्राव भारवर्ग में आखिरकार अपनी जगह को पक्की करने का मुक़ाबला दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बन गया। जिसे ‘दो युगों की भिड़ंत’ के तौर पर देखा गया।

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20 Feb - 15 Mar

टोक्यो 2020 ओलंपिक के क्वालिफिकेशन टूर्नामेंट्स

डाकार, लंदन, अम्मान, ब्यूनस आयर्स, पेरिस

23 वर्षीय ज़रीन को इस वर्ग में उभरते हुए सितारे के रूप में देखा जा रहा था, जिन्हें 2019 में कुछ ही समय पहले नेशनल चैंपियन का ताज पहनाया गया था। लेकिन जब इस मुक्केबाज़ का रिंग में मैरी कॉम से मुक़ाबला हुआ तो उन्होंने अपनी 9-1 की जीत से पूरे देश को बता दिया कि आज भी उनके पुराने मुक्कों और हौसलों में बहुत दम है। इस जीत के साथ ही कॉम के लिए ओलंपिक में एक बार और अपनी जगह पक्की करने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

मैरी कॉम का बचपन

मैरी कॉम का पूरा नाम मैंगते चंग्नेइजैंग मैरीकॉम है। उनका जन्म 1 मार्च 1983 को मणिपुर के उत्तर पूर्वी राज्य में स्थित कांगथाही नामक स्थान पर हुआ था। कॉम तीन बच्चों में सबसे बड़ी थीं और बहुत ही निचले तबके के परिवार से आईं, जहां उनके पिता एक किरायेदार किसान के रूप में अपने बच्चों का पेट भरने के लिए हर रोज़ दो वक्त के भोजन का प्रबन्ध करने के लिए संघर्ष करते थे।

डिंगको सिंह ने मैरी कॉम को मुक्केबाज़ी के लिए प्रेरित किया 

तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि भारत की एक महान मुक्केबाज़ उनके बीच बड़ी हो रही थी। लेकिन कॉम के जीवन ने एक नया मोड़ उस वक्त लिया जब उन्हें मणिपुर के मूल निवासी डिंगको सिंह से प्रेरणा मिली। सिंह बैंकॉक में 1998 के एशियाई खेलों में भारत के लिए बॉक्सिंग गोल्ड जीतने के बाद रातोंरात हीरो बन गए थे।

मैरी कॉम ने बनाया पदकों का रिकॉर्ड

महिला विश्व चैंपियनशिप स्तर पर कॉम का मेडल रिकॉर्ड किसी आश्चर्यजनक बात से कम नहीं है। कुल मिलाकर इस भारतीय मुक्केबाज़ ने चैंपियनशिप के आठ संस्करणों में कम से कम एक पदक जरूर जीता है। 18 साल की उम्र में साल 2001 में पहली बार अमेरिका के स्क्रैंटन में आयोजित महिला विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने इस प्रतियोगिता का पहला मेडल जीता।

48 किलोग्राम के स्तर पर मुक्केबाज़ी में कॉम ने रजत पदक हासिल किया। अगले वर्ष कॉम स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहीं और उन्हें पहली बार विश्व चैंपियन का ताज पहनाया गया। इसके बाद तो कॉम को जैसे कोई हराने वाला बना ही नहीं, और 2010 तक उन्होंने लगातार पांच विश्व खिताब जीते। उसके बाद उनके जीवन का सबसे बड़ा क्षण आया: यह ओलंपिक मंच पर सफलता हासिल करने की उनकी अद्भुत उपलब्धि थी।

ओलंपिक में मैरी कॉम

लंदन 2012 में महिलाओं की मुक्केबाज़ी में डेब्यू करने के साथ कॉम ने एक बार फिर खुद को भारत में खेल के लिए अग्रणी के रूप में पाया। लेकिन ओलंपिक में बॉक्सिंग करने का यह रोमांचक मौका एक बदलाव के साथ आया: कॉम को अपना वजन 46 किग्रा से बढ़ाकर 51 किग्रा वर्ग में ले जाना पड़ा।

वह अपने इस बदलाव के बाद भी आगे बढ़ती हुईं दिखाई दे रहीं थीं, क्योंकि वह बिना किसी कठिनाई के सेमीफाइनल में पहुंच गईं थीं। लेकिन मेज़बान देश की निकोला एडम्स उनपर भारी पड़ गईं और इसी के साथ उनके पहले ओलंपिक का सफर समाप्त हो गया। हालांकि, उनके मुक्कों ने उन्हें कांस्य पदक जरूर दिलाया और उसके बाद कॉम की यह सफलता इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए स्वर्णिम अच्छरों में दर्ज हो गई।

कॉम के अन्य पुरस्कार

ओलंपिक क्षण के बाद कॉम को अन्य कई बड़ी सफलताएं मिलीं। उन्होंने 2014 में एशियाई खेलों में 51 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक और फिर 2018 में 48 किग्रा वर्ग में नीचे आते हुए कॉमनवेल्थ गेम्स चैंपियन बनीं। साल में ही उन्होंने महिला विश्व चैंपियनशिप में छठा स्वर्ण पदक भी जीता। नई दिल्ली में आयरलैंड की केटी टेलर को शिकस्त देते हुए कॉम छह बार विश्व खिताब जीतने वाली एकमात्र महिला बनीं।

पिछले साल रूस में विश्व चैंपियनशिप में कॉम ने क्यूबा की महान फेलिक्स सैवोन को हराकर कांस्य पदक जीता और वह अब तक की सबसे अधिक पदक जीतने वाली विश्व चैंपियन बन गईं हैं। इस जीत के साथ उन्हें रिकॉर्ड आठवीं बार पोडियम पर खड़े होने का अवसर प्राप्त हुआ।

