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ओलंपिक गेम्स में बैडमिंटन का सुनहरा इतिहास

1992 बार्सिलोना गेम्स में बैडमिंटन को ओलंपिक गेम्स का हिस्सा बनाया गया था और तब से लेकर अब तक इस खेल ने ओलंपिक गेम्स में अपनी ख़ास जगह बना ली है।

लेखक जतिन ऋषि राज ·

एक ऐसा खेल जो भारत, चीन और ग्रीस के इतिहास को भी दर्शाता है वह खेल आज घर-घर में देख जा रहा है। जी हाँ, बैडमिंटन एक ऐसा खेल है जो खिलाड़ी और प्रशंसकों दोनों को ही खेल से जोड़े रखता है।

बैडमिंटन का थ्रिल उसकी गति और फ्लो में बस्ता है। तेज़ गति से स्मैश शॉट्स और वहीं नेट के पास सटीक ड्रॉप जैसी चीज़ें ही तो इस खेल में रूचि बढ़ा देती है। यह खेल पूरी दुनिया में खेला जाता है इसके बढ़ते माहौल की वजह से बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन ने इस खेल को ओलंपिक गेम्स का रेगुलर खेल बना दिया।

पहली बार बैडमिंटन को म्यूनिख गेम्स 1972 में प्रमाण के रूप में शामिल किया गया था और वहीं इस खेल ने ओलंपिक में डेब्यू 1992 बार्सिलोना गेम्स में किया था।

बैडमिंटन को ओलंपिक गेम्स में काफी देर से लाया गया जिस वजह से लिएम स्वी किंग (Liem Swie King), प्रकाश पादुकोण (Prakash Padukone), मोर्टन फ्रॉस्ट (Morten Frost), ली लिंगवेई (Li Lingwei) और हान ऐपिंग (Han Aiping) जैसे दिग्गज ओलंपिक खेलों से वंचित रह गए। उस ओलंपिक के एरा ने दुनिया भर में कुछ नए भारतीय मेंस और वुमेंस चैंपियन दे दिए और आज उनका नाम खेल की दुनिया में इज्ज़त से लिया जाता है।

बार्सिलोना 1992: इंडोनेशिया, साउथ कोरिया का क्लीन स्वीप

सूसी सुसंती (Susi Susanti) ओलंपिक मेडल जीतने वाली पहली बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं। इन्होनें साउथ कोरिया की बैंग सू-ह्यून (Bang Soo-Hyun) को सिंगल्स में हराते हुए यह कीर्तिमान स्थापित किया। ग़ौरतलब है कि यह मेडल इंडोनेशिया के लिए पहला गोल्ड मेडल साबित हुआ।

इतना ही नहीं बल्कि एलन बुडीकुसुमा (Alan Budikusuma) ने इंडोनेशिया की मेडल टैली में इजाफा किया था। इस संस्करण में यानी बैडमिंटन के पहले संस्करण में इंडोनेशिया ने मेंस और वुमेंस गोल्ड मेडल अपने हक में रखा था।

सूसी सुसंती ने बैडमिंटन मैकन पहला ओलंपिक मेडल जीता

साउथ कोरियाई जोड़ी किम मून-सू (Kim Moon-soo) और पार्क जू-बोंग (Park Joo-bong) ने पहला डबल्स मेंस गोल्ड मेडल जीता था तो वहीं वुमेंस डबल्स में ह्वांग ह्ये-यंग (Hwang Hye-young) और चुंग सो-यंग (Chung So-young) ने पोडियम के सबसे ऊपरी हिस्से पर जगह बनाई थी।

डेनमार्क के खिलाड़ी थॉमस स्टूर लौरिडसेन (Thomas Stuer-Lauridsen) ऐसे नॉन-एशियन खिलाड़ी रहे जिन्होंने मेंस सिंगल्स में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता।

