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ओलंपिक का सपना त्याग मांगता है- दिव्यांश सिंह 

दुनिया के नंबर 1 शूटर ने अपनी शूटिंग खेल में यात्रा और आगामी ओलंपिक की तैयारियों के बारे में किया खुलासा  

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

भारत में यह अक्सर देखा जाता है कि बच्चे अपने माता-पिता की ख्वाहिश को पूरा करने के लिए एक पेशा चुनते हैं। दिव्यांश सिंह पंवार (Divyansh Singh Panwar) के पिता शूटर बनना चाहते थे, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उन्हें दूसरा रास्ता चुनना पड़ा।

इसलिए छोटी उम्र में ही उन्होंने अपने बेटे का एक ऐसे खेल से परिचय करवाया, जिसमें वो अपना करियर बनाने का सपना देखा करते थे। इसको लेकर वो बहुत गंभीर थे। यही कारण था कि उन्होंने पहली बार जब दिव्यांश को बंदूक थमाई, तो वह कोई खिलौना नहीं, बल्कि एक पेशेवर शूटिंग राइफल थी।

दिव्यांश पंवार ने ओलंपिक चैनल को बताया, “11-12 साल की उम्र में उन्होंने मुझसे कहा था 'दिव्यांग शूटिंग के लिए चलते हैं। मुझे लगा कि वह मुझे जयपुर में होने वाली किसी फिल्म की शूटिंग देखने के लिए ले जाएंगे, शायद वहां सलमान खान या ऐश्वर्या राय होने चाहिए।”

“लेकिन हम जंगपुरा शूटिंग रेंज में पहुंचे। वहां जगह-जगह गोलीबारी हो रही थी। मैं थोड़ी उलझन में था। इसके अगले दिन उन्होंने मुझे एक बंदूक थमाई, जो शायद 6000 रुपये कीमत की एक भारत निर्मित बंदूक थी। जबकि, इससे पहले कभी मैंने खिलौने वाली बंदूक भी नहीं उठाई थी।”

दिलचस्प बात यह है कि दिव्यांश को जल्द ही यह खेल पसंद भी आ गया। कुछ दिनों के भीतर उसने पड़ोसियों की खिड़की के शीशे पर निशाना साधना शुरू कर दिया और निश्चित रूप से इसको लेकर उनके माता-पिता के पास शिकायतें भी आने लगीं।

“ऐसा करने से रोकने और शिकायतों से बचने के लिए मेरे पिता ने हमारे घर की छत पर शूटिंग के लिए लक्ष्य तैयार किया। मैं हमेशा निशानेबाजी में था और कभी किसी अन्य खेल को अपनाने की कोशिश नहीं की।”

जल्द ही दिव्यांश ने प्रतिस्पर्धी टूर्नामेंटों में भाग लेना शुरू कर दिया और 2015 में जूनियर नेशनल्स के दौरान उनकी वर्तमान कोच दीपक कुमार दुबे से मुलाकात हुई।

वह जूनियर्स में अच्छा कर रहे थे, लेकिन नई दिल्ली में 2019 विश्व कप के दौरान उनकी असली परीक्षा होनी थी, जिसमें वो शीर्ष पांच में स्थान नहीं बना सके। इसके बाद उन्हें समझ में आ गया कि बड़े मंचों पर अच्छा प्रदर्शन करने के लिए उसे अपने खेल में सुधार और अपनी मानसिकता में बदलाव करने की ज़रूरत है।

पंवार ने कहा, “सीनियर्स में सफल होने के लिए आपको एक अलग तरह के प्रोत्साहन की जरूरत होती है।”

शूटिंग राइफल के साथ दिव्यांश सिंह पंवार

“पहले मैंने खेल को सिर्फ अपने आनंद के लिए चुना था। मैंने कभी स्कोरबोर्ड की तरफ नहीं देखा। जब मैंने ध्यान देना शुरू किया तो इसके परिणाम अच्छे मिले। लेकिन बड़े मंचों पर सफल होने के लिए बार-बार खुद से प्रोत्साहित होने में मैं समर्थ नहीं था। अब मैं मनोवैज्ञानिक के साथ सत्रों में शामिल होता हूं। यह मन को नियंत्रित करने और ध्यान केंद्रित करने के लिए महत्वपूर्ण है। चीजें बदल गई हैं और अब बहुत बेहतर हैं।”

वास्तव में चीजों ने बेहतरी के लिए एक मोड़ ले लिया है। 18 साल की उम्र में उन्होंने छह स्वर्ण, दो रजत, विभिन्न एशियाई चैंपियनशिप और विश्व कप में कांस्य पदक हासिल किया। हालांकि, उन्हें लगता है कि म्यूनिख में H&M कप सबसे मुश्किल लड़ाई का मैदान था।

