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ओलंपिक में बास्केटबॉल का इतिहास: अमेरिकी टीम का ख़ास है जलवा

विश्व भर में प्रसिद्ध बास्केटबॉल गेम ने ओलंपिक गेम्स में एक ऊँचा स्तर हासिल कर लिया है। इसका श्रेय अमेरिकी बास्केटबॉल टीम को जाता है और साथ ही उन्होंने अपना जलवा कायम रखते हुए ड्रीम टीम भी बनाई।

लेखक जतिन ऋषि राज ·

बास्केटबॉल गेम का जन्म यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका (USA) में सन 1891 में हुआ था। इस खेल के मनोरंजन को देखते हुए वहां के लोगों ने बहुत ही जल्द इसे अपना लिया और आज पूरे विश्व में इस खेल को खूब खेला और देखा जाता है।

स्प्रिंगफील्ड, मैसाचुसेट्स से शुरू हुए बास्केटबॉल खेल ने अपना वर्चस्व स्कूल और कॉलेज में फैला दिया और इसे पेशेवर होने में भी ज़्यादा समय नहीं लगा। बास्केटबॉल ने विश्व के सबसे बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और दर्शकों ने इसे बेहद प्यार दिया।

ओलंपिक में बास्केटबॉल कब शुरू हुआ ?

ओलंपिक गेम्स में पहली बार इस खेल को 1904 में लाया गया। सैंट लुइस में बास्केटबॉल को पहली बार महज़ दर्शाने के लिए पेश किया गया और इसके बाद 1936 ओलंपिक गेम्स में इस खेल को मेडल इवेंट करार किया गया। वहीं महिला बास्केटबॉल ने म्यूनिख गेम्स 1976 में अपना डेब्यू किया था। ऐसे हुई बास्केटबॉल हिस्ट्री की शुरुआत।

अब 3x3 बास्केटबॉल गेम टोक्यो 2020 से ओलंपिक गेम्स में अपना डेब्यू करने जा रहा है।

जापान ओलंपिक गेम्स में बास्केटबॉल को मेंस और वुमेंस इवेंट में बांटा गया है। दोनों ही इवेंट में कुल 12-12 टीमें हिस्सा लेंगी।

ग़ौरतलब है कि 7 टीमें ओलंपिक गेम्स में FIBA वर्ल्ड कप के ज़रिए हिस्सा लेंगी और 4 टीमों को FIBA ओलंपिक क्वालिफाइंग टूर्नामेंट के तहत आगे जाना होगा और एक टीम सीधा ही क्वालिफाई करेगी और वह मेज़बान होगी।

किस देश की बास्केटबॉल टीम ने ओलंपिक इतिहास में सबसे ज़्यादा गोल्ड मेडल जीते हैं ?

बास्केटबॉल के ओलंपिक इतिहास में अमेरिका सबसे सफल टीम है। यूएसए ओलंपिक मेंस बास्केटबॉल टीम ने कुल 15 बार ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता है और यह आंकड़े उनकी सफलता को दर्शाने के लिए काफी हैं। 1936 से 1968 तक यह टीम लगातार पोडियम का सबसे ऊपरी हिस्सा अपने नाम करती रही थी।

वहीं दूसरी ओर अमेरिकी वुमेंस बास्केटबॉल टीम ने 8 बार गोल्ड मेडल पर अपने नाम की मुहर लगाई है। इतना ही नहीं, अटलांटा 1996 में इस टीम ने बिना कोई मुकाबला गंवाए अपने कारवाँ को अंजाम दिया था।

यूएसए का ओलंपिक बास्केटबॉल में जलवा

जब इस खेल ने दुनिया भर में अपनी पकड़ मज़बूत की तो इसका श्रेय यंग मेंस क्रिश्चियन एसोसिएशन (Young Men’s Christain Association – YMCA) को दिया गया। परिणाम के रूप में 21 टीमों ने बर्लिन 1936 गेम्स में भाग लिया और वहां से आज तक इस खेल को हमेशा उच्च कोटि का दर्जा मिला है।

हालांकि अमेरिकी टीम के आगे कोई टिक नहीं पाया और उनकी टीम ने बिना कोई मुकाबला हारे गोल्ड मेडल पर अपनी पकड़ बनाई।

जैसे जैसे समय आगे बढ़ा वैसे वैसे अमेरिकी खिलाड़ियों ने अपना दबदबा बढ़ा लिया और अपने ओलंपिक के खिताब को एक बार अपने हक में कर लिया।

1948 गेम्स में यूएसए बास्केटबॉल टीम ने फाइनल मुकाबले में फ्रांस को 65-21 से मात दी और हमेशा की तरह जीत को अपने नाम किया। सोवियत यूनियन, USSR (उस समय) अगले 4 साल तक अमेरिका से हारी और गोल्ड से वंचित रही। ऐसा साल 1952, 1956, 1960 और 1964 में लगातार हुआ।