उस इवेंट में भारत की ओर से तीन शटलर हिस्सा ले रहे थे और वह थे दीपांकर भट्टाचार्य (Deepankar Bhattacharya), यू विमल कुमार (U Vimal Kumar) और मधुमिता बिष्ट (Madhumita Bisht)।

ओलंपिक गेम्स में दीपांकर भट्टाचार्य और बिष्ट ने दूसरे राउंड तक का सफ़र तय किया था तो वहीं विमल कुमार पहले ही राउंड में बाहर हो गए थे। इसके बाद भट्टाचार्य पर विमल कुमार ने मेंस डबल्स में एक साथ हिस्सा लिया यकीन ओपनिंग राउंड में ही उन्हें बाहर का रास्ता दिखा गया।

अटलांटा 1996: मिक्स्ड डबल्स का प्रवेश

जहां ओलंपिक डेब्यू में बैडमिंटन में 4 ही वर्गों (मेंस सिंगल्स, वुमेंस सिंगल्स, मेंस डबल्स, वुमेंस डबल्स) को अनुमति दी गई थी लेकिन अटलांटा 1996 में मिक्स्ड डबल्स को भी देखा गया था।

इस संस्करण में सेमीफाइनल में हारे खिलाड़ियों के बीच मुकाबला कर ब्रॉन्ज़ मेडल विजेता का फैसला किया गया था और इस वजह से इस खेल में कुल 15 मेडल दिए गए थे।

एशियन देशों ने 15 में से 14 मेडल जीत कर इस खेल पर पूरी तरह से कब्ज़ा कर लिया था और मानों वह इस खेल से जुड़े हर दाव पेच को बारीकी जानने लग गए थे। इस संस्करण में भी एशियन देश के अलावा डेनमार्क के एक खिलाड़ी ने मंडला जीता था।

इस बार डेनमार्क के पौल-एरिक हॉयर लार्सन (Poul Erik Hoyer-Larsen) ने मेंस सिंगल्स में गोल्ड अपने नाम किया तो वहीं साउथ कोरिया की बैंग सू-ह्यून (Bang Soo-hyun) ने भी वुमेंस सिंगल्स में सबसे बड़ा खिताब अपने नाम किया।

डेनमार्क की ओर से पौल-एरिक हॉयर लार्सन इकलौते गोल्ड मेडल जीतने वाले शटलर हैं।

साउथ कोरिया के किम डाँग-मून (Kim Dong-moon) और गिल यंग-आह (Gil Young-ah) की जोड़ी ने ओलंपिक गेम्स का पहला मिक्स्ड डबल्स का ताज पहना था।

मलेशिया के राशिद सिदेक (Rashid Sidek) ने ओलंपिक ब्रॉन्ज़ जीता और ओलंपिक मेडल जीतने वाले वह तीसरे मलेशियाई शटलर बन गए थे। इससे पहले रफीज़ सिदेक (Razif Sidek) और जलानी सिदेक (Jalani Sidek) ने मेंस डबल्स वर्ग में बार्सिलोना 1992 में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था।

उस साल भारत की ओर से केवल दो ही शटलर हिस्सा ले रहे थे और वह थे दीपांकर भट्टाचार्य और पीवीवी लक्ष्मी (PVV Lakshmi)। पीवीवी लक्ष्मी अभी के नेशनल कोच पुलेला गोपीचंद (Pullela Gopichand) की पत्नी हैं।

सिडनी 2000: चीन के हाथ पहला सिंगल गोल्ड

अब चीन ने इस खेल में बाज़ी मारने के तौर तरीके सीख लिए थे। अगले कई सालों तक चीन ने कोर्ट पर राज किया और उसका बीज उन्होंने सिडनी 2000 गेम्स के दौरान बोया था।जी शिनपेंग (Ji Xinpeng) ने मेंस सिंगल्स गोल्ड और गोंग झीचाओ (Gong Zhichao) ने वुमेंस सिंगल्स गोल्ड पर अपने देश का नाम लिख दिया। इतना ही नहीं बल्कि वुमेंस डबल्स जोड़ी गे फी (Ge Fei) और गू जुन (Gu Jun) ने लगातार दूसरा गोल्ड मेडल जीता और झांग जून (Zhang Jun) और गाओ लिंग (Gao Ling) ने भी मिक्स्ड डबल्स में गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा जमाया। यह ओलंपिक चीन के लिए बैडमिंटन के खेल में सुनहरा साबित हुआ।