रिंग के बाहर भी, उनकी उपलब्धियां सराहनीय

उन्हें 2006 में पद्म श्री, 2013 में पद्म भूषण और 2020 में पद्म विभूषण, क्रमशः देश के चौथे-सर्वोच्च, तीसरे और दूसरे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें 2003 में खेल में अद्भुत उपलब्धियां हासिल करने के लिए अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया, और 2009 में देश के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया गया।

मैरी कॉम मूवी

वैसे यह थोड़ा आश्चर्य की बात लगती है कि कैसे मैरी कॉम जीवनी को एक फिल्म का रूप भी दिया जा सकता है। लेकिन ओमंग कुमार द्वारा निर्देशित और मुख्य भूमिका में प्रियंका चोपड़ा द्वारा अभिनीत कॉम की इस बायोपिक फिल्म 'मैरी कॉम' को 2014 में रिलीज किया गया।

बड़े पर्दे पर इस फिल्म के रिलीज़ होने के एक महीने पहले प्रियंका चोपड़ा ने कहा, “मेरे लिए एक महिला के रूप में मैरीकॉम का जीवन बेहद प्रेरणादायक था। एक व्यक्ति के रूप में वह बहुत ही मज़बूत इरादों वाली महिला हैं, जो अपने अधिकारों के लिए खड़ी हैं और जो वह हासिल करना चाहती हैं उसके लिए लड़ती हैं।

2008 में निंगबो में महिला विश्व चैंपियनशिप विजेता पर आधारित फिल्म - एक बड़ी व्यावसायिक सफलता थी, जिसने बॉक्स ऑफिस संग्रह में 1 बिलियन से अधिक की कमाई की।

मैरी कॉम, पति और बच्चे

किसी भी माता-पिता के लिए जीवन और काम के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है, लेकिन एक शीर्ष स्तर के एथलीट के रूप में यह आपके सामने उससे भी बड़ी चुनौती पेश करता है। मैरी कॉम के लिए बच्चों और मुक्केबाज़ी के सपनों का पीछा करना उनके खेल करियर का मिला-जुला हिस्सा रहा।

कॉम के पति करुंग ओंखोलर कॉम हैं, जिनसे उन्होंने 2005 में शादी की। दो साल बाद उन्होंने जुड़वां बच्चों, रेचुंगवार और खुपनीवर को जन्म दिया। इस दंपति ने एक बार फिर 2018 में अपनी बेटी, नीवर मर्लिन को गोद लेने से पहले एक तीसरे बेटे प्रिंस का स्वागत किया।

मुक्केबाज़ ने अक्सर अपने पति और उसके बच्चों को अपने करियर के दौरान दिए गए समर्थन की बात की है, जिससे उन्हें प्रशिक्षण और प्रतियोगिता पर ध्यान केंद्रित करने में कोई परेशानी नहीं होती थी। दरअसल, यह कॉम के पति थे, जिन्होंने हमेशा उन्हें ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं पर ध्यान देने का जोर दिया।

ओलंपिक पदक विजेता ने खुलासा किया है कि 2011 में उसके बेटे खुपनीवर के दिल में छेद होने की जानकारी होने के बाद उन्होंने मुक्केबाज़ी को तकरीबन छोड़ने का फैसला ले लिया था।

इस मुश्किल घड़ी में केवल कॉम के जीवनसाथी ही उन्हें अपने खेल प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए राज़ी कर सकते थे। कॉम ने बताया, "मेरे पति ने मुझे आगे बढ़ने को कहा, यह कहते हुए कि 'तुम्हें जाना चाहिए, तुम खेलो और जीतो और वापस आओ'। घर की जो भी समस्याएं होंगी, उन्होंने कहा कि उसका वह खुद ध्यान रखेंगे।”

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मैरी कॉम - राजदूत

अपने खेल में सबसे अनुभवी खिलाड़ी में से एक होने के रूप में कॉम अब मुक्केबाज़ी के लिए एक राजदूत के तौर पर भी कार्यरत हैं। रिंग में कदम रखने वाली नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा के रूप में काम करने के साथ-साथ, टोक्यो 2020 के लिए ओलंपिक क्वालीफायर के लिए उन्हें एथलीट राजदूतों में से एक के रूप में भी चुना गया है।

उनकी भूमिका में आयोजकों को यह सुनिश्चित करने के लिए सलाह देना शामिल है कि वास्तविक टूर्नामेंट को यथासंभव सुचारू रूप से चलाया जाए। इसका मतलब यह भी है कि वह अन्य एथलीटों से बात करने के लिए उपलब्ध रहेंगी और यह सुनिश्चित करेंगी कि उनके हितों को ध्यान में रखा जाए।

हालांकि, कॉम की प्राथमिक चिंता यह सुनिश्चित करने पर होगी कि वह अपने ओलंपिक स्थान को सुरक्षित करने में सफल रहें। रियो 2016 के लिए क्वालिफ़ाई करने से चूकने के बाद टोक्यो में होने वाले आगामी खेलों में वह यह मौका नहीं खोना चाहेंगी। लेकिन अब से लेकर जुलाई के बीच चाहे जो कुछ भी हो, भारतीय खेल के इतिहास में कॉम का एक सुनहरा स्थान सुनिश्चित है। एक अद्भुत बॉक्सर जिसने सभी सीमाओं को तोड़ते हुए कई मानकों को निर्धारित किया। जिसके द्वारा बॉक्सरों की भावी पीढ़ियों का आकलन किया जाएगा।

शानदार मैरी, वास्तव में...

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