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जानिए कौन हैं, नंदिनी सलोखे और स्वाति शिंदे जैसी शार्गिदों के जरिए अपना सपना जीने वाले पूर्व पहलवान दादा लवाटे?

ओलंपिक चैनल ने ऐसे व्यक्ति की जीवन यात्रा के बारे में पता लगाया, जो अपने शिष्यों को उंचाइयों पर पहुंचाने में मदद करने के लिए दृढ संकल्पित रहे  

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

अखाड़ा, दंगल, और पहलवानी, ये तीन शब्द, प्रसिद्ध कुश्ती कोचदादा लवाटे (Dada Lavate) के परिवार में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाते थे।

हाल ही में नंदिनी सलोखे (Nandini Salokhe) द्वारा 53 किग्रा वर्ग में राष्ट्रीय कुश्ती का खिताब जीतने और टोक्यो जाने वाली विनेश फोगाट के बैकअप के रूप में चुने जाने के बाद लवाटे चर्चाओं में आ गए हैं। उनकी एक और शिष्य स्वाति शिंदे (Swati Shinde) ने भी नेशनल्स में अच्छा प्रदर्शन करते हुए 50 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता।

लवाटे खुद एक पहलवान रहे थे और उन्होंने ओलंपिक चैनल के साथ एक चैट में अपने शुरुआती दिनों की याद को ताजा किया।

वह महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के मालसीरास तालुका के एक गांव में संपन्न कुश्ती संस्कृति के बीच पले-बड़े। उनके पिता पहलवान थे, जिन्होंने उनको इस खेल को अपनाने में सहजता प्रदान की।

पांचवीं कक्षा में उन्होंने पहली बार कुश्ती के मैदान में कदम रखा। उस समय वहां एक सही तरीके के सिंथेटिक मैट पर कुश्ती करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मिट्टी और गीली मिट्टी से भरा मैदान मिला था। लवाटे को समझ आ गया कि अगर कुश्ती में बड़ा नाम करना है तो उसे मालसीरास से बाहर निकलना होगा।

कोच ने ओलंपिक चैनल को बताया, "मैं एक मौके की तलाश में था। उसी दौरान पुणे में अभ्यास करने वाले एक पहलवान तन्हाजी लांगडे हमारे गांव आये थे। उन्होंने मुझे कुश्ती करते हुए देखा और मेरे पास आकर सलाह दी किभारतीय खेल प्राधिकरण (SAI), सांगली में हो रहे ट्रायल में जाना चाहिए।"

लांगडे भी ट्रायल पर उनके साथ सांगली गए और इसमें चयनित होकर युवा पहलवान ने उन्हें निराश नहीं किया। इसके बाद उन्हें ऐसा लगा कि अब जीवन बेहतर के लिए बदल जाएगा।

"मैंने मैट पर कुश्ती शुरू कर दी। मेरी पढ़ाई का भी ध्यान रखा गया और मैं एक अच्छे कोच के अधीन अभ्यास कर रहा था। आखिरकार, मैं फिर से सपने देख सकता था।

2002 में उन्होंने 50 किलोग्राम भार वर्ग में स्कूल नेशनल में पदक जीता और तीन साल बाद 55 किलोग्राम भार वर्ग में यूनिवर्सिटी नेशनल में रजत पदक पर कब्जा जमाया।जैसे-जैसे उनके प्रशिक्षण की प्रबलता बढ़ती गई, तो उनकी आहार संबंधी जरूरतों को पूरा करना जेब पर भारी पड़ने लगा। उनका परिवार बहुत कम बजट में गुजारा करता था। ऐसे में उनके खर्चे ने परिवार को आर्थिक परेशानियों के बोझ तले दबा दिया। 

"नकद पुरस्कार जीतने के लिए मैंने दंगलों (स्थानीय कुश्ती टूर्नामेंट) में भाग लेना शुरू कर दिया। इनमें से एक सोलापुर में हुआ था, जिसका आयोजन नागेश गायकवाड ने किया था। मैंने वहां कई कुश्ती मुकाबले जीते। वो मेरी कुश्ती से प्रभावित हुए थे। परिवार की खराब आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने मुझे हर महीने 2000 रुपये की मदद करने की सहमति दी।"

इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर का टूर्नामेंट जीतने पर उसे 5000 का इनाम दिया जाता था।

उन्होंने कहा, "इसने मेरा आत्मविश्वास बढ़ा दिया। मैं प्रेरित होकर और कठिन अभ्यास करने लगा। मेरा परिवार मेरे आहार की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता था। अगर यह स्पॉन्सरशिप नहीं मिलती तो, मैं बहुत पहले ही कुश्ती छोड़ देता।

राष्ट्रीय चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने के बाद नंदिनी सलोखे के साथ दादा लवाटे