चीन ने सिडनी 2000 में 4 सिंगल्स और डबल्स गोल्ड मेडल हासिल किए और इंडोनेशिया के टोनी गुनावन (Tony Gunawan) और कैंड्रा विजया (Candra Wijaya) ने मेंस डबल्स गोल्ड पर अपना नाम लिखा।

इस बार फिर एशियाई देश बाज़ी मार गए और 15 में से 13 मेडल उनके हिस्से आए। एक बार फिर डेनमार्क के खिलाड़ी ने मेडल जीता और वह थी कैमिला मार्टिन (Camilla Martin)। Camilla Martin ने वुमेंस सिंगल्स वर्ग में सिल्वर मेडल अपनी झोली में डाला। इस संस्करण में ब्रिटेन ने भी बैडमिंटन के खेल में अपना पहला मेडल जीता। ग़ौरतलब है कि Simon Archer और Joanne Goode ने मिक्स्ड डबल्स में ब्रॉन्ज़ मेडल हासिल किया था।

इतना ही अनहि बल्कि भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी पुलेला गोपीचंद ने भी सिडनी 2000 के ज़रिए ओलंपिक गेम्स में डेब्यू किया था। इस संस्करण में गोपीचंद ने प्री-क्वार्टरफाइनल तक का सफ़र तय किया था। इनके अलावा अपर्णा पोपट (Aparna Popat) भी एक और इंडियन शटलर थीं जिन्होंने भारत की शान के लिए अच्छा प्रदर्शन किया था।

एथेंस 2004: दिग्गज बनने की राह पर

इंडोनेशिया के तौफीक हिदायत (Taufik Hidayat) को अपने समय का सबसे बेहतरीन खिलाड़ी माना जाता था लेकिन उनके हाथ एक ही ओलंपक मेडल आया और वह एथेंस 2004 में आया था। इस शटलर ने मेंस सिंगल्स वर्ग में गोल्ड मेडल पर अपना हक जमाया।

उस दौरान एक और दिग्गज ने अपने खेल से प्रशंसकों का दिल लुभाया और वह थी चीन की झांग निंग (Zhang Ning)। झांग निंग ने वुमेंस सिंगल्स गोल्ड मेडल जीता और वहीं गाओ लिंग और झांग जून (Zhang Jun) (मिक्स्ड डबल्स) की जोड़ी ने लगातार दूसरा ओलंपिक गोल्ड हासिल किया।

गाओ लिंग ने वुमेंस डबल्स में हुआंग सुई (Huang Sui) के साथ खेलते हुए सिल्वर मेडल पर भी पकड़ जमाई। यह मेडल लिंग का चौथा ओलंपिक मेडल था और आज तक यह आंकड़ा बैडमिंटन के ओलंपिक इतिहास का सबसे बेहतरीन आंकड़ा है।

गाओ लिंग (बाएं) ने बैडमिंटन के खेल में 4 ओलंपिक मेडल जीता हैं

जहां एशियाई देश अपना कमाल करते जा रहे हैं वहीं डेनमार्क ने भी हर संकरण में मानों मेडल जीतने की कसम खा ली थी। इस बार फिर डेनमार्क जेन्स एरिक्सन (Jens Eriksen) और मेट स्कोल्डैजर (Mette Schjoldager) की जोड़ी ने मिक्स्ड डबल्स में ब्रॉन्ज़ मेडल हासिल किया था और वहीं गेल एम्स (Gail Emms) और नेथन रोबर्टसन (Nathan Robertson) ने ब्रिटेन को बैडमिंटन में दूसरा बैडमिंटन जितवाया।