अमेरिकी बास्केटबॉल टीम तो लगातार ऊपर जा ही रही थी लेकिन सोवियत यूनियन ने भी इस खेल में अपनी पकड़ मज़बूत कर ली थी और भविष्य के लिए उन्होंने अपना नाम सुनहरे अक्षरों में लिख दिया था।

सोवियत युनियन ने कॉन्टिनेंटल स्तर पर अपनी पकड़ बनाई और द्विवार्षिक यूरोपीय बास्केटबॉल चैंपियनशिप को 10 बार अपने नाम किया। ऐसा उन्होंने साल 1951 से 1971 तक किया और इतना ही नहीं आगे चलकर इस टीम ने FIBA वर्ल्ड चैंपियनशिप 1972 भी अपने नाम की।

जब 1972 म्यूनिख ओलंपिक गेम्स का आगमन हुआ तो सोवियत का एक ही लक्ष्य था और वह था गोल्ड मेडल जीतना।

म्यूनिख में अमेरिका को लगा झटका

म्यूनिख गेम्स भी अमेरिकी बास्केटबॉल टीम को ही सबसे पसंद किया जा रहा था। ग़ौरतलब है कि सोवियत ने अमेरिका को 1970 वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स के फाइनल में मात दी थी और तो और 1971 पैन अमेरिकन गेम्स में कोई भी मेडल नहीं जीत सकी।

इस टीम की कोई कमज़ोर कड़ी थी तो वह अंतरराष्‍ट्रीय खिलाड़ियों की कमी। ओलंपिक गेम्स में सिर्फ एमेचुअर खिलाड़ी ही हिस्सा ले सकते थे और इसी वजह से NBA से जुड़कर ‘प्रोफेशनल’ बनें खिलाड़ियों को अपना नाम वापस लेना पड़ा और यही इस टीम की चिंता का विषय भी बना।

इससे पहले भी ऐसी मुश्किलों को मात देते हुए अमेरिकी टीम आगे बढ़ी थी लेकिन इस बार सोवियत भी मज़बूत इरादे के साथ तैयार थी। जहां ओलंपिक में एमेचुअर खिलाड़ी ही हिस्सा ले सकते थे वहीं बाकी देशों ने अपने ख़ास खिलाड़ियों को फ़ौज में भर्ती किया और उन्हें ओलंपिक में खेलने की अनुमति दिलाई। इस तरह बास्केटबॉल के नियमों का उलंघन होता गया।

अब यूएसए की टीम में हाई स्कूल के डग कॉलिंस (Doug Collins) और नार्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के टॉमी बर्लेसन (Tommy Burleson) थे। वहीं सोवियत की टीम में अनुभवी खिलाड़ी सर्गेई बेलोव (Sergei Belov), मोडेस्टास पॉलुस्कास (Modestas Paulauskas) और अलेक्जेंडर बेलोव (Alexander Belov) खेलते नज़र आए।

एक बार फिर सोवियत और अमेरिकी बास्केटबॉल टीमें फाइनल में एक दूसरे के आमने सामने थी और पूरे विश्व को लग रहा था की कांटे की टक्कर होने वाली है लेकिन सोवियत के दिमाग में कुछ अलग ही चल रहा था।

सोवियत यूनियन बास्केटबॉल टीम ने बेहतरीन बॉल प्ले से खेल को अपने हाथ में रखा और लगातार कोर्ट की गहराई का इस्तेमाल भी करते रहे। मुकाबले के पहले भाग के बाद सोवियत 26-21 से आगे थी और मुकाबला किसी भी ओर जा सकता था।

माइक बैनटम (Mike Bantom), NBA प्लेयर डेवलपमेंट के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट ने न्यू यॉर्क टाइम्स से बात करते हुए कहा “हमने रूस के खिलाफ संघर्ष किया क्योंकि वह खेल की गति को नियंत्रण में रखते हैं।”

अगले भाग में अमेरिकी टीम ने ज़बरदस्त वापसी की और अपने प्रतिद्वंदी को बाँध कर रखा। 8 अंक से पीछे चल रही यूएसए टीम ने सोवियत पर दबाव बनाया और आखिरी के 6 सेकंड में अब वह महज़ 1 अंक पीछे थी।

अब मुकाबला अपने चरम पर था और अमरीकी बास्केटबॉल खिलाड़ी डग कॉलिंस ने गेंद को ‘स्टील’ किया और इसके बाद सोवियत यूनियन ने उन्हें फ़ाउल भी तोहफे में दे दिया। फ़ाउल को झोली में डालते हुए डग कॉलिंस ने दो बास्केट अपने नाम की और अब उनकी टीम 1 अंक से आगे चल रही थी।

मुकाबले में सिर्फ 1 सेकंड बचा था तो सोवियत ने टाइम आउट ले लिया और रणनीति बनाने का फैलसा किया। खेल दोबारा शुरू हुआ और सोवियत ने जैसे ही गेंद अपने कब्ज़े में की वैसे ही आखिरी सीटी बज गई और मुकाबले मानों यूएसए के हित में चला गया।

