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पूजा ढांडा: जिन्होंने कुश्ती को सफलता के शिखर तक पहुंचाया

बहुत कम उम्र में ही जूडो में शामिल होने के बाद यह भारतीय खिलाड़ी काफी सफलता मिलने के बावजूद अपने स्थानीय कोच की सलाह पर कुश्ती लड़ने लगी। लेकिन यहां भी उनकी सफलता का सफर जारी रहा।

लेखक रितेश जायसवाल ·

हरियाणा राज्य बीते कुछ दशकों से भारतीय कुश्ती के लिए एक आकर्षण का केंद्र रहा है। जिसने देश को योगेश्वर दत्त, सुशील कुमार और गीता फोगाट जैसे कई चैंपियन दिए हैं। हालांकि, भारतीय कुश्ती में हरियाणा के शानदार प्रदर्शन के लिए कई पहलुओं को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। एक समृद्ध खेल संस्कृति जो कि पहलवानी की मूल जरूरत है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि वहां अखाड़े (रेसलिंग पिट्स) बहुतायत में हैं।

पहलवानों और अखाड़ों से घिरे रहने के बावजूद, भारत की पूजा ढांडा को कुश्ती के कीड़े ने जल्दी नहीं काटा। वास्तव में, जूडो उनका पहला खेल प्रेम था। लेकिन भारत के एक प्रतिष्ठित कुश्ती कोच की सलाह पर इस किशोरी ने अपने खेल को बदल दिया। इस निर्णय ने पूजा को लाभ भी दिया, क्योंकि वह एक पहलवान के रूप में बहुत अधिक सफलता हासिल करने में कामयाब रहीं। उनके आगे बढ़ने से भारत में महिलाओं में कुश्ती के प्रति लोकप्रियता काफी बढ़ी।

पूजा ढांडा (बाएं) ने 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में जीता रजत पदक

जूडो चैंपियन पूजा ढांडा

पूजा ढांडा का जन्म हिसार जिले के बुडाना गांव में पिता अजमेर और माता कमलेश ढांडा के घर में हुआ था। उनके पिता अजमेर ढांडा हरियाणा पशु पालन विभाग में जीएलएफ में कार्यरत हैं। जबकि उनकी मां एक गृहिणी हैं। वह अपने पिता के कारण खेलकूद के लिए प्रेरित थीं, जो कभी खुद एक एथलीट हुआ करते थे।

युवा पूजा ढांडा के लिए जूडो उनका पहला प्यार था। वह जूडो खिलाड़ी के रूप में बहुत सफल रहीं और उन्होंने तीन अंतरराष्ट्रीय पदक जीते। हालांकि, अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद ढांडा ने पूर्व भारतीय पहलवान और कोच कृपा शंकर बिश्नोई के सुझाव के बाद जूडो से आगे बढ़ने का फैसला किया। इसी बातचीत ने उन्हें कुश्ती में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया।

युवा खिलाड़ी ने इस नए खेल में अपना हाथ आजमाया और कुश्ती की विभिन्न तकनीकों को सीखते हुए खुद को तैयार किया। जल्द ही ढांडा यह महसूस करने लगीं कि वह इस खेल में अपना करियर बना सकती हैं।

पूजा ढांडा का कुश्ती करियर

ढांडा ने 2009 में कुश्ती में कदम रखा और उसके बाद से कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने सिंगापुर में आयोजित 2010 के युवा ओलंपिक में भाग लिया और 60 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग में रजत पदक जीता। इसके बाद उन्होंने 2013 में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में अपनी पहली उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन यूक्रेन की इरिना हुसैक के खिलाफ अपनी बाउट हारने के बाद पहले ही राउंड में प्रतियोगिता से बाहर हो गईं।

युवा पहलवान के लिए निम्नलिखित कुछ महीने अधिक फलदायी रहे, जिसे राष्ट्रीय कुश्ती चैंपियनशिप में उनकी जीत से उजागर किया गया, जहां उन्होंने फाइनल में बबीता फोगाट को हराया। उन्होंने अस्ताना में एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक भी जीता। उनका कुश्ती कैरियर तब तक उज्ज्वल दिख रहा था, जब तक कि उन्हें 2015 में एक बुरी लिगामेंट चोट का सामना नहीं करना पड़ा। ऐसा होने से उन्हें सर्जरी से गुजरना पड़ा, जिसने उन्हें लंबे समय तक खेल से दूर कर दिया।

समाचार वेबसाइट द ब्रिज को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “यह एक ऐसा चरण था, जिसे मैं आसानी से नहीं भूल सकती। वह वो वक्त था, जब मैं काफी बेहतर कर सकती थी। चोट के बाद के दो सालों ने मेरे कुश्ती करियर को पटरी से उतार दिया। लेकिन मैं मैट पर लौटने के लिए तैयार थी और जल्द ही 2017 में मैंने प्रो रेसलिंग लीग में अपनी वापसी की।”

वह खेल छोड़ने की कगार पर थीं, लेकिन उनके माता-पिता और कोच कुलदीप सिंह बिश्नोई ने इस कठिन समय के दौरान उन्हें प्रेरित किया। यह उनके कोच ही थे, जिन्होंने ढ़ाडा को मुंबई में एक फिजियोथेरेपिस्ट खोजने में मदद की और उसके बाद से उनकी वापसी का सफर शुरू हुआ। ढांडा को कुश्ती के मैट पर वापस लौटने में लगभग दो साल लग गए। लेकिन एक बार जब उन्होंने वापसी की तो यह युवा रेसलर एक बार फिर से अपना शानदार प्रदर्शन देते हुए नज़र आईं।

पूजा ढांडा की वापसी

पूजा ढांडा ने 2017 में नेशनल चैंपियनशिप जीतने के साथ मैट पर धमाकेदार वापसी की घोषणा की। हालांकि, उनके सर्वश्रेष्ठ पल अभी भी उनके सामने आना बाकी थे। साल 2018 में वह प्रो रेसलिंग लीग में ओलंपिक चैंपियन मीना मारुलिस को पछाड़ने में कामयाब रहीं। उसी प्रतियोगिता में उन्होंने ट्यूनीशिया की विश्व चैंपियनशिप की रजत पदक विजेता मारवा अमरी को भी हराया।

उसी फॉर्म को बरकरार रखते हुए ढांडा ने 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीता। वह नाइजीरिया के ओडुनायो अडेकुओरॉय के खिलाफ एक करीबी मुकाबले में हार गईं। कुछ महीनों के बाद उन्होंने महिलाओं के 57 किग्रा वर्ग में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता।

अभी भी पूजा ढांडा के आगे एक उज्ज्वल और आशाजनक भविष्य बाकी था। उन्होंने अतीत में न केवल एक पहलवान के रूप में बल्कि एक जुडोका के रूप में भी बड़े मंच पर प्रदर्शन करने की क्षमता दिखाई है। खेल करियर को बीच में बदलना, गंभीर चोटों से वापसी करना और वैश्विक मंच पर पदक जीतना बेमिसाल है। पूजा ढांडा भारत के आगामी एथलीटों के लिए वास्तव में एक रोल मॉडल बन गई हैं।