एथेंस 2004 में नीदरलैंड को भी बैडमिंटन में पहला ओलंपिक मेडल जीतते हुए देखा गया था। मिया ऑडिना (Mia Audina) ने वुमेंस सिंगल्स में सिल्वर मेडल की चमक अपने हिस्से में डाली। मिया ऑडिना के लिए वह दूसरा ओलंपिक मेडल था और उन्होंने पहला मेडल अटलांटा 1996 में जीता था लेकिन उस समय वह इंडोनेशिया के लिए खेलती थी।

इस संस्करण में भारत के अभिन श्याम गुप्ता (Abhinn Shyam Gupta) और निखिल कनेत्कर (Nikhil Kanetkar) ने अभी अपना-अपना डेब्यू कर अपने हौंसलों को बुलंद किया।

बीजिंग 2008: झांग निंग ने बनाया इतिहास

बैडमिंटन का खेल रोचक तो है ही और इसका ओलंपिक इतिहास भी उतना ही सुनहरा है। इस संस्करण से पहले ओलंपिक गेम्स में 15 अंक की गेम खेला जाता था लेकिन इस बार 21 पोइटर गेम की घोषणा की गई थी।

चीनी दिग्गज झांग निंग ने इतिहास बनाने का सही दिन चुना और उन्होंने झी झिंगफांग (Xie Xingfang) को मात देते हुए वुमेंस गोल्ड पर कब्ज़ा जमाया। इस मेडल से झांग निंग लगातार दो वुमेंस सिंगल्स गोल्ड जीतने वाली पहली महिला शटलर बन गईं।

झांग निंग ओलंपिक बैडमिंटन सिल्ग्ल्स में लगातार दो गोल्ड जीतने वाली पहली महिला शटलर बन गईं।

दिग्गज लिन डैन ने भी अपना पहला ओलंपिक मेडल तब जीता जब उन्होंने मलेशिया के ली चोंग वेई (Lee Chong Wei) को हराया यह मेडल गोल्ड मेडल था और इसके बाद डैन का जलवा पूरी दुनिया ने भी देखा है।

ऐसा पहली बार हुआ था कि सभी के सभी मेडल एशियाई देशों ने जीते और पहली बार ऐसा हुआ था कि डेनमार्क के हाथ एक भी बैडमिंटन ओलंपिक मेडल नहीं आया।

बीजिंग 2008 ने भारत की झोली में भी बैडमिंटन के खेल में ओलंपिक मेडल डाल दिया। ऐसा कीर्तिमान स्थापित करने वाली शटलर का नाम है साइना नेहवाल (Saina Nehwal)। 20 साल की नेहवाल ने इतिहास बनाते हुए वुमेंस सिंग्क्स क्वार्टरफाइनल तक का सफ़र तय किया और अपने भविष्य का भी प्रमाण पेश किया। उस संस्करण में नेहवाल के अलावा अनूप श्रीधर (Anup Sridhar) इकलौते भारतीय शटलर थे।

लंदन 2012: भारतीय बैडमिंटन का इतिहास

भारतीय बैडमिंटन का इतिहास 2012 ओलंपिक गेम्स के दौरान बदलना शुरू हो गया था। उस संस्करण में साइना नेहवाल ने बैडमिंटन में पहला ओलंपिक मेडल भारत को दिया था और उसके बाद इस खेल ने भारत में एक अलग ही नाम बना लिया था। इस शटलर ने बेहतरीन खेल दिखाते हुए ब्रॉन्ज़ मेडल पर अपना नाम लिख दिया था।

इतना ही नहीं बल्कि नेहवाल के पति परुपाली कश्यप (Parupalli Kashyap) ने इतिहास तब बनाया जब वह ओलंपिक गेम्स के क्वार्टरफाइनल में पहुंचने वाले पहले पुरुष भारतीय शटलर बन गए। उस संस्करण में ज्वाला गुट्टा (Jwala Gutta) और अश्विनी पोनप्पा (Ashwini Ponnappa) की जोड़ी ने भी डेब्यू किया था। इसके साथ ही गुट्टा ने वी दीजू (V Diju) के साथ मिक्स्ड इवेंट में भी भाग लिया था।