लवाटे ने एक और कदम उठाते हुए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (NIS), पटियाला में आवेदन किया। उन्होंने शारीरिक शिक्षा में स्नातक की पढ़ाई पूरी की, लेकिन नियति के पास उसके लिए दूसरी योजनाएं थीं।

उन्होंने कहा, "तब तक मैं खुद का काम चलाने के लिए पर्याप्त कमा रहा था, लेकिन मेरा परिवार मुसीबत झेल रहा था। इतना ही नहीं इस दौरान मुझे घुटने की चोट की परेशानी से भी गुजरना पड़ा। चोट के कारण मुझे पांच-छह महीने तक कुश्ती से बाहर रहना पड़ा। इसके बाद मुझे हमेशा एक डर लगा रहता था कि अगर ऐसा दोबारा हुआ, तो मैं क्या करूंगा। इस कारण मुझे गांव लौटना पड़ा और नौकरी करना शुरू कर दिया।

करीब दो साल के अंतराल के बाद उन्हें उम्मीद की एक किरण नजर आई, जब कोल्हापुर के मुर्गुद में एक SAI प्रशिक्षण केंद्र की की स्थापना हुई।

उन्होंने कहा, "उस समय महाराष्ट्र में सीवी चौहान SAI के समन्वयक थे। मैंने उनके अधीन प्रशिक्षण लिया था। उन्हें पता था कि मैं खाली बैठा हूं, तो उन्होंने कोच के लिए मेरे नाम की सिफारिश की थी।"

लवाटे को जीवन में एक नया पट्टा मिला। उन्हें अब एक बार फिर से कोच के रूप में अपने सपनों को जीने का मौका हासिल हुआ।

"SAI केंद्र में केवल 20 पहलवानों को रखने की क्षमता थी। चौहान सर ने कहा कि लड़के और लड़कियों की संख्या बराबर होनी चाहिए। इसलिए 10 लड़कियों के लिए और 10 सीट लड़कों के लिए तय की गईं। नंदिनी (सलोखे) और स्वाति (शिंदे) को पहले बैच में ही स्काउट किया गया था।"

"केन्द्र के लिए महिला उम्मीदवारों का मिलना काफी मुश्किल था। इसके लिए मुझे गांवों घूमना पड़ा और कुछ अभिभावकों को यह विश्वास दिलाना पड़ा कि SAI, सेंटर में रहने वाली लड़कियों को वजीफा देता है और अगर वो नेशनल जीतती हैं तो उनको नौकरी भी मिल सकती है। इसके बाद चार लड़कियां आईं।"

वर्तमान में SAI केंद्र में 150 से अधिक कैडेट हैं। एक पहलवान के रूप में भले ही वो कमजोर रहे हों, लेकिन एक प्रशिक्षक के रूप में उन्होंने अपना नाम बनाया है। उन्होंने एक छात्रावास का निर्माण कराया है, जिसमें 50 लड़कियों को रखना का पूरा खर्चा वो खुद उठाते हैं।

उन्होंने कहा, "कई विद्यार्थी दूसरे जिलों से आए थे और उन्हें यहां किराए पर रहने की जगह लेनी पड़ी। मैंने छात्रावास जनवरी, 2019 में शुरू किया था और इसके लिए किसी से कोई मदद नहीं मांगी। क्योंकि कई लोग सोचते थे कि मैं इसे अपने लिए बना रहा हूं। यह SAI केंद्र से 1 किमी की दूरी पर है। पहले कई लड़कियां को हॉस्टल में कमरा नहीं मिलने के कारण वापस जाना पड़ता था, लेकिन अब उन्हें वापस जाने की ज़रूरत नहीं है।"

लड़कियां जहां भी जाती हैं लवाटे उनके साथ होते हैं। वो हाल ही में संपन्न हुए नेशनल्स के दौरान आगरा में थे, जहां नंदिनी सलोखे ने 53 किग्रा भार वर्ग में स्वर्ण तथा स्वाति ने 50 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक जीता था।

"हम नेशनल के आयोजन से तीन दिन पहले आगरा पहुंच गए थे। क्योंकि यहां हमें ठंडे मौसम के साथ अनुकूल होना था। यहां और कोल्हापुर का मौसम अलग था। ऐसा करने से बाद में बहुत फायदा हुआ।"

हालांकि, वह केवल इन सफलताओं को हासिल करके ही नहीं रूकना चाहते। उनका लक्ष्य ओलंपिक में पोडियम फिनिश के साथ सितारों तक पहुंचने का है।

उन्होंने कहा, "मैं आर्थिक परेशानियों और घुटने की चोट के कारण ज्यादा दूर तक जा पाया था, लेकिन वे अच्छा कर रहे हैं। यह देखकर अच्छा लगता है, लेकिन ये तो अभी शुरूआत है। क्योंकि, सफलता की यह यात्रा तो अभी शुरू हुई है।"