वहीं बैठे FIBA अध्यक्ष ने खेल के आखिरी 3 सेकंड को दोबारा से शुरू करने की मांग रखी और यहीं पर पूरा खेल पलट गया।

अब सोवियत ने अपना अनुभव जोड़ा और मुकाबले को अपने नाम किया। ऐसा पहली बार हुआ था कि ओलंपिक के मंच पर यूएसए को हार का सामना करना पड़ा। अंतिम समय के हीरो रहे अलेक्जेंडर बेलोव और सोवियत यूनियन के हाथों आया गोल्ड मेडल।

हालांकि अमेरिकी टीम ने इस निर्णय को खारिज करने की कोशिश की लेकिन इसे बदला नहीं गया। इस तरह सोवियत युनियन बना बास्केटबॉल चैंपियन।

सके बाद योएसए की टीम ने सिल्वर मेडल लेने से इनकार कर दिया और वह मेडल आज भी लुसाने, स्विट्ज़रलैंड के ओलंपिक म्यूज़ियम में रखा है।

द ड्रीम टीम

आने वाले सालों में बहुत से टीमों ने एमेचुअर बास्केटबॉल के नियमों को टटोला और उनका फायदा उठाने की कोशिश की। इसके बाद FIBA ने 1992 बार्सिलोना ओलंपिक गेम्स में ‘प्रोफेशनल’ खिलाड़ियों को ओलंपिक में भाग लेने की अनुमति दी और एक बार फिर इस खेल ने अपना जलवा कायम रखा।

इतना ही नहीं बास्केटबॉल के इस नियम में बदलाव आने के बाद यूएसए ने आज तक की सबसे घातक टीम बना ली।

1972 म्यूनिख ओलंपिक गेम्स में सोवियत ने यूएसए को फाइनल मुकाबले में पस्त किया।

इस टीम में जाने माने खिलाड़ी माइकल जॉर्डन (Michael Jordan), लैरी बर्ड (Larry Bird), मैजिक जॉनसन (Magic Johnson), पेट्रिक एविंग (Patrick Ewing), स्कॉटी पिपेन (Scottie Pippen) और कार्ल मलोने (Karl Malone) थे।

इस ड्रीम टीम को चक डैली (Chuck Daly) द्वारा कोच किया जा रहा था। ग़ौरतलब है कि चक डैली दो बार के NBA चैंपियन हैं।

इस ड्रीम टीम ने ओलंपिक गेम्स में आ कर हल्ला बोला और गोल्ड मेडल पर अपना नाम लिख दिया। यह टीम ऐसी पहली टीम बनी जिसने ओलंपिक गेम्स के हर मुकाबले में 100 अंक हासिल किए थे। ऐसे में उनके कोच ने कहा “इसे देख कर ऐसा लग रहा है कि अपने एल्विस और बीटल्स को एक साथ रख दिया हो।”

1992 बार्सिलोना गेम्स के बाद NBA ने बाहरी देशों से खिलाड़ियों को आमंत्रित करना शुरू कर दिया और ऐसे में बास्केटबॉल गेम को याओ मिंग (Yao Ming) और एंड्रिया बर्गनानी (Andrea Bargnani) जैसे खिलाड़ी मिले। साथ ही डिर्क नोविट्ज़की (Dirk Nowitzki) और जियानिस एन्टेटोकुन्पो (Giannis Antetokounmpo) ने NBA एमवीपी का पुरूस्कार भी अपने नाम किया।

ओलंपिक में महिला बास्केटबॉल का इतिहास

जहां पुरुष बास्केटबॉल टीम ने ओलंपक गेम्स में इतिहास बनाया है वहीं महिला बास्केटबॉल टीम ने भी कमाल किया है।

1976 में अपना डेब्यू कर महिला बास्केटबॉल इवेंट ने हमेशा ही ओलंपिक में अपने वर्चस्व को बरक़रार रखा है दर्शकों को भी इनसे लगातार प्यार मिलता रहा है।

यूएसए की महिला बास्केटबॉल टीम वुमेंस ओलंपिक में 8 खिताबों के साथ सबसे सफल टीम है।

सोवियत यूनियन पहली महिला टीम बनी जिसने ओलंपिक गेम्स में गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा जमाया। इस टीम ने यूएसए को मात देते हुए यह कारनामा किया। इसके बाद 1980 में भी सोवियत ने पोडियम पर सबसे ऊपरी हिस्से को पकड़ में रखा लेकिन इसके बाद लगातार दो संस्करणों में अमेरिकी महिला बास्केटबॉल टीम ने बाज़ी मारी।

इसके बाद अमेरिका ने 1996 अटलांटा में भी खिताब जीता और उसके बॉस हर संस्करण में वे अव्वल रहे।