वहीं दूसरी ओर लिन डैन ने अपना लगातार दूसरा सिंगल गोल्ड भी जीत लिया था और अब बैडमिंटन में उनके नाम का डंका बजने लग गया था।

इस बार भी चीन का पलड़ा भारी रहा और उन्होंने सभी गोल्ड मेडलों पर अपना हक़ जमाया। ली श्यूरुई (Li Xuerui) ने वुमेंस सिंगल्स, काई युन (Cai Yun) और फू हैफेंग (Fu Haifeng) ने मेंस डबल्स, टियान किंग (Tian Qing) और झाओ युनलेई (Zhao Yunlei) वुमेंस डबल्स और झांग नान (Zhang Nan) और झाओ युनलेई ने मिक्स्ड डबल्स में गोल्ड मेडल यानी स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

रियो 2016: कैरोलिना मारिन ने तोडा सिंधु का सुनहरा सपना

बार्सिलोना 1992 से बैडमिंटन की ओलंपिक गेम्स में शुरुआत हुई। यह हैरानी की बात है कि अब से लेकर रियो गेम्स तक वुमेंस सिंगल्स मेडल हमेशा ही एशियाई देशों ने जीता था। इस बार स्पेन की कैरोलिना मारिन (Carolina Marin) को कुछ और ही मंज़ूर था और उन्होंने दिलों के साथ वुमेंस सिंगल्स गोल्ड मेडल भी अपने नाम कर लिया।

कैरोलिना मारिन पहली यूरोपियन महिला बनीं जिन्होंने ओलंपिक गेम्स में गोल्ड मेडल जीता था और उन्होंने भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु (PV Sindhu) को फाइनल में मात देते हुए इस खिताब को अपने नाम किया था। इसके बाद पीवी सिंधु के करियर में भी चार चांद लग गए और आगे चलकर वह वर्ल्ड चैंपियन भी बनीं।

कैरोलिना मारिन पहली यूरोपियन महिला हैं जो ओलंपिक चैंपियन बनीं

रियो 2016 ने प्रशंसकों के दिल भी तोड़े जब ली चोंग वेई (Lee Chong Wei) ने लिन डैन को मात देते हुए लगातार तीसरी बार फाइनल में जगह बनाई। हालांकि वह गोल्ड मेडल तो नहीं जीत सके लेकिन उन्होंने अपने खेल से ओगों के दिल ज़रूर जीते थे। उस संस्करण में चीन के चेन लॉन्ग (Chen Long) ने फाइनल जीता और सबसे ऊपरी मंडला अपने हाथ लिया।

वहीं फू हैफेंग ने लगातार दूसरा मेंस डबल्स गोल्ड अपने नाम किया और इस बार उनका साथ झांग नान ने निभाया। दूसरी ओर जापान ने पहला ओलंपिक बैडमिंटन गोल्ड जीता। यह जीत वुमेंस डबल्स वर्ग में आई थी और इसके सम्राट मिसाकी मात्सुतोमो (Misaki Matsutomo) और अयाका ताकाहाशी (Ayaka Takahashi) रहे थे।

पीवी सिंधु के अलावा भारत की ओर से पूर्व वर्ल्ड नंबर 1 किदांबी श्रीकांत (Kidambi Srikanth) और मेंस डबल्स जोड़ी मनु अत्री (Manu Attri) और बी सुमीत रेड्डी (B Sumeeth Reddy) भी ओलंपिक डेब्यू कर रहे थे।

साइना नेहवाल और ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने रियो गेम्स में भी हिस्सा लिया था लेकिन वह ग्रुप स्टेज में ही बाहर हो गईं थीं।