उन्होंने कहा, “यह खुली प्रतियोगिता है। यहां आप उच्च स्कोर हासिल करते हैं। इसमें कोई भी भाग ले सकता है। तीन-चार बार के ओलंपियन से कुछेक पदक धारक भी हो सकते हैं। वास्तव में यह बहुत मुश्किल था। फिर भी मैंने अच्छा प्रदर्शन किया और एक पदक जीता। इसलिए मेरे लिए संतोषजनक था।”

वह टोक्यो में एक प्रभावशाली प्रदर्शन करने के लिए तैयार हैं और पोडियम फिनिश हासिल करने के लिए तैयारी में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

पहले दिए गए एक साक्षात्कार में पंवार ने कहा, “मैंने हर तरह के वीडियो गेम से दूरी बना ली है। सब कुछ बंद कर दिया है।” उनके पिता ने कहा था कि उन्होंने दिव्यांश को शूटिंग गेम में उतारा है, इसलिए वह पबजी खेलने में कम समय व्यतीत करेगा।

“मुझे एक कुत्ता मिल गया और मैं अपना ज्यादातर समय उसके साथ गुजारता हूं। अभ्यास से लौटकर उसके साथ समय बिताना बहुत सुकून देकता है। मेरे पास एक गिटार भी है। हालांकि मैं इसे अच्छे से नहीं बजा सकता, लेकिन फिर भी कोशिश करता हूं। इसके अलावा योगा और ध्यान भी करता हूं। मुझे संगीत सुनना बहुत अच्छा लगता है। मैं कई गाने सुनता हूं, जो मुझे आराम देते हैं।”

उनके दिन की शुरुआत सुबह 5:30 बजे योग के साथ होती है और आमतौर पर रात 10 बजे सो जाते हैं। इस बीच में वह रोजाना करीब छह घंटे रेंज में अभ्यास के लिए बिताते हैं और आहार नियमों की पालना करते हैं।

“आहार में चीनी का तो बिल्कुल इस्तेमाल नहीं होता। आमतौर पर बाहर का खाना नहीं दिया जाता। बहुत कम ही मौकों पर बाहर का खाना दिया जाता है।”

सख्त दिनचर्या के बावजूद वह खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में नहीं आंकते हैं जो सभी काम करे और कोई नाटक नहीं करता। उसका अपने रूममेट और साथी शूटर विवेक सिंह भदौरिया के साथ एक मजबूत रिश्ता है उसे यात्रा करना पसंद है।

“मैं जीवन का आनंद लेने की कोशिश करता हूं। मैं अपने पुनर्वसन के लिए शिमला जाऊंगा और फिर थोड़ा घूमूंगा। मैं मध्य प्रदेश भी गया हूं। मैं जो कुछ भी करता हूं उसमें हमेशा अपना 100 फीसदी देता हूं। जब मैं रेंज में होता हूं तो मेरा ध्यान इसी पर रहता है और जब परिवार के साथ होता हूं, तो उनके साथ क्वालिटी टाइम बिताता हूं। जब मैं अपने परिवार के साथ होता हूं तो रेंज में नहीं जाऊंगा।”

पंवार ओलंपिक से पहले अपने ध्यान को और बेहतर बनाना चाहते हैं। वह अपनी तकनीक के साथ आश्वस्त हैं, लेकिन उनका मानना ​​है कि एकाग्रता पर काम करने से वह ज्यादा परिपक्व एथलीट बन जाएंगे।

“मुझे ध्यान केंद्रित करने के साथ मानसिक रूप से मजबूत बनने की जरूरत है। क्योंकि हमारा खेल 70 प्रतिशत मानसिक है। इसमें केवल 30 प्रतिशत ही शारीरिक भागीदारी है। ओलंपिक में देरी होने से मुझे तैयारी करने के लिए और अधिक समय मिल गया है।”

लक्ष्य तय है और हर गुजरते दिन के साथ उत्कृष्ठता के लिए उस लक्ष्य का पीछे करने की शीघ्रता होती है। उनका अगला टूर्नामेंट ISSF शूटिंग विश्व कप है, जो 18 मार्च से नई दिल्ली में होने वाला है। वह राष्ट्रीय ट्रायल में अच्छी लय में थे और विश्व कप में उनसे एक दमदार प्रदर्शन की उम्मीद है जो जुलाई में होने वाले ओलंपिक गेम से पहले उनका मनोबल बढ़ायेगा।

वह अनुशासित जीवन शैली, सख्त आहार नियम और पिछले कुछ वर्षों में हर छोटे समझौतों की शर्तों पर इस खेल में आए हैं। किशोर से एक ओलंपियन बनने के लिए यह सब या कुछ भी नहीं है।

“खुद को लेन में खड़े होकर एक मैच खेलने और फाइनल में जीतने की कल्पना मेरे दिमाग में चलती रहती हैं।”

“अगर आप ओलंपिक के बारे में सपना देख रहे हैं, तो आपको त्याग करना होगा। अभी जिंदा हूं ओलंपिक के लिए (अभी मैं ओलंपिक के लिए जी रहा हूं)।”

जो कभी उनके पिता का सपना था, अब वह उनके जीवन को परिभाषित